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मैंने कल उन्हें फोन किया था। फोन नहीं उठा। तभी मुझे याद आया कि रविवार के दिन उनसे बात करना आसान नहीं होता। मैं हॉस्पिटैलिटी इंडस्ट्री के प्रोफेशनल केवी साइमन को जानता हूं, जो 35 साल से ज्यादा समय तक भारत में अमेरिकन होटल-मोटल एसोसिएशन और कई अमेरिकन हॉस्पिटैलिटी एजुकेटर्स के प्रतिनिधि रहे हैं। वे अमेरिका की यात्रा तो ऐसे करते, जैसे हम कामकाज के लिए उपनगरीय ट्रेन सेवा से शहर आते-जाते हैं। इतने सालों में मैंने कभी उन्हें रविवार को चैन से बैठे नहीं देखा, जबकि वह मुंबई में वर्सोवा बीच से पैदल दूरी पर रहते हैं। चाहें तो बालकनी में टहल सकते हैं। दोपहर का आनंद ले सकते हैं। पर मुझे पता है कि वे सिर्फ शाम को लौटेंगे और तब सारे मिस्ड कॉल्स का जवाब देंगे। आमतौर पर रविवार को वह चर्च में होते हैं और जो भी हो सके, करते हैं। आज भले वह रिटायर हो चुके, लेकिन अपने समुदाय में सबसे व्यस्त लोगों में से एक हैं। इसके विपरीत, मैं एक और व्यक्ति को जानता हूं- जिन्होंने ऑफिस जाने के अलावा और कुछ नहीं किया। वह ठीक शाम 5.30 बजे काम से लौटते और फिर किसी से नहीं मिलते थे। इसलिए नहीं कि उन्हें मिलना-जुलना पसंद नहीं था, बल्कि वह रेटिनाइटिस पिगमेंटोसा बीमारी से जूझ रहे थे। ये आंखों से जुड़ी आनुवंशिक बीमारी है, जिसमें आंखों की रोशनी धीरे-धीरे खत्म होती है। इसे नाइट ब्लाइंडनेस भी कहते हैं, जो सामान्यत: रेटिना में लाइट सेंसिंग सेल्स (फोटोरिसेप्टर्स) के खराब होने से होती है। वह साइमन से ऊंचे पद पर थे। दोनों साथ ही रिटायर हुए, लेकिन दूसरे वाले की मृत्यु समय से पहले ही हो गई। इस रविवार इन दोनों की याद मुझे तब आई, जब मैं जेनिफर ब्रेहेनी की किताब ‘मैटरिंग: द सीक्रेट टु ए लाइफ ऑफ डीप कनेक्शन एंड पर्पज’ का सिनॉप्सिस पढ़ रहा था-जो 27 जनवरी को रिलीज होनी है। जेनिफर ने इसमें रिटायर लोगों के जीवन में खत्म हो रही बेहद बुनियादी चीज के बारे बड़ी खूबसूरती से बताया है। वह है ‘मैटरिंग’ (Mattering)- एक गहरा मानवीय अहसास कि आप मायने रखते हैं और आपके पास दुनिया में मूल्य जोड़ने का मौका है। और वह कितनी सही भी हैं। हम सभी वित्तीय सुरक्षा के लिए वैल्थ स्पैन, शारीरिक सुरक्षा के लिए हैल्थ स्पैन की प्लानिंग तो करते हैं- लेकिन हममें से बहुत कम लोग ही रिटायरमेंट के उतने ही जरूरी अन्य पहलू की तैयारी करते होंगे। और वह यह कि रिटायरमेंट के बाद हम कैसे देखे जाएंगे, कैसे समाज के लिए उपयोगी महसूस करेंगे और कैसे बदलाव लाने में सक्षम रह पाएंगे। जेनिफर के मुताबिक, मैटरिंग का मतलब यह भाव है कि दूसरे हमें महत्व देते हैं और हमारे पास दुनिया को देने के लिए कुछ मूल्य हैं। 1980 में अकादमिक तौर पर यह विषय पेश किए जाने के बाद कई रिसर्चर्स को लगता है कि वैल-बीइंग के आधारों में यह भाव आज स्पष्ट तौर पर गायब है। तीन हजार रिटायर्ड लोगों के डेटा के आधार पर जर्नल हेल्थकेयर में 2020 में प्रकाशित मेटा एनालिसिस में पाया गया कि एक-तिहाई लोगों ने डिप्रेशन के लक्षण महसूस किए। ये रिटायरमेंट से जुड़ी मनोवैज्ञानिक कमजोरियों के कारण है। जैसे मेरा महत्व या जरूरत कम हो गई या जुड़ाव नहीं रहा। ये सभी पोस्ट रिटायरमेंट डिप्रेशन के संकेत हैं। साइमन के पास दोस्त हैं, जो आज भी मिलने आते हैं। जबकि दूसरा व्यक्ति अपनी शारीरिक अक्षमता और दोस्तों की कमी के कारण शायद बेहद अकेला महसूस करता होगा। रिटायरमेंट, जीवनसाथी का चले जाना, तलाक या बच्चों का घर से चले जाना जैसे कई बदलाव हमारे सामाजिक सहारे छीन लेते हैं। ऐसा हो तो रोजमर्रा के मेलजोल कई गुना बढ़ाइए। हर इनवाइट को स्वीकार कीजिए। और वहां जाकर साथियों को, भावी पीढ़ी को या जरूरतमंदों को जितना हो सके, उतना दीजिए- ताकि वो आपको बार-बार याद करें। फंडा यह है कि यह सोचने के बजाय कि आप कितने साल जिएंगे, सोचिए कि जब तक जिंदा हैं–दुनिया के लिए कैसे अपना महत्व बनाए रखेंगे। फिर देखिए कि दूसरों के लिए जरूरी होने का अहसास अपने चारों ओर कितनी खुशी लेकर आता है।
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एन. रघुरामन का कॉलम: कभी सोचा है कि रिटायरमेंट के बाद कैसे दिखेंगे, आपकी अहमियत क्या होगी?




