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5 घंटे पहले
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एन. रघुरामन, मैनेजमेंट गुरु
इशिका बाला छत्तीसगढ़ के कांकेर जिले में दसवीं की छात्रा हैं। किसान की इस बेटी ने 99.2% अंक लाकर परीक्षा में प्रथम स्थान प्राप्त किया है। इसके लिए न केवल उनकी बुद्धिमत्ता बल्कि उनकी “परिस्थिति’ की भी प्रशंसा की जानी चाहिए।
वे माओवाद प्रभावित क्षेत्र से आती हैं, जिसकी अपनी समस्याएं हैं, लेकिन सबसे बड़ी क्षति उनके शरीर को पहुंची है। जी हां, इशिका हाल ही में रक्त कैंसर से जंग जीतकर वापस लौटी हैं। इशिका की उपलब्धि उस जिले के लिए उम्मीद की किरण है, जहां महिला साक्षरता दर बमुश्किल 59.6% है।
वे पिछले साल ही दसवीं की परीक्षा में शामिल हो जातीं, लेकिन उनका स्वास्थ्य बहुत खराब था। इलाज की कठिनाइयों के बावजूद इस साल उन्होंने टॉप किया, क्योंकि उन्होंने संकल्प लिया था कि आईएएस बनेंगी। इस सपने ने ही हर बार कमजोरी और दर्द से लड़ने में तब उनकी मदद की, जब उन्हें लगा कि जानलेवा बीमारी उन्हें पीछे धकेल रही है।
एक उल्लेखनीय संयोग यह है कि 12वीं के टॉपर अखिल सेन भी कांकेर से हैं। उन्होंने 98.2% अंक (वाणिज्य में 491/500) प्राप्त किए। उनके पिता समाचार पत्र एजेंसी चलाते हैं, और अखिल भी बोर्ड परीक्षाओं की तैयारी करते हुए हर सुबह अखबार बांटते थे।
उन्होंने कभी नहीं सोचा था कि उनके जीवन में ऐसी ऊंचाइयां आएंगी। वे यही सोचते थे कि पिता के कामकाज में हाथ बंटाएंगे। टॉपर्स की सूची में जगह बनाने वाले 85 छात्रों में से आठ बस्तर संभाग से हैं, जो पिछले 25 वर्षों से माओवादी विद्रोह से जूझ रहा है। और उन सभी ने कभी अपनी परिस्थितियों की परवाह नहीं की थी।
प्रज्ञा जायसवाल भी एक ऐसे परिवेश से आती हैं, जहां महिला साक्षरता कम है। वे सिंगरौली की सराय तहसील के निगारी गांव में रहती हैं, जो कि मध्य प्रदेश के भोपाल से 645 किलोमीटर दूर है। वहां महिला साक्षरता दर बमुश्किल 48.5% है। लेकिन उन्होंने कक्षा 10 की राज्य बोर्ड परीक्षा में पूरे 100% अंक प्राप्त किए। उनके माता-पिता सरकारी शिक्षक हैं और आज उनकी सफलता ने गांव को देश भर में पहचान दिलाई है।
दूसरी ओर 76 वर्षीय गोरखनाथ मोरे- जो भारतीय नौसेना से चीफ पेटि ऑफिसर के पद से सेवानिवृत्त हुए थे- ने केवल इसलिए 12वीं की परीक्षा देने का प्रयास किया क्योंकि वे कानून की पढ़ाई करना चाहते थे। उन्होंने 45% अंकों के साथ परीक्षा उत्तीर्ण की, जो लॉ कॉलेज की परीक्षा के लिए जरूरी न्यूनतम अंक हैं।
वे 11वीं के बाद ही भारतीय नौसेना में शामिल हो गए थे और अपनी सेवा के वर्षों के दौरान उन्हें अपनी शिक्षा जारी रखने का अवसर नहीं मिला। वे 1997 में नौसेना से सेवानिवृत्त हुए और लीगल टीम के हिस्से के रूप में एक निजी बिल्डर के साथ काम किया।
यहीं कानून में उनकी रुचि पनपी। वकीलों ने लीगल प्रैक्टिस के प्रति उनकी समझ को पहचाना और उनकी प्रशंसा की, जिसके बाद उन्होंने कानून की डिग्री हासिल करने का फैसला किया। लेकिन उस सपने को साकार करने के लिए उन्हें पहले 12वीं कक्षा उत्तीर्ण करनी थी।
उन्होंने इस औपचारिकता को पूरा करने के लिए एक स्थानीय स्कूल के संस्थापक रवींद्र भटकर और मोरे की पत्नी- जो स्वयं स्कूल शिक्षिका थीं- की मदद से निजी उम्मीदवार के रूप में पंजीयन किया। भटकर ने उन नए विषयों का अध्ययन करने में उनकी मदद की, जिनके बारे में उन्होंने कभी नहीं सुना था।
लेकिन प्रतिदिन निर्धारित समय में पढ़ाई करने के अपने अनुशासन के चलते उन्हें परीक्षा उत्तीर्ण करने में मदद मिली। अब वे 76 की आयु में इस शैक्षणिक वर्ष से लॉ कॉलेज के छात्र होंगे। मेरा विश्वास करें, मैं व्यक्तिगत रूप से यह उम्मीद करता हूं कि वे कानून की परीक्षा में उत्तीर्ण हो जाएंगे, क्योंकि उनके पास एक संगठन में काम करते हुए वर्षों में अर्जित अनुभव, ज्ञान और विषय में रुचि है।
फंडा यह है कि हममें से किसी के भी पास अपनी परिस्थिति को बदलने की सुपर पॉवर नहीं है, लेकिन जीतने के लिए जिस चीज में बदलाव की जरूरत होती है, वो है मनोस्थिति। इसे बदलें और अपने अंदर ग्रोथ देखें। आपको भी “सुपर’ टैग मिलेगा, जैसा कि उपरोक्त लोगों को उनकी सफलताओं के लिए मिला।
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एन. रघुरामन का कॉलम: परिस्थिति बदल नहीं सकते तो क्या हुआ, मनोस्थिति बदल लें!
