शेखर गुप्ता का कॉलम: हमारे लिए अपने हित सबसे महत्वपूर्ण रहे हैं Politics & News

[ad_1]


‘सम्प्रभुता’ इस साल का सबसे ज्यादा इस्तेमाल होने वाला शब्द बन सकता है। ट्रम्प ने इसे चलन में ला दिया है। वैश्वीकरण पर तीन दशकों से जो आम सहमति बनी हुई थी, उसे उन्होंने तोड़ दिया है। उस सहमति ने मित्र-देशों और सहयोगियों के साथ गठबंधन में अपनी सम्प्रभुता साझा करने के फायदे दिखाए थे। लेकिन ट्रम्प ने कनाडा से भारत तक हर देश को सम्प्रभुता का महत्व फिर से समझने पर मजबूर कर दिया है। इसे आप हमारे औपनिवेशिक इतिहास से जोड़कर देख सकते हैं या पश्चिमी देशों (अमेरिका) के दबाव से भी जोड़ सकते हैं, क्योंकि पाकिस्तान उनका सहयोगी बन गया था। 1974 और 1998 में पोखरण में परमाणु परीक्षणों के बाद हम पर आर्थिक प्रतिबंध लगे और हमें टेक्नोलॉजी से वंचित किया गया। हमारे परमाणु और मिसाइल कार्यक्रमों पर ‘रोक लगाओ, वापस लो और खत्म करो’ वाले दौर में जो दबाव पड़ा, वह अमेरिका की ओर से ही था। सम्प्रभुता को लेकर भारत में जो व्यापक सोच थी, उसे अमेरिका-विरोध के रूप में देखा जाने लगा। इस अनुभव ने ऐसे राष्ट्रवाद को जन्म दिया, जो मजबूत भी था और अमेरिका के प्रति संदेह से भरा भी। ‘विदेशी हाथ’ को हमेशा अमेरिकी हाथ माना गया। उसके विरोधी, यानी सोवियत संघ और उसके साथी, भारत के स्वाभाविक दोस्त माने गए। लेकिन यह तब तक ही रहा, जब तक 1990-91 में सोवियत संघ खत्म नहीं हो गया। तब से भारत इस नई, एकध्रुवीय दुनिया में अपने लिए जगह बनाने में लगा है। इसका नतीजा यह हुआ कि भारत धीरे-धीरे पश्चिम की ओर झुकता गया। भारत का हर नेता इस दुविधा का सामना करता रहा है कि शीतयुद्ध के बाद की दुनिया में बिना किसी एक खेमे में गए रिश्ते कैसे बनाए जाएं। भारत का तनावग्रस्त पड़ोस उसके रणनीतिक विकल्पों को सीमित करता है। बड़े नजरिए से देखें तो भारत दोहरी मजबूरी में है। पाकिस्तान के साथ रिश्ता हमेशा तनाव में रहता है और चीन की ओर से हमेशा खतरा बना रहता है। ऐसे में आराम से सोचने का मौका नहीं मिलता, लेकिन अमेरिका चाहता है कि भारत एक साथ कई चुनौतियों को संभाले। जबकि भारत के लिए चीन-पाकिस्तान गठजोड़ ज्यादा बड़ी चुनौती है। इसे दोहरी मजबूरी इसलिए कहा जाता है, क्योंकि भारत को अपनी सेना को हमेशा तैयार रखना पड़ता है। बहुत सारा सैन्य सामान रूस का बना हुआ है और इस निर्भरता से तुरंत छुटकारा नहीं मिल सकता। इसके अलावा भारत के महत्वपूर्ण कार्यक्रमों, जैसे परमाणु पनडुब्बी (एसएसएन) में रूस की बड़ी भूमिका है। दूसरी बात, दो मोर्चों से बचने के लिए भारत को चीन के साथ संबंध भी बनाए रखने पड़ते हैं, चाहे इसके लिए व्यापार में कुछ समझौते ही क्यों न करने पड़ें। संबंध बनाए रखने का मतलब है कि भारत यूक्रेन के मुद्दे पर रूस के खिलाफ ज्यादा कड़ी बात नहीं कह सकता या ट्रम्प के इस दावे की खुलकर पुष्टि नहीं कर सकता कि भारत ने रूस से तेल खरीदना बंद कर दिया है। यह स्थिति जटिल है, क्योंकि यूक्रेन युद्ध से पहले जब यूरोप और अमेरिका चाहते थे कि भारत रूस से तेल खरीदे ताकि