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- Nanditesh Nilay’s Column Fake News Is Becoming A New Epidemic Of The Present Times
6 घंटे पहले
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नंदितेश निलय वक्ता, एथिक्स प्रशिक्षक एवं लेखक
आज हम ऐसे युग में जी रहे हैं, जहां हर दूसरे दिन हमें सत्य के नए रूप का सामना करना पड़ रहा है। चाहे वह घर हो, दफ्तर या अन्य कोई जगह। कई बार यह सत्य बड़ा झूठ साबित हो जाता है, और जब तक हम संभलें, तब तक एक दूसरी फेक न्यूज सत्य बनकर एक सायरन के साथ रिपीट होने लगती है। कौन-सा समाचार सत्य है और कौन-सा नहीं? किस बात पर यकीन क्या जाए, और किस बात पर नहीं? यह प्रश्न, इस दौर का यक्षप्रश्न बन चुका है।
खासकर इधर इसे और भी महसूस किया गया, जब एक तरफ देश युद्ध में फंसा था, और दूसरी तरफ टीवी मीडिया में फेक न्यूज की झड़ी लगी थी। इस तरह के फेक न्यूज युद्ध के समय आमराय और जनभावनाओं पर बहुत गहरा प्रभाव डालते हैं। बात जब देश की आती है, तो सबकुछ बहुत संजीदा हो जाता है।
फेक न्यूज से जनता को थोड़ी देर के लिए बरगलाया जा सकता है, सत्य को थोड़ी देर के लिए छिपाया भी जा सकता है, यह बात और है कि सत्य तो बाहर आकर ही रहता है। लेकिन उस थोड़ी देर में लोगों की मनःस्थिति पर जो प्रभाव पड़ता है, उसका क्या? फिर उसके बाद सत्य भी आशंका के घेरे में आ जाता है। महामारी और युद्ध के युग में हम सभी अभी भी वैक्सीनेशन के सत्य के साथ जीना सीख रहे हैं, और उम्मीद कर रहे हैं कि हमेशा कोई बूस्टर डोज इस दुनिया को बचा लेगा। यह सत्य है, और यहां सत्य सार्वभौमिक हो जाता है।
लेकिन ऐसे राष्ट्र भी हैं, जो सिर्फ आतंक को सत्य मानते है। सुनियोजित भ्रामक प्रचार और हथियार बेचकर यह पुष्टि करते हैं कि धर्म या मजहब के आधार पर जीना और मरना-मारना ही सत्य है। हम ऐसे युग में जी रहे हैं, जहां हमें सत्य को धोखा देने, नकारने और चकमा देने के लिए तैयार किया जा रहा हैं। जब हम हिटलर और उसकी टीम के राजनीतिक दर्शन का आकलन करते हैं, तो पाते हैं कि एक खास तरह की फेक न्यूज का प्रचलन उन दिनों भी था।
और जैसा कि इतिहासकार जेफ्री हर्फ ने उल्लेख किया भी है कि नाजियों ने यहूदियों के खिलाफ भावनाओं को भड़काने और नरसंहार को सही ठहराने के लिए ‘बड़े झूठ’ के आइडिया का बखूबी इस्तेमाल किया। हर्फ का मानना रहा कि नाजी जर्मनी के मुख्य प्रचारक जोसेफ गोयबल्स ने वास्तव में बड़े झूठ की तकनीक का इस्तेमाल किया था, और उन्होंने इसका इस्तेमाल यूरोप में लंबे समय से चली आ रही यहूदी विरोधी भावना को सामूहिक हत्या में बदलने के लिए किया।
गोयबल्स का तो यह राजनीतिक दर्शन ही था कि अगर झूठ को बार-बार दोहराया जाए तो वह सच हो जाता है। इस बार-बार दुहराने की प्रक्रिया को बहुत सारे संस्थानों ने समझा, और हमारे पड़ोसी देश ने इसका अभी इस्तेमाल भी किया। तो क्या हम मान लें कि यह बड़े झूठ की तकनीक ही आज के दौर के सत्य का न्यू वर्जन है?
सुकरात का मानना था कि जब हम नीति या तर्क में हार जाते हैं तो अपमान बड़ा हथियार बन जाता है। और बड़ा झूठ उस अपमान का एक अहम हिस्सा है। एक लोकतांत्रिक और सम्प्रभु देश में लोगों को स्वतंत्रता के साथ-साथ बोलने का अधिकार भी प्राप्त है। लेकिन जब एरिक बर्न ट्रांजेक्शनल एनालिसिस संबंधी संचार की अहम अवस्थाओं पर चर्चा कर रहे थे, तो उन्होंने यह नहीं सोचा होगा कि डिजिटल युग में, संचार की बाल्य अवस्था उसकी पैरेंट या वयस्क अवस्था पर हावी हो जाएगी। क्योंकि चाइल्ड स्टेट के ट्रांजेक्शन में कोई जिम्मेदारी नहीं रहती।
जो भी लिखना है, जो भी बोलना है, बोल दिया। एक ट्वीट ही तो करना होता है, फैक्ट भला कौन चेक करे! और नहीं तो ग्रोक को फैक्ट चेक पर लगा दिया जाता है। कितने ही पैरोडी अकाउंट बन जाते हैं और उनसे हजारों फॉलोअर्स भी जुड़ जाते हैं। और इस युग के हर ट्रांजेक्शन में बिजनेस या रेवन्यू का पक्ष तो जुड़ा होता ही है।
नतीजा ट्रोलिंग और फर्जी खबरें हैं। ऐसा करने में न तो जुबान पर लगाम नजर आती है, और न ही अभिव्यक्ति में लज्जा। प्रश्न यह है कि एक बड़े झूठ के इर्द-गिर्द कोई युवा या बच्चा कैसे बड़ा होगा, और उसके मन-मस्तिष्क पर इस सबका कैसा प्रभाव पड़ेगा?
(ये लेखक के अपने विचार हैं)
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