नशा छुड़ाने के नाम पर लूट: सरकारी दर 3627 रुपये, मरीजों से हर महीने वसूल जा रहे 9 हजार से ज्यादा Chandigarh News Updates

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नशे से पीड़ित लोगों को सस्ता और बेहतर इलाज दिलाने के उद्देश्य से चंडीगढ़ सेक्टर-18 में रिहैबिलिटेशन सेंटर खोला गया था। शहर के इस एकमात्र सेंटर में बीते 14 वर्षों से प्रशासनिक लापरवाही से नियमों की अनदेखी हो रही है। मरीजों को यहां मात्र 3627 रुपये में पूरा इलाज मिलना था लेकिन उन्हें हर महीने 9 हजार रुपये से अधिक खर्च करने पड़ रहे हैं।

इस सेंटर को चलाने वाली संस्था एसवाईपीएम को जीएमएसएच-16 से खाना लेना था जहां 25 रुपये प्रतिदिन की दर से भोजन उपलब्ध कराया जाता है। इस भोजन में पांच मील शामिल हैं लेकिन सेंटर में मरीजों से 200 रुपये प्रतिदिन के हिसाब से 6500 रुपये महीना लिया जा रहा है। 

संस्था के सदस्यों का कहना है कि एमओयू के अनुसार मिनिस्ट्री ऑफ सोशल जस्टिस से मिलने वाला फंड स्वास्थ्य विभाग और सोशल वेलफेयर विभाग के बीच तालमेल की कमी के कारण रुक गया। हर साल हमारा लगभग 28 लाख रुपये खर्च होता है। इसलिए मरीजों से रुपये लिए जा रहे हैं। साल 2011 में हाईकोर्ट के आदेश के बाद प्रशासन ने इस सेंटर को खोला था।

इस तरह से चल रहा था सेंटर


  • 33.36 लाख रुपये हुए थे स्वीकृत

  • 13.60 लाख रुपये यूटी प्रशासन को देना था

  • 15.30 लाख रुपये मिनिस्ट्री ऑफ सोशल जस्टिस को देना था (जो मिला नहीं)

  • 5 लाख रुपये एनजीओ को लगाने थे

मिलनी थी ये सुविधाएं


  • जो मरीज इलाज या भोजन का शुल्क न दे सके उनका रिंबर्समेंट हेल्थ विभाग करेगा

  • निशुल्क बिल्डिंग, पानी और बिजली प्रशासन देगा

  • एक साल के भीतर उपयुक्त बिल्डिंग प्रशासन देगा

  • वर्क आउटपुट के आधार पर एक्सटेंशन दी जाएगी

इन स्तर पर मिलीं कमियां


  • एमओयू की कोई समय-सीमा तय नहीं है और बीते 14 वर्षों से एक्सटेंशन मिल रहा

  • हेरीटेज बिल्डिंग में चल रहा सेंटर, जो रिंबर्समेंट सेंटर के मानकों को पूरा नहीं करती

  • संस्था की ओर से शिकायत के बावजूद प्रशासन उसी बिल्डिंग में सेंटर चलाता रहा

  • दावा, मरीजों को निशुल्क इलाज दिया गया, विभाग के पास कोई ठोस डेटा नहीं

सेंटर एक नजर में


  • 30 बेड की क्षमता

  • 20 से अधिक मरीज हैं हर महीने भर्ती होते हैं

  • 200 से ज्यादा मरीज एक साल में आते हैं

  • 60 प्रतिशत मरीज हर साल दोबारा भर्ती होते हैं

एसडीएम के निरीक्षिण मिली थीं ये खामियां

इस मामले पर रोगी कल्याण समिति के सदस्य वसीम मीर ने बैठक में मुद्दा उठाया था। उसके बाद डीसी के निर्देश पर एसडीएम ईशा कंबोज ने सेंटर का औचक निरीक्षण किया था। एमओयू 2011 के बाद रिन्यू न होना, केवल एक वॉशरूम, मरीजों के लिए पर्याप्त सुविधाएं न होना, काउंसलर न होना, केवल 1 सुरक्षाकर्मी होना और इमरजेंसी वाहन न होना बताया गया। इसके अलावा सेंटर में दूध के लिए 960 रुपये, लैब टेस्ट के लिए 860 रुपये, दवाओं के लिए 450 रुपये शुल्क और सुविधा देने वाले के नाम भी तय थे जो एमओयू के खिलाफ थे। आपत्ति जताने के बाद नाम हटा लिए गए।

हमें केंद्र का फंड मिला ही नहीं। स्वास्थ्य विभाग से खाना देने से मना कर दिया। मजबूरी में भर्ती मरीजों से शुल्क लेना पड़ा। सभी भुगतान ऑनलाइन किए गए हैं। निरीक्षण वाले दिन हमारी काउंसलर छुट्टी पर थी। स्वास्थ्य विभाग हर साल एमओयू रिन्यू करता है। जेंडर के अनुसार कई सारे वॉशरूम हैं। ओपन स्पेस के लिए विभाग को बता दिया था। -मनीष कुमार, संस्था के नॉर्थ इंडिया टीम लीडर

टेंडर के मानकों के अनुरूप केंद्र का संचालन हो रहा है कि नहीं इसकी जांच की जा रही है। अगर किसी स्तर पर कमी मिली तो उसमें बदलाव कराया जाएगा। -डॉ. सुमन सिंह, डायरेक्टर हेल्थ

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