एन. रघुरामन का कॉलम: सुविधा की कीमत बड़ी होती है और आपको समाज से जुदा भी करती है‘ Politics & News

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36 मिनट पहले

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एन. रघुरामन मैनेजमेंट गुरु

दिव्य मराठी’ के एक पाठक, महाराष्ट्र के जलगांव निवासी नजीर अहमद ने रविवार को अपना अनुभव शेयर किया। उन्होंने कहा ‘आज सुबह जब मैं नगरपालिका की गाड़ी में कचरा डालने गया तो करीब 20 साल के एक कचरा उठाने वाले ने न सिर्फ मुस्कुरा कर मुझे ग्रीट किया, बल्कि पीछे से आ रहे वाहन के बारे में सचेत भी किया।

मैं खड़े होकर देखा कि जैसे-जैसे गाड़ी आगे बढ़ी, वह दूसरों के साथ भी यही कर रहा था। मैं खुश हुआ कि एक युवा का ध्यान पूरी तरह काम पर था और उसके हाथ में मोबाइल भी नहीं था। मेरे पास मोबाइल होता तो उसके साथ सेल्फी जरूर लेता।’ यह आखिरी लाइन मुझे खुश कर गई और मैं सोचने पर मजबूर हुआ। मुंबई की पवई लेक के प्रोमेनेड पर सैर करते हुए जब मैं यह मैसेज पढ़ रहा था तो मैंने एक बिल्कुल उलट दृश्य देखा।

एक मूंगफली बेचने वाला अपनी टोकरी में मूंगफलियां सजाए बैठा था और एक जार जैसे बर्तन से धुआं उठ रहा था। वह और एक छोटा लड़का (शायद उसका पोता) मोबाइल फोन में डूबे थे। लड़का कुछ दिखा रहा था और बुजुर्ग मुंह खोले देख रहा था। उनसे करीब 30 फीट दूर मैं खड़ा था, लेकिन उन्होंने नहीं देखा। उसने न मुझे ग्रीट किया और न गर्म मूंगफलियां खरीदने को कहा। वहां से गुजरते किसी के साथ भी उन्होंने ऐसा नहीं किया।

यकीन मानिए, अगर वह आवाज लगाता तो कोई जरूर खरीदता। यदि आप उसे उसकी समस्या बताओ तो आशंका है कि जवाब मिले– ‘अपना काम देखो’ या ‘इतनी ही चिंता है तो खुद क्यों नहीं खरीद लेते।’इसे गरीबों की समस्या न समझें। यह असल में इन दो पीढ़ियों की समस्या है– बेबी बूमर्स, जो 1964 से पहले पैदा हुए और जेन-जी, जो 1997 के बाद और 2012 से पहले जन्मे।

अपने शहर के किसी न्यूरोसर्जन से पूछें तो वे मानेंगे कि जेन जी और वरिष्ठ नागरिक, ये दोनों समूह स्मार्टफोन के अत्यधिक आदी हो चुके हैं। दोनों में मोबाइल पर अत्यधिक निर्भरता के संकेत दिखते हैं। उनकी याददाश्त, ध्यान, सीखना, रचनात्मकता और निर्णय क्षमता जैसी बुनियादी कॉग्निटिव स्किल्स में भी गिरावट नजर आती है। वजहें अलग हो सकती हैं, लेकिन पैटर्न हैरतअंगेज रूप से समान है।

अगर आप उनमें से हैं, जो बार-बार स्वाइप, टैप या स्क्रॉल करते हैं तो यह आपको नुकसानरहित लग सकता है, लेकिन अपने किसी डॉक्टर मित्र से पूछिए। वह बताएंगे कि बार-बार दोहराए जाने वाला यह काम सीधे तौर पर आपके दिमाग को इस्तेमाल करने की क्षमता में बदलाव करता है।

2026 तक के वैज्ञानिक शोध भी पुष्टि करते हैं कि दोहराए जाने वाले डिजिटल काम ऐसे न्यूरोलॉजिकल बदलाव कर सकते हैं, जो कॉग्निटिव कार्यप्रणाली और इमोशनल हेल्थ को बिगाड़ते हैं।

चूंकि बहुत से लोग इस साधारण काम के दुष्प्रभावों से बेखबर हैं तो हमें भी वैसा ही प्रशिक्षण लेने की जरूरत है, जैसा गिग वर्कर्स (खासकर डिलीवरी बॉयज) को ट्रैफिक मैनेजमेंट पर दिया जाता है। हर मौसम में कड़ी समय सीमा और हाई प्रेशर में काम करने को मजबूर इन गिग वर्कर्स को रोड सेफ्टी के प्रति जागरूक किया जा रहा है।

केरल मोटर व्हीकल्स डिपार्टमेंट द्वारा सभी कंपनियों के गिग वर्कर्स के लिए शुरू किया गया दो घंटे का सेफ ड्राइविंग प्रोग्राम पहला कदम है, जिसके बाद ऑनलाइन डिलीवरी प्लेटफॉर्म्स को डिलीवरी नीतियां बदलने और रैश ड्राइविंग हतोत्साहित करने के निर्देश दिए जाएंगे।

विशेषज्ञों का कहना है कि अगर हम दिमाग की ‘ट्रैफिक डेनसिटी’ नहीं बढ़ाएंगे तो कई तरह की कॉग्निटिव स्किल्स प्रभावित हो सकती हैं। न्यूरोलॉजिस्ट सभी पीढ़ियों के लिए जो परामर्श देते हैं, वह साधारण-सा या अनग्लैमरस नहीं, बल्कि एक समान है। वे कहते हैं- फोन का इस्तेमाल सीमित करें। सामान्य गणित या स्पेलिंग्स के लिए एआई से न पूछें। नियमित अध्ययन करें। पजल्स, सुडोकू और क्रॉसवर्ड से दिमाग व्यस्त रखें।

फंडा यह है कि सुविधा की अपनी कीमत होती है। यह मूंगफली विक्रेता की तरह आपके व्यापार के अवसर छीन लेगा। कचरा उठाने वाले की तरह अच्छा इंसान बनने से रोकेगा। और दिमाग से जब लंबे समय तक काेई काम करने को ना कहा जाए तो वो ऐसे काम करना भूल भी जाता है।

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