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देश में होने वाली मौतों के कारणों को लेकर एक चौंकाने वाली तस्वीर सामने आई है. दरअसल ICMR की नई रिपोर्ट के अनुसार भारत में होने वाली कुल मौतों में से सिर्फ करीब 22 प्रतिशत मौतों का ही मेडिकल कारण ऑफिशियल तौर पर दर्ज हो पाता है. यानी हर पांच में से चार मौतें ऐसी है, जिनमें यह साफ नहीं हो पाता कि व्यक्ति की मौत किस वजह से हुई. इस रिसर्च में बताया गया है कि मौतों का सही कारण दर्ज न होने से देश में हेल्थ पॉलिसी की योजना बनाने और संसाधनों के सही इस्तेमाल में बड़ी दिक्कत आती है. ICMR के रिसचर्स का कहना है कि मेडिकल डेथ सर्टिफिकेशन को पब्लिक हेल्थ की प्राथमिकता बनाया जाना चाहिए. वहीं रिपोर्ट के अनुसार 2020 में भारत में सिर्फ 22.5 प्रतिशत मौतों को ही डॉक्टरों की ओर से प्रमाणित किया गया. हैरानी की बात यह है कि पिछले दस सालों में इस आंकड़े में सिर्फ 2.5 प्रतिशत का ही इजाफा हुआ है जिसका मतलब है कि सुधार की रफ्तार बहुत धीमी रही है.
ICMR की रिसर्च में राज्यों को बांटा गया तीन ग्रुप में
इस रिसर्च को लेकर ICMR ने पिछले 15 साल के आंकड़ों के आधार पर सभी राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों का विश्लेषण किया और उन्हें तीन ग्रुप में बांटा. इसमें सबसे बड़े समूह में 23 राज्य शामिल है, जहां औसतन सिर्फ 18 प्रतिशत मौतें ही मेडिकल रूप से प्रमाणित होती है. वहीं इन राज्यों में डॉक्टरों की संख्या भी कम है. इन राज्यों में प्रति 1000 आबादी पर सिर्फ 0.14 डॉक्टर है. साथ ही केवल 27 प्रतिशत हॉस्पिटल ही नियमित रूप से मौत के कारणों की रिपोर्ट करते हैं. वहीं बाकी दो ग्रुप में शामिल राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों में कंडीशन इससे बेहतर है. यहां करीब 60 से 63 प्रतिशत मौतें मेडिकल सर्टिफाइड है. इन इलाकों में डॉक्टरों की संख्या भी लगभग दोगुनी है और 80 प्रतिशत से ज्यादा हॉस्पिटल मौत से जुड़ी जानकारी दर्ज करते हैं. वहीं भारत में भारत में डॉक्टरों की ओर से ऑफिशियल रूप से प्रमाणित होने वाली मौतों का प्रतिशत समय के साथ बढ़ा है. 2006 से 2010 के बीच, केवल लगभग 15 प्रतिशत मौतों को मेडिकल रूप से प्रमाणित किया गया था. इसके अलावा यह डेटा 2016 से 2020 के बीच बढ़कर लगभग 21 प्रतिशत हो गया, जो देश भर में मौतों को दर्ज करने के तरीके में कुछ सुधार दर्शाता है.
क्षेत्रीय असमानता भी साफ
ICMR के डेटा के अनुसार केंद्र शासित प्रदेशों में लक्षद्वीप सबसे आगे है, जहां लगभग 95 प्रतिशत मौतों का मेडिकल सर्टिफिकेशन होता है. पुडुचेरी और चंडीगढ़ में भी करीब 70 प्रतिशत मौतें डॉक्टरों की ओर से प्रमाणित की जाती है. वहीं दिल्ली में भी धीरे-धीरे सुधार हुआ है और यह डेटा करीब 60 प्रतिशत तक पहुंच गया है. इसके उलट ICMR के डेटा में उत्तर भारत की कंडीशन सबसे कमजोर पाई गई. 2015 से 2020 के बीच यहां औसतन सिर्फ 13 प्रतिशत मौतों का ही मेडिकल सर्टिफिकेशन हुआ. पंजाब और हिमाचल प्रदेश में कुछ सुधार जरूर दिखा है, लेकिन हरियाणा और उत्तर प्रदेश अब भी काफी पीछे है. वहीं इस रिपोर्ट के अनुसार दक्षिण भारत में मेडिकल डेथ सर्टिफिकेशन की कंडीशन बाकी हिस्सों से बेहतर है. तमिलनाडु में यह आंकड़ा करीब 28 प्रतिशत से बढ़कर 43 प्रतिशत से ज्यादा हो गया है. कर्नाटक और आंध्र प्रदेश में भी लगातार बेहतर रिकॉर्डिंग देखा गया है. हालांकि केरल में सुधार के बावजूद दूसरे दक्षिणी राज्यों की तुलना में आंकड़े अभी कम हैं.
सिर्फ डॉक्टरों की कमी नहीं है वजह
ICMR की रिसर्च में यह भी सामने आया है कि मौतों का सही रिकॉर्ड न होना सिर्फ डॉक्टरों की कमी की वजह से नहीं है. हॉस्पिटल की रिपोर्टिंग व्यवस्था, स्वास्थ्य ढांचा, राज्य सरकार की पॉलिसी, सामाजिक-आर्थिक हालात और प्रशासनिक प्रबंधन भी इसमें बड़ी भूमिका निभाते हैं.
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Disclaimer: यह जानकारी रिसर्च स्टडीज और विशेषज्ञों की राय पर आधारित है. इसे मेडिकल सलाह का विकल्प न मानें. किसी भी नई गतिविधि या व्यायाम को अपनाने से पहले अपने डॉक्टर या संबंधित विशेषज्ञ से सलाह जरूर लें.
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देश में हर 5 में से सिर्फ एक मौत का मेडिकल रिकॉर्ड होता है दर्ज, ICMR रिपोर्ट में बड़ा खुलासा



