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दिल्ली और दूसरे शहरों में सीसीटीवी से पाकिस्तान के लिए हो रही जासूसी का खुलासा चिंताजनक है। लेकिन इस जासूसी का मास्टरमाइंड चीन है। चीनी सीसीटीवी कैमरों की बिक्री पर सरकार ने आज से प्रतिबंध जरूर लागू किया है, लेकिन पुराने कैमरों को हटाने की कोई योजना नहीं है। चीनी टेलीकम्युनिकेशन उपकरणों पर प्रतिबंध के बावजूद सीसीटीवी नेटवर्क पर चीनी कम्पनियों का ही वर्चस्व है। इससे चीन को भारत के सामरिक क्षेत्रों की जासूसी का अवसर मिल जाता है। इजराइल ने ईरान के सीसीटीवी और मोबाइल नेटवर्क की जासूसी करके ही सुप्रीम लीडर पर हमला किया था। मणिबेन पटेल पर प्रकाशित पुस्तक के अनुसार सरदार पटेल ने भी प्रधानमंत्री नेहरू को चेतावनी देते हुए लिखा था कि भारत की सुरक्षा के लिए पाकिस्तान से ज्यादा चीन खतरनाक है। चीनी सीसीटीवी कैमरों के खतरों से जुड़े 4 पहलुओं को समझना जरूरी है : 1. स्मार्ट सिटी, सरकारी दफ्तर, मेडिकल स्टोर, सड़क, हाईवे, रेलवे स्टेशन, ट्रेन, बस, स्कूल, एयर पोर्ट, बंदरगाह, अस्पताल और रक्षा क्षेत्रों में सरकारी आदेश की वजह से करोड़ों चीनी सीसीटीवी लगे हैं। सरकारी प्रतिबंध के बाद अब आयातित चीनी उपकरणों के माध्यम से भारत में कैमरे असेम्बल हो रहे हैं। ईरान संकट के बाद साइबर सुरक्षा के लिए बनाई गई केंद्रीय एजेंसी सीईआरटी और रक्षा मंत्रालय ने टेलीकॉम नेटवर्क से साइबर सुरक्षा के खतरे के लिए कई एडवाइजरी जारी की हैं। लेकिन गांवों, कस्बों और महानगरों में फैले सीसीटीवी नेटवर्क का नियंत्रण चीनी खुफिया एजेंसियों के पास बना हुआ है। 2. दिल्ली में 2018 के बाद दो चरणों में पीडब्ल्यूडी के माध्यम से 652 करोड़ रुपये से लगभग 2.64 लाख कैमरे लगे हैं। पुलिस और एनडीएमसी के अलावा पार्षद, विधायक और सांसद निधि से सोसाइटी और बाजारों में कैमरों का जाल बढ़ रहा है। इनमें से 32 हजार से ज्यादा कैमरे काम नहीं कर रहे। मजेदार बात यह है कि इन लाखों कैमरों के सुरक्षा ऑडिट के लिए पीडब्ल्यूडी बाहरी सलाहकार कम्पनी की नियुक्ति कर रही है, जो लगभग 6.5 साल में अपनी रिपोर्ट देगी। इस दौरान चीनी कैमरों का नेटवर्क बदस्तूर जारी रहेगा। 3. विदेशों से आयात, टेलीकॉम उपकरणों की सुरक्षा और सीसीटीवी डेटा से जुड़े विषयों पर कानून बनाने और उन्हें लागू करने की जिम्मेदारी केंद्र सरकार की है। आईटी मंत्रालय के तहत एसटीक्यूसी एजेंसी कैमरों से जुड़े सोर्स कोड, फर्म वेयर और हार्डवेयर की क्वालिटी और सुरक्षा की जांच करती है। लेकिन इसमें चार तरह से गफलत होने से संकट मंडरा रहा है। पहला- चीनी कैमरों और उपकरणों के प्रतिबंध को लागू करने के लिए कार्गो और बंदरगाहों में आयात के समय जांच का सही बंदोबस्त नहीं है। दूसरा- ताइवान, हांगकांग और दुबई के माध्यम से आयात हो रहे चीनी उपकरणों और कैमरों पर रोक नहीं है। तीसरा- बाजार में बड़े पैमाने पर गैर-मान्यता प्राप्त कैमरे बिक रहे हैं। चौथा- जनता, स्थानीय निकाय और पुलिस को कैमरों के बारे में बीआईएस और एसटीक्यूसी द्वारा जारी नियमों और मानकों की जानकारी नहीं है। 4. सुप्रीम कोर्ट के अनेक आदेशों के बावजूद पुलिस थानों और जांच एजेंसियों में सीसीटीवी नहीं लगे। घरों और बाजार में सुरक्षा के नाम पर लगाए कैमरों के डेटा की सुरक्षा के लिए डीपीडीपी कानून भी लागू नहीं हो रहा है। सुरक्षा कारणों से अमेरिका, ऑस्ट्रेलिया और यूरोप ने चीनी कैमरों के आयात पर प्रतिबंध लगा रखा है। लेकिन भारत में 2017 में जारी मेक इन इंडिया के आदेश, रजिस्ट्रेशन के बारे में 2021 के आदेश, बीआईएस के आईएस 16910 के मानक और कैमरों की खरीद के लिए मार्च 2024 में जारी सरकारी आदेशों का पालन नहीं होने से राष्ट्रीय सुरक्षा को चहुंमुखी खतरा बढ़ता जा रहा है। अमेरिका, ऑस्ट्रेलिया और यूरोप में चीनी सीसीटीवी कैमरों पर प्रतिबंध है। लेकिन भारत में जनता की सुरक्षा और अपराधों की रोकथाम के नाम पर लगे सीसीटीवी नेटवर्क का नियंत्रण चीन में होने से राष्ट्रीय सुरक्षा को खतरा बढ़ा है।
(ये लेखक के अपने विचार हैं)
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विराग गुप्ता का कॉलम: सीसीटीवी से हो रही जासूसी राष्ट्रीय सुरक्षा को बड़ा खतरा

