Indo Pak War: 71 और अब की लड़ाई में क्या अंतर था? पाकिस्तान को धूल चटा चुके रिटायर सूबेदार गुरजीत सिंह से जानिये! Haryana News & Updates

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Indo-Pak War: भारत और पाकिस्तान के बीच सीजफायर के बाद तनाव कम हो गया है और अब हालात धीरे धीरे सुधरने लगे हैं. यमुनानगर के गांव के पूर्व सैनिकों ने इस ताजा तनाव को लेकर अपनी राय रखी.

यमुनानगर के गांव के गेट पर फौजी की तस्वीर लगी है.

परवेज खान

यमुनानगर. भारत पाकिस्तान के बीच तनाव खत्म हो गया है. दोनों देशों में बीते एक सप्ताह तक काफी गहमागहमी रही. ऐसे में हरियाणा के यमुनानगर जिले का मैहलावाली गांव में भी वॉर को लेकर लोग काफी चर्चा करते रहे. इस गांव से अब तक सेना को सैंकड़ों जवान मिले हैं. गांव से 1960 से अब तक 400 से ज्यादा युवा सेना में अलग-अलग और बड़े पदों पर अपनी देशभक्ति का लोहा मनवा चुके हैं।

गांव के सरपंच धर्मपाल शर्मा ने बताया कि मैहलावाली गांव की मिट्टी में देशभक्ति की एक अलग पहचान है. इस गांव से युवा कर्नल, सूबेदार, कैप्टन जैसे अहम और बड़े पदों पर अपनी पहचान छोड़ चुके हैं. 1971 की लड़ाई में शामिल हुए गांव के ही रिटायर सूबेदार गुरजीत सिंह ने कहा जब भारत और पाकिस्तान में 1971 की लड़ाई लड़ी गई थी तो उस समय में उड़ी सेक्टर में तोपखाना में अपनी सेवाएं दे रहा था. वह कहते हैं कि आज और 1971 की लड़ाई में काफी अंतर है, क्योंकि उस जमाने की टेक्नोलॉजी और आज की तकनीक में जमीन आसमान का फर्क है. वह कहते हैं कि भारत को अमेरिका के कहने पर युद्ध को नहीं रोकना चाहिए था बल्कि अब पाकिस्तान से बदला लेने का दोबारा से मौका था.

गांव के ही रमेश शर्मा ने कहा भारत के लोग और भारतीय सेना 1971 से के बाद अब पाकिस्तान से बदला लेने का  मौका देख रही थी. 4 दिन से भारतीय सेना ने पाकिस्तान को मुंहतोड़ जवाब दिया. उन्होंने अभी कहा कि जब भारत को लड़ाई खत्म कर विजय बनना था, तब बीच में ही लड़ाई को रोक दिया यह गलत है. अब मौका था और भारत पीओके पर भी कब्जा कर सकता था.

यमुनानगर का मेहलांवाल गांव.

सैनिक लखविंदर सिंह की पत्नी सुरेंद्र कौर ने कहा इस गांव का हर युवा पहले फौज में जाने के लिए बेताब रहता था, लेकिन जब से सरकार 4 साल की अग्निवीर योजना लेकर आई है. उससे युवा का देश के प्रति जज्बा कम हुआ है और वह विदेश की तरफ जा रहे हैं. उन्होंने यह भी कहा कि जब भारतीय सेना लड़ रही थी तो हमें अपने देश के सैनिकों पर गर्व था कि वह जीत कर आएंगे और ऐसा हुआ भी. वह कहती हैं कि हमारा गांव फौजियों की शान के नाम से प्रसिद्ध है. वह कहती हैं कि अभी हमारे पास मौका था. क्योंकि पाकिस्तान हर बार हम पर हमला करता था.

थोड़ा डर था लेकिन सेना विश्वास था

गांव के ही जसविंदर सिंह ने बताया कि मेरे दादा-पिता आर्मी में अपनी सेवा दे चुके हैं और अब दोनों भाई भी सेना में ही भर्ती है. उन्होंने कहा कि जब भारत और पाकिस्तान के बीच युद्ध हो रहा था. हमें डर तो जरूर था, लेकिन अपने देश के सैनिकों पूरा भरोसा था कि वह जीत कर पाएंगे. लोगों ने कहा कि हम और महंगाई सहने को लेकर तैयार हैं लेकिन पाकिस्तान का इलाज होना चाहिए.  हालांकि, गांव के लोग अब थोड़ा निराश हैं, क्योंकि अग्निवीर योजना की वजह से सेना के प्रति लोगों का रुझान कम हुआ है. पहले बच्चे प्रेक्टिस बच्चे करते, लेकिन अब लड़कों में विदेश जाने का क्रेज बढ़ा है.

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Vinod Kumar Katwal

13 Years Experience in Print and Digital Journalism. Earlier used to Work With Dainik Bhaskar, IANS, Punjab Kesar and Amar Ujala . Currently, handling Haryana and Himachal Pradesh Region as a Bureau chief from …और पढ़ें

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Indo-Pak War:71 और अब की लड़ाई में क्या अंतर? पूर्व सूबेदार गुरजीत सिंह जानिये

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