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इलेक्ट्रिक ट्रेनें ऊपर की तार से 25,000V बिजली लेकर इंजन चलाती हैं, जबकि डिब्बों में लाइट-फैन-AC के लिए कम वोल्टेज चाहिए. पहले जनरेटर कार से सप्लाई मिलती थी, अब HOG सिस्टम से इंजन ही बिजली देता है. इससे ईंधन बचता है, आवाज कम होती है और बैकअप से सुरक्षा बनी रहती है.
ज्यादातर इलेक्ट्रिक ट्रेनें ऊपर वाली तार से 25,000 वोल्ट बिजली लेकर चलती हैं. यह बिजली सिर्फ इंजन को मिलती है जिससे ट्रेन दौड़ती है. लेकिन यही बिजली सीधे डिब्बों में नहीं भेजी जा सकती क्योंकि वोल्टेज बहुत ज्यादा होता है.

ट्रेन को चलाने के लिए एक अलग बिजली चाहिए डिब्बों में लाइट-पंखा-एसी जैसी चीजों के लिए अलग बिजली चाहिए और बैटरी/इमरजेंसी सिस्टम के लिए अलग. इसलिए एक ही बिजली को तीन तरह में इस्तेमाल नहीं किया जा सकता.

25,000 वोल्ट वाली बिजली सिर्फ इंजन के काम की है. डिब्बों में फैन, लाइट और एसी कम वोल्टेज पर चलते हैं. इसलिए ट्रेन में ट्रांसफॉर्मर और कन्वर्टर लगाए जाते हैं जो बिजली को कम वोल्टेज में बदलकर सुरक्षित बनाते हैं.
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ट्रेनों में एक पावर कार या जनरेटर कार लगी होती है. यह डीजल से बिजली बनाकर डिब्बों में भेजती है जिससे लाइट, पंखे, चार्जिंग और एसी चलते रहते हैं. इससे डिब्बों में रोशनी और हवा बनी रहती है.

कभी ओवरहेड वायर खराब हो जाए या ट्रेन ऐसे रास्तों पर चली जाए जहाँ इलेक्ट्रिक लाइन नहीं है तब जनरेटर कार काम आती है. इससे डिब्बों में अंधेरा नहीं होता और यात्री परेशान नहीं होते एसी वगैरह भी चलते रहते हैं.

पहले की ट्रेनों में जनरेटर कार में दो-तीन जनरेटर सेट लगे होते थे. आज ज्यादा ट्रेनें HOG सिस्टम से चल रही हैं जिसमें इंजन से ही डिब्बों को बिजली मिलती है. फिर भी बैकअप के लिए छोटा जनरेटर या बैटरी सिस्टम रखा जाता है.

नई LHB कोच वाली ट्रेनों में HOG सिस्टम आम हो गया है. इससे डीजल की बचत होती है और आवाज भी कम होती है. फिर भी सुरक्षा को ध्यान में रखते हुए बैकअप बिजली जरूर रखी जाती है, ताकि कभी भी अंधेरा या दिक्कत ना हो.
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