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सेना, बिजली उत्पादन, अर्थव्यवस्था, संस्कृति या ‘सॉफ्ट पावर’ (सांस्कृतिक, वैचारिक शक्ति), ग्लोबल इमेज- किसी भी क्षेत्र में क्या पाकिस्तान कभी भारत की बराबरी कर सकता है? यह मौका उसने 1983 में ही खो दिया था, जब उसने भारत को हजारों घाव देकर लहूलुहान करने की नीति अपनाई थी। वह जिया-उल-हक का पाकिस्तान था, जो अफगानी जिहाद की लहर पर सवार था और हमारे पंजाब की परेशानियां बढ़ रही थीं। इस सबने पाकिस्तान को पतन के ऐसे रास्ते पर डाल दिया था, जिससे उबरना नामुमकिन था। बाद के दशकों में यह पतन और तेज हो गया। आज उसकी प्रति व्यक्ति जीडीपी का आंकड़ा भारत के इस आंकड़े के करीब 55 फीसदी के बराबर है, और हर तिमाही में वह पिछड़ता जा रहा है। उसकी आबादी भारत की आबादी के करीब पांचवें हिस्से के बराबर है और उसकी कुल जीडीपी भारत की कुल जीडीपी की 10 फीसदी है। साक्षरता, प्रति व्यक्ति अनुमानित औसत जीवनकाल, उच्च शिक्षा के क्षेत्रों में पाकिस्तान बहुत-बहुत पीछे है और यह खाई फैलती ही जा रही है। हाल में पाकिस्तान के शेयर बाजार को लेकर थोड़ी सनसनी पैदा हुई क्योंकि वह दुनिया में सबसे तेजी से चढ़ते शेयर बाजारों में शुमार हो गया, जबकि भारत के शेयर बाजार 18 महीने से स्थिर हैं। लेकिन 18 महीने तक निरंतर चढ़ने के बाद कराची शेयर बाजार (केएसई) की कुल बाजार पूंजी करीब 70 अरब डॉलर के बराबर है। यह आंकड़ा भारतीय एनएसई का 1.35% ही है। आज भारत की सात कंपनियों के अपने-अपने कुल मूल्य केएसई के मूल्य से ज्यादा हैं। रिलायंस का मूल्य उससे साढ़े तीन गुना; एचडीएफसी, भारती और टीसीएस का दोगुना या उससे ज्यादा है। थोड़ा नीचे उतरें तो 14 कंपनियों के मूल्य 50 अरब डॉलर से ज्यादा के बराबर हैं। अमेरिका के साथ पाकिस्तान का व्यापार अमेरिका के साथ भारत के व्यापार के दसवें हिस्से से भी कम है। अपने सबसे मूल्यवान सहयोगी, संरक्षक और सबसे बड़े व्यापारिक साझेदार चीन से वह केवल 16 अरब डॉलर मूल्य के आयात करता है, जिनमें 85 फीसदी हिस्सा हथियारों का है। भारत चीन से 116 अरब डॉलर मूल्य के आयात करता है, जिनमें हथियारों का हिस्सा शून्य है। पाकिस्तान की दो सबसे बड़ी एयरलाइन कंपनियों (पीआईए और एयरब्लू) के पास कुल 44 विमान हैं, जबकि भारत की इंडिगो और एअर इंडिया के पास 700 विमान हैं और उनकी संख्या में हर सप्ताह एक का इजाफा हो रहा है। यानी पाकिस्तान के विमानों के मुकाबले यहां करीब 16 गुना ज्यादा विमान हैं। पड़ोसी लोग आज बिलकुल अलग ही लीग में बैटिंग कर रहे हैं। खरबों डॉलर मूल्य के खनिजों और तेल के विशाल भंडार की बातें कपोल-कल्पनाएं हैं। और उसके स्वयंभू फील्ड मार्शल के मुताबिक पाकिस्तान चूंकि मदीना के बाद दूसरा ऐसा मुल्क है, जो इस्लामी कलमे के तहत बना है, इसलिए इसकी जमीन के नीचे सऊदी अरब की तरह तेल और खनिजों के भंडार जरूर होंगे। ‘…दिल के बहलाने को गालिब ये ख्याल अच्छा है।’ लब्ब-ओ-लुआब यह कि पाकिस्तान भारत की बराबरी करे यह न केवल नामुमकिन है, बल्कि वह और पिछड़ता ही जाएगा। पाकिस्तान एक ही मामले में भारत से अपनी दूरी को कम कर सकता है, और वह है भारत की आबादी। जनसंख्या वृद्धि की उसकी दर भारत की दर से दोगुना ज्यादा है। फील्ड मार्शल आसिम मुनीर समेत पाकिस्तान का कुलीन तबका जानता है कि वह पीछे छूट गया है। ‘डम्पर ट्रक बनाम चमकदार मर्सिडीज’ वाला बयान इसी सोच को उजागर करता है। वे युद्ध तो क्या कोई झड़प भी नहीं जीत सकते। उनके पास एक ही ताकत है : भारत की रफ्तार में अड़ंगा लगाने की। इस नकारात्मक बढ़त का मुकाबला कैसे करना है, यही भारत को सीखना है। इसकी शुरुआत बड़ी तस्वीर पर नजर डालकर की जा सकती है। क्या पिछले एक दशक में पाकिस्तान को हमने अपने दिमाग में जरूरत से ज्यादा अहमियत तो नहीं दी? अपनी सियासत में उसे कहीं इतना ज्यादा वजन तो नहीं दे दिया, जितना बुद्धिमानी भरा नहीं था? आर्थिक तथा रणनीतिक रूप से हारे हुए पाकिस्तान के लिए क्या हमने अपनी ध्रुवीकृत राजनीति में अनावश्यक जगह तो नहीं बनाई? जनवरी 2016 में पठानकोट हवाई अड्डे पर आतंकवादी हमले ने जब शांति की कोशिशों को नाकाम कर दिया था, उसके बाद से भाजपा की राजनीति हिंदू-मुस्लिम ध्रुवीकरण पर ज्यादा केंद्रित होती गई है। इससे इनकार नहीं किया जा रहा कि जनकल्याण के मामले में ‘सबका साथ, सबका विकास’ नारे पर अमल हो रहा है और किसी को पहचान के आधार पर किसी लाभ से वंचित नहीं किया जा रहा है। लेकिन भावनात्मक अपील हिंदू मतदाता तक ही सीमित है। और इसके लिए पाकिस्तान से खतरे का भाव बनाए रखना जरूरी है। यह हमारे रणनीतिक हित और रुख को किस तरह जटिल बनाता है, यह बांग्लादेश के साथ किए जा रहे खेल से जाहिर हो रहा है। जमात और मुहम्मद यूनुस पाकिस्तान के बारे में चाहे जो सोचें, बांग्लादेश तीन तरफ से भारत से घिरा है और वह अपरिहार्य जुड़ाव के कारण एक जरूरी तथा कहीं बड़ा पड़ोसी है। पश्चिम बंगाल और असम के चुनाव होने वाले हैं, ऐसे में ध्रुवीकृत राजनीति का मतलब यह होगा कि भारत जब तक बांग्लादेश की नई सरकार से तालमेल बैठाएगा, इससे पहले उसके साथ संबंध और खराब होंगे। वहां की नई सरकार ने अगर पाकिस्तान के साथ दोस्ती की भी, तो वह बहुत दूर है और उसके पास संसाधन भी नहीं हैं। बांग्लादेश को अपनी राज्य-व्यवस्था और अर्थव्यवस्था को संभालने के लिए भारत के सद्भाव की जरूरत पड़ेगी। इसी तस्वीर को ध्यान में रखते हुए हमें मुस्तफिजुर रहमान (आईपीएल) के मामले पर विचार करना चाहिए। आजकल कुछ लोग ‘सॉफ्ट पावर’ जिक्र आते ही उत्तेजित हो जाते हैं। लेकिन इस उपमहादेश में क्रिकेट जितना महत्व रखता है उसके मद्देनजर यह तो भारत का ‘हार्ड पावर’ है। जब हाथ मिलाने से इनकार और किसी पाकिस्तानी से ट्रॉफी लेने से मना करने के मसले उभर रहे थे, उसी दौरान मलेशिया में हॉकी का मैच खेलते हुए भारत-पाक के खिलाड़ी न केवल हाथ मिला रहे थे, बल्कि ‘हाई फाइव’ भी कर रहे थे। क्या हॉकी खिलाड़ी कम देशभक्त थे? अपनी ध्रुवीकृत राजनीति में अनावश्यक महत्व दिया…
क्या अपनी सियासत में पाकिस्तान को हमने इतना ज्यादा वजन और अहमियत तो नहीं दे दी, जितना कि बुद्धिमानी भरा नहीं था? आर्थिक तथा रणनीतिक रूप से हारे हुए पाकिस्तान के लिए क्या हमने अपनी ध्रुवीकृत राजनीति में अनावश्यक जगह तो नहीं बना दी है?
(ये लेखक के अपने विचार हैं)
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शेखर गुप्ता का कॉलम: पाकिस्तान को इतनी अहमियत क्यों दें?


