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मुझे आज भी याद है कि कैसे मेरी नानी उड़द दाल के कंटेनर में कुछ ‘चवन्नी’, तुअर दाल कंटेनर के नीचे ‘अठन्नी’ और चावल के डिब्बे में पांच, तीन, दो और एक पैसे के छोटे सिक्के रखती थीं। एक रुपए का सिक्का अकसर पल्लू की गांठ में बांधती थीं। अगर एसएसएलसी परीक्षा की दो रुपए फीस जमा करने का आखिरी दिन होता तो वह तुअर दाल कंटेनर या पल्लू की गांठ खोलकर कुछ सिक्के निकालतीं और बड़े बेटे को देतीं। ताकि वह अच्छे–से पढ़े, अच्छे नंबरों से पास हो और परिवार की मदद कर सके, जो फिलहाल अकेले नानाजी की तनख्वाह पर जैसे–तैसे चल रहा था। अगर आप 1940 से 1980 के बीच सीमित आय से जूझते घरों में पले-बढ़े हैं, तो आपको एकाध किस्सा ध्यान होगा- जब अचानक आए किसी जरूरी खर्च में नानी, दादी या मां ही सबसे बड़ा सहारा बनीं। आप सहमत होंगे कि उनमें से ज्यादातर या तो कभी स्कूल नहीं गईं या ड्रॉपआउट थीं। मेरी परनानी कभी स्कूल नहीं गईं। नानी ने पांचवीं में स्कूल छोड़ दिया, क्योंकि 11 की उम्र में उनकी शादी हो गई। मेरी मां का स्कूल भी आठवीं के बाद छुड़वा दिया गया, ताकि उनके भाई की फीस भरी जा सके। इन सबमें एक बात समान थी कि वे सभी तब उनके पास उपलब्ध पैसों को संभालने में बहुत समझदार थीं। ऐसा कैसे हुआ? इसका जवाब रिसर्च में मिलता है। कनाडा की कार्लटन यूनिवर्सिटी में अकाउंटिंग प्रोफेसर ओरियान कोशक्स ने अपना पूरा करियर ये समझने में लगाया कि बड़ी संस्थाएं वित्तीय हिसाब कैसे रखती हैं। पर छह साल पहले, जब वह मां बनीं तो उनके भीतर कुछ बदल गया। वे घरेलू हिसाब-किताब पर ध्यान देने लगी और पिछले माह उन्होंने रिसर्च पेपर ‘क्रिटिकल पर्सपेक्टिव्स ऑफ अकाउंटिंग’ प्रकाशित किया, जो इस पर था कि मातृत्व कैसे पैसे को लेकर महिलाओं की सोच में बुनियादी बदलाव कर देता है। बच्चा होने के बाद उन्हें हर वक्त उसे गोद में रखना पड़ता था। इसीलिए वो नए-नए बेबी कैरियर्स लेने लगीं, क्योंकि पुराने कैरियर्स में बच्चे को लेकर रसोई का काम असहज हो रहा था। तीसरा कैरियर खरीदते समय उन्हें महसूस हुआ कि यह खर्चा बच्चे के लिए नहीं, बल्कि खुद उनकी सहूलियत के लिए था। तभी उन्होंने सोचा, ‘यह विचार कैसे आया’? यहीं से वह रिसर्च को मजबूर हुईं और उन्होंने छह साल तक कई माताओं के इंटरव्यू किए। रिसर्च के अनुसार ज्यादातर लोग जानते हैं कि मां बनने के बाद बच्चे की देखभाल का जिम्मा प्रमुखत: महिला पर ही होता है तो उनकी कमाई घटती है और करियर की प्रोग्रेस धीमी होती है। यही सोच महिलाओं में यह भावना पैदा करती है कि उन्हें आय का अंतर पाटने के तरीके खोजने होंगे। मातृत्व रोजमर्रा की वित्तीय सोच और व्यवहार को बदलता है। याद कीजिए क्यों महिलाएं अपने जीवनसाथी से बेहतर मोलभाव कर लेती हैं? क्योंकि वे रोजमर्रा की खरीदारी का जिम्मा उठाने लगती है और आय–खर्च का अंतर पाटने के लिए उपलब्ध पैसों में ही ज्यादा चीजें खरीदती हैं। ‘अच्छी मां’ बनने की समाज की अपेक्षा भी पैसे के प्रति समझदार बनने के उनके व्यवहार को बदलती है। यही सोच मां बनने के बाद पैसे को लेकर उनके व्यवहार को गढ़ती भी है। इसी से उनके भीतर यह धारणा बनती है कि ‘अच्छी मां बनने के लिए आर्थिक त्याग जरूरी है और पैसा बच्चों और उनकी भलाई के लिए समर्पित संसाधन है।’ विज्ञान में इसे ‘इंटेंसिव मदरिंग’ कहते हैं, जिसमें वे यह सुनिश्चित करने के लिए सबकुछ करती हैं कि एक बेहतर मां का काम बच्चों को खुश और स्वस्थ रखने से लेकर उनकी पूर्ण क्षमता तक पहुंचाना है। समाज आज भी इसे पिता के बजाय मां की जिम्मेदारी मानता है। फंडा यह है कि रसोई में डिब्बों-बक्सों में पैसे छिपाना स्वार्थ नहीं है, बल्कि यह परिवार की सुरक्षा की भावना विकसित करता है। और यह याद रखना कि किस बैंक (कंटेनर) में कितना पैसा है, उसे कहां खर्च करना है– ऐसा गुण है, जो ईश्वर ने सिर्फ मांओं को ही दिया है।
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एन. रघुरामन का कॉलम: कम पढ़ी-लिखी नानी-दादी और मां पैसे को लेकर इतनी समझदार कैसे थीं?