वैश्विक कीमत संतुलित रहे, तब भारत उससे बहुत कम तेल खरीदता था। उस समय यह बात भी नहीं कही जाती थी कि रूस का तेल भारत की ऊर्जा सुरक्षा के लिए जरूरी है। लेकिन अब स्थिति उल्टी है और जनमत का दबाव है कि रूस से तेल खरीदना जारी रखा जाए और कहा जाए कि हम एक सम्प्रभु देश हैं। भारत की पिछली सरकारों ने अमेरिकी दबाव को नजरअंदाज किया था और यह याद किया जाता है कि इंदिरा गांधी ने रिचर्ड निक्सन और हेनरी किसिंजर का डटकर सामना किया था। लेकिन यह पूरी सच्चाई नहीं है। दूसरी सच्चाई यह है कि इंदिरा दूसरे खेमे, यानी सोवियत संघ के करीब चली गई थीं। अपनी सरकार बचाने के लिए उन्हें कम्युनिस्ट पार्टी का समर्थन चाहिए था, इसलिए 1969 के बाद भारत का झुकाव सोवियत संघ की ओर बढ़ गया। 9 अगस्त 1971 को भारत सोवियत संघ का सहयोगी बन गया। यह बहुत मजबूत संधि नहीं थी, लेकिन इसमें पारस्परिक सुरक्षा की बात शामिल थी। इसका फायदा तब हुआ, जब अमेरिकी सातवां बेड़ा भारत पर दबाव डालने आया था। सोवियत संघ ने संयुक्त राष्ट्र में वीटो किया और भारत को सैन्य सामान जल्दी उपलब्ध कराया, जिसमें पोलैंड से आए टी-55 टैंक भी शामिल थे। उसी समय, अमेरिका का नया सहयोगी चीन पाकिस्तान को हथियार दे रहा था। 1971 की जीत ने इंदिरा गांधी और भारत दोनों की प्रतिष्ठा बढ़ाई और निक्सन सरकार को शर्मिंदा किया, लेकिन क्या इसका मतलब यह था कि भारत पूरी तरह सम्प्रभु हो गया था? नहीं। भारत को कई मामलों में सोवियत संघ का समर्थन करना पड़ा, जैसे कम्बोडिया और अफगानिस्तान के मुद्दे पर। अफगानिस्तान के कारण भारत के सामने नई रणनीतिक समस्याएं पैदा हुईं। इससे अमेरिका-पाकिस्तान संबंध मजबूत हुए, जिहादी संस्कृति बढ़ी और पाकिस्तान परमाणु शक्ति बना। 1969 से 1989 के बीच क्या भारत ने अपनी सम्प्रभुता से समझौता किया? जवाब है- नहीं। सम्प्रभुता कोई स्थायी मुहर नहीं होती। अमेरिका हो या चीन, हर देश के लिए सम्प्रभुता का मतलब अपने फैसले लेने की आजादी है। शीतयुद्ध में भारत ने सोवियत संघ के साथ संबंध बनाए। बाद में अमेरिका के साथ संबंध सुधरे, रूस के साथ संबंध बनाए रखे गए, चीन के साथ स्थिरता की कोशिश हुई और पाकिस्तान से निपटने की ताकत बढ़ाई गई। देखें तो कोई भी देश पूरी तरह सम्प्रभु नहीं होता। सभी अपने फैसले और समझौते करते हैं। आज दुनिया एक-दूसरे पर निर्भर है, जहां सम्प्रभुता को लचीले तरीके से देखना पड़ता है। सभी देश नए गठबंधन बना रहे हैं और अपने हित के अनुसार फैसले ले रहे हैं। विचारधारा और नैतिकता अब कम महत्वपूर्ण हो गई हैं। एक बार मैंने माकपा नेता हरकिशन सिंह सुरजीत से पूछा कि आप उन सरकारों का समर्थन क्यों करते हैं, जो अमेरिका से संबंध सुधारती हैं। उन्होंने जवाब दिया : भारत को टेक्नोलॉजी चाहिए। पहले यह सोवियत संघ से मिलती थी, अब नहीं मिलती। इसलिए अब अमेरिका की जरूरत है। हमें अपने राष्ट्रीय हित के अनुसार काम करना चाहिए। सम्प्रभुता पर यह एक महत्वपूर्ण सबक है।
(ये लेखक के अपने विचार हैं)

[ad_2]
शेखर गुप्ता का कॉलम: हमारे लिए अपने हित सबसे महत्वपूर्ण रहे हैं