शीला भट्ट का कॉलम: हमारे लिए सबसे बढ़कर अपने नागरिकों के हित हैं Politics & News

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3 घंटे पहले

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शीला भट्ट वरिष्ठ पत्रकार

मध्य-पूर्व में युद्ध से उत्पन्न संकट से निपटने के लिए हमारी सरकार लंबी तैयारी कर रही है। अमेरिका-इजराइल द्वारा ईरान के खिलाफ लड़ा जा रहा युद्ध- जिसे ‘एपिक फ्यूरी’ कहा जा रहा है- भारत जैसे देशों के लिए ‘एपिक रेस्क्यू’ प्रयासों की मांग करेगा। क्योंकि एक वरिष्ठ भारतीय सूत्र ने कहा है, यह युद्ध जारी रहेगा और इसके फैलने की भी संभावना है।

भारत सरकार का आकलन है कि मध्य पूर्व का यह युद्ध पूर्ण-स्तरीय संघर्ष का रूप ले चुका है, इसकी दिशा अनिश्चित रहेगी और भारत को स्थानीय सरकारों के साथ सहयोग और समन्वय करते हुए अपने नागरिकों की सुरक्षा सुनिश्चित करनी होगी। भारत समेत सभी देश आपात मोड में हैं।

अल्पकालिक और दीर्घकालिक रणनीति तैयार करने वाली टीम के एक वरिष्ठ सूत्र ने भारत की प्राथमिकताओं को मुझसे साझा किया। उन्होंने विस्तार से बताया कि खाड़ी क्षेत्र में हमारे लोग, तेल व्यापार की संभावनाएं और व्यापक सुरक्षा हित दांव पर हैं।

भारत की पहली और सबसे महत्वपूर्ण प्राथमिकता खाड़ी देशों और मध्य पूर्व के युद्धग्रस्त क्षेत्र में रहने-काम करने वाले लगभग 90 लाख से एक करोड़ भारतीय पासपोर्ट-धारकों की सुरक्षा सुनिश्चित करना है।

ट्रम्प का कहना है कि अमेरिका ईरान पर हमले तब तक जारी रखेगा, जब तक यह सुनिश्चित न हो जाए कि ईरान किसी भी प्रकार का खतरा पैदा करने में सक्षम नहीं है। यह एक अस्पष्ट बयान है, जो चल रहे युद्ध की अनिश्चितताओं को उजागर करता है। ट्रम्प का यह भी कहना है कि शुरुआत से ही हमने चार से पांच सप्ताह का अनुमान लगाया था, लेकिन हमारे पास इससे कहीं अधिक समय तक लड़ने की क्षमता है।

ट्रम्प और उनकी टीम के आक्रामक रवैये के मद्देनजर भारतीय सूत्रों ने दावा किया है कि सर्वोच्च स्तर पर भारत उन देशों के साथ सक्रिय सम्पर्क बनाए हुए है, जिन पर ईरान ने हमले किए हैं। ईरान ने खाड़ी क्षेत्र में यूएई, सऊदी अरब, कुवैत, कतर, बहरीन और ओमान पर प्रहार किए हैं। इन जगहों पर लाखों भारतीय रहते हैं। वे भय के माहौल में जी रहे हैं और अपनी सुरक्षा को लेकर चिंतित हैं, क्योंकि क्षेत्र में अमेरिकी ठिकानों पर ईरानी ड्रोन और मिसाइलें हमला कर रही हैं।

ईरान के सर्वोच्च नेता अली खामेनेई की हत्या के बाद भारत द्वारा संवेदना-संदेश जारी करने में कथित अनिच्छा को लेकर उठे विवाद पर पूछे जाने पर सरकार के एक सूत्र का कहना है कि हम अपने विकल्पों को लेकर सावधान हैं।

इस समय हमारा ध्यान खाड़ी देशों में रह रहे एक करोड़ भारतीयों पर है। उनकी सुरक्षा के लिए हम हर संभव कदम उठाएंगे। जबकि कांग्रेस संसदीय बोर्ड की अध्यक्ष सोनिया गांधी ने इस मुद्दे पर सरकार की चुप्पी की आलोचना की है।

यह किसी से छुपा नहीं है कि भारत की सुरक्षा-व्यवस्था को इजराइल से बड़ा समर्थन मिलता रहा है। इस संदर्भ में ईरान की तुलना इजराइल से नहीं की जा सकती। चाहे कारगिल हो, बालाकोट हो या ऑपरेशन सिंदूर- इजराइल हर मौके पर भारत के साथ खड़ा रहा है।

इसलिए यदि भारत की सुरक्षा आवश्यकताओं के संदर्भ में इजराइल और ईरान के बीच कोई एक चुनना पड़े, तो भारत के सामने तस्वीर स्पष्ट है। सरकार के एक वरिष्ठ सूत्र ने भी कहा है कि हम बड़ी तस्वीर को देख रहे हैं।

खाड़ी देशों के साथ हमारे बहुत अच्छे संबंध हैं। क्षेत्र के सुन्नी शासक हमारे लोगों के साथ सम्मानजनक व्यवहार करते रहे हैं। उन्होंने वर्षों में हमारे यहां अरबों डॉलर का निवेश किया है। भारतीयों की ओर से भेजी जाने वाली रेमिटेंस भी 100 अरब डॉलर से अधिक रही है। ये देश ईरानी ड्रोन और मिसाइलों के हमलों का सामना कर रहे हैं। ऐसे में हमें अपने लोगों के हित में निर्णय लेना पड़ता है।

अपने दीर्घकालिक राष्ट्रीय हितों को ध्यान में रखकर फैसला करना हमारा काम है। एक गंभीर युद्ध की स्थिति में दुनिया का हर देश अपने हितों का ध्यान रखता है। भारत भी न्यूनतम नुकसान सुनिश्चित करने के लिए ऐसा ही कर रहा है।

हर गुजरते दिन के साथ जोखिम बढ़ रहा है। खाड़ी में अपने लोगों की सुरक्षा के लिए हमें अन्य सरकारों पर निर्भर रहना पड़ेगा। घरेलू राजनीति चलती रहेगी, लेकिन सरकार को इस युद्ध से होने वाले नुकसान को न्यूनतम करना ही होगा।

खाड़ी क्षेत्र में हमारे लोग, तेल व्यापार और व्यापक सुरक्षा हित दांव पर हैं। हमारी प्राथमिकता खाड़ी देशों और मध्य पूर्व के युद्धग्रस्त क्षेत्र में रहने-काम करने वाले लगभग 90 लाख से एक करोड़ भारतीयों की सुरक्षा सुनिश्चित करना है। (ये लेखिका के अपने विचार हैं)

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