संजय कुमार का कॉलम: चुनाव मैदान में कैसा प्रदर्शन रहता है नई पार्टियों का? Politics & News

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अगले कुछ महीनों में दक्षिण भारत के तमिलनाडु, केरल और पुडुचेरी तथा पूर्व में असम और बंगाल में चुनाव होंगे। ये सभी चुनाव अहम हैं, लेकिन बंगाल और तमिलनाडु पर सबसे ज्यादा निगाहें टिकी हैं। इसका एक बड़ा कारण है कि दोनों ही राज्यों में नए सियासी दलों ने एंट्री ली है। कुछ लोगों का मानना है कि ये नए दल स्थापित पार्टियों को चुनौती दे सकते हैं। गठबंधन की संभावनाओं को प्रभावित कर सियासी गणित बिगाड़ सकते हैं। दूसरों का मत है कि ये चर्चा का विषय तो बनेंगे, लेकिन राजनीतिक रूप से ज्यादा अहमियत नहीं रखते। इसी बहाने हालिया चुनावों में नए दलों के प्रदर्शन पर नजर डालते हैं। बंगाल में टीएमसी से निलंबित और मुर्शिदाबाद की भरतपुर सीट से विधायक हुमायूं कबीर ने नए दल जन उन्नयन पार्टी की घोषणा की है। यह इंडियन सेकुलर फ्रंट और एआईएमआईएम के साथ गठबंधन की संभावना तलाश रही है, जो टीएमसी के मुस्लिम वोट बैंक पर असर डाल सकती है। तमिलनाडु में फिल्म अभिनेता विजय अपने सियासी दल ‘तमिझगा वेत्री कषगम’ की घोषणा कर चुके हैं। विजय ने पार्टी को भ्रष्टाचार व साम्प्रदायिकता-विरोधी तथा सामाजिक न्याय और तमिल स्वाभिमान की परम्पराओं पर आधारित बताया है। उन्होंने ऐलान किया है कि पार्टी का मुख्य उद्देश्य 2026 का विधानसभा चुनाव लड़ना और जीतना है। उन्होंने अपने दल को डीएमके और भाजपा के नेतृत्व वाले खेमे, दोनों के सामने द्रविड़ संस्कृति वाली नई राजनीतिक ताकत के तौर पर पेश किया है। केरल में मैथ्यू टी. थॉमस ने जनवरी में जेडीएस से अलग होकर ‘इंडियन सोशलिस्ट जनता दल’ बनाया है। इसी राज्य में कांग्रेस के पूर्व नेता जॉर्ज जे. मैथ्यू ने किसानों के मुद्दों और अन्य मांगों पर ध्यान देने के लिए ‘नेशनल फार्मर्स पार्टी’ बनाई है। भारत के चुनावों में नए राजनीतिक दलों के भविष्य को लेकर विश्वास के साथ कुछ भी कह पाना कठिन है। अतीत में हमने ऐसे नए दलों की सफलता और विफलता, दोनों की कहानियां देखी हैं। अलग-अलग राज्यों के चुनावों में ऐसे उदाहरण मिलते हैं, ज​हां कहीं तो नए दलों ने बेहतरीन प्रदर्शन किया, कुछ में ठीक-ठाक रहा और कहीं तो जरा भी बे​हतर नहीं कर पाए। 2015 और 2020 में ‘आप’ ने दिल्ली में बड़ी जीत दर्ज की, लेकिन 2025 में सत्ता से बाहर हो गई। इस बीच उसने 2022 में पंजाब में भी बड़ी जीत हासिल की। लेकिन सभी नए दलों का भाग्य ऐसा नहीं होता। 2025 के बिहार चुनाव में प्रशांत किशोर की नवगठित जन सुराज पार्टी काफी चर्चित रही थी। लेकिन बुरी तरह विफल हुई। पार्टी को महज 3% वोट मिले और खाता तक नहीं खोल पाई। 2006 में राज ठाकरे की मनसे 2009 के महाराष्ट्र चुनाव में पहली बार 143 सीटों पर लड़ी। 13 सीटें जीत भी लीं, लेकिन बाद के चुनावों में उसका प्रदर्शन गिर गया। असम में 2015 में प्रमोद बोडो द्वारा स्थापित यूनाइटेड पीपुल्स पार्टी लिबरल (यूपीपीएल) ने अपना अभियान बोडोलैंड में इन्क्लूसिव वेलफेयर पर केंद्रित किया। 2021 में असम चुनाव के पहले मुकाबले में पार्टी 8 सीटों पर लड़ी, जिनमें से 6 पर जीत दर्ज करके भाजपानीत सत्तारूढ़ गठबंधन में अहम सहयोगी बन गई। 2014 में बनी पवन कल्याण की जनसेना पार्टी ने 2024 के चुनाव में टीडीपी-भाजपा से गठबंधन कर 21 सीटों पर चुनाव लड़ा और सभी पर जीत दर्ज की। इससे एनडीए का समग्र वोट शेयर भी बढ़ा। रामविलास पासवान की लोजपा 2005 में बिहार में कांग्रेस और राजद से गठबंधन कर 203 सीटों पर लड़ी और 29 सीटें जीती। वैसे, भारतीय राजनीति में नए दलों के प्रदर्शन की ​इस विविधता से शायद ही पता चलता है कि चुनावों में नई पार्टियां कैसा प्रदर्शन करेंगी। किसी पार्टी को बनाने और उसे गति देने के लिए नेतृत्व अहम फैक्टर होता है। हालांकि इससे भी महत्वपूर्ण होता है पार्टी संगठन और संरचना। यानी पार्टी नई हो या पुरानी, उसकी चुनावी सफलता के दो ही स्तंभ होते हैं– नेतृत्व और संगठन।
(ये लेखक के अपने विचार हैं)

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संजय कुमार का कॉलम: चुनाव मैदान में कैसा प्रदर्शन रहता है नई पार्टियों का?