विराग गुप्ता का कॉलम: क्या ‘भारत टैक्सी’ ओला उबर की जगह लेने जा रही है? Politics & News

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यूपी सरकार ने ओला, उबर और रैपिडो जैसी कम्पनियों के लिए पंजीकरण और लाइसेंस फीस के भुगतान के नए नियम लागू करने के साथ ग्रामीण क्षेत्रों को सार्वजनिक परिवहन से जोड़ने का निर्णय लिया है। महाराष्ट्र सरकार ने भी ओला, उबर, रैपिडो कम्पनियों की ई-बाइक्स को जारी अंतरिम लाइसेंस को निरस्त कर दिया है। इन दोनों भाजपा शासित राज्यों के इन फैसलों को गृह मंत्री अमित शाह द्वारा लॉन्च किए गए “भारत टैक्सी’ एप के संदर्भ में समझने की जरूरत है। सहकारी मॉडल पर गुजरात और दिल्ली में भारत टैक्सी को स्वदेशी अर्थव्यवस्था की दिशा में एक महत्त्वपूर्ण कदम माना जा रहा है। इससे कैब ड्राइवरों की आमदनी बढ़ाने के साथ यात्रियों को सस्ती दरों पर सार्वजनिक टैक्सी सुविधाएं देने की सरकारी मंशा है। इस योजना में 500 रुपए के शुरुआती निवेश से ड्राइवर टैक्सी के सह-मालिक बनने के साथ अगले तीन साल में करोड़ों के संभावित मुनाफे के भागीदार हो सकते हैं। लेकिन सरकार के प्रोत्साहन के बावजूद भारत टैक्सी के प्रयोग को अपेक्षित सफलता नहीं मिल सकी है। इससे जुड़े 3 पहलुओं को समझना जरूरी है : 1. संविधान में मोटर वाहन से जुड़े विषय राज्य सरकारों के अधीन आते हैं। गाड़ियों के पंजीकरण और व्यावसायिक वाहनों के लाइसेंस के बारे में फीस लेने और कानून बनाने का अधिकार राज्य सरकारों को है। हमें याद रखना चाहिए कि वर्ष 2015 में डिजिटल इंडिया प्रोजेक्ट शुरू होने के बाद ओला, उबर जैसी एप आधारित टैक्सियों का चलन बढ़ा था।
तकनीकी तौर पर इन कम्पनियों को एग्रीग्रेटर और कानून की भाषा में इन्हें इंटरमीडियरी माना जाता है। भारत में दशकों पुराने मोटर वाहन कानून में एप आधारित टैक्सी सेवाओं के लिए कोई प्रावधान नहीं होने का कम्पनियां कई सालों से बेजा फायदा उठा रही हैं। नवीनतम तकनीक, युवाओं को रोजगार का आकर्षण और बेशुमार पूंजी की ताकत से इन कम्पनियों ने महानगरों के बाद अब छोटे शहरों में भी अपना वर्चस्व स्थापित कर लिया है। 2. कई राज्यों ने जब इन कम्पनियों के लाइसेंस के लिए नियम बनाए तो उन्हें तकनीकी आधार पर अदालत में चुनौती दी गई। कहा गया कि संविधान के अनुसार इन विषयों पर कानून बनाने का अधिकार सिर्फ केंद्र को ही है। केंद्र ने भी अनेक प्रशासनिक आदेशों के माध्यम से इन कम्पनियों को अप्रत्यक्ष अनुमति और सहूलियत प्रदान की। इसकी वजह से राज्य सरकारों के क्षेत्राधिकार के हनन के साथ राजस्व का नुकसान हो रहा है। पूंजी, तकनीक और सम्पर्कों की ताकत से लैस टेक कम्पनियों के आगे छोटे टैक्सी ऑपरेटर्स टिक नहीं पाए हैं। अंग्रेजों के समय जैसे निलहे किसानों का शोषण होता था, उसी तरह से टेक कम्पनियों के पार्टनर कहे जाने वाले ड्राइवर शोषण के दुष्चक्र का शिकार हो रहे हैं। जबकि दूसरी तरफ इन कम्पनियों और उनके अधिकारियों को अरबों रुपए का मुनाफा और वेतन मिलता है। नए श्रम और सामाजिक सुरक्षा कानून के तहत ये कम्पनियां ड्राइवरों के प्रति नियोक्ता के उत्तरदायित्व का निर्वहन करें, इसके लिए सरकार को समुचित कदम उठाने चाहिए। 3. दुनिया के कई देशों ने उबर जैसी कम्पनियों को नियोक्ता मानते हुए ड्राइवरों को कर्मचारी के कानूनी अधिकार दिए हैं। भारत टैक्सी जैसे सहकारी उद्यमों को सफल बनाने के लिए 2023 में पारित डेटा सुरक्षा कानून को लागू करके उबर जैसी ताकतवर कम्पनियों के एकाधिकार और उनके व्यापारिक मॉडल की निगरानी करने की जरूरत है। छोटे ऑटो चालकों की तर्ज पर उबर जैसी कम्पनियों को भी न्यूनतम किराये के कानून का पालन करना चाहिए। टेक कम्पनियों पर ड्राइवरों की मेडिकल, सामाजिक सुरक्षा, पुलिस जांच, यात्रियों की शिकायतों से जुड़े कानूनों को सख्ती से लागू करने की भी आवश्यकता है। सरकारी रोडवेज की बस सेवाओं का आर्थिक मॉडल अधिकांश राज्यों में विफल हो रहा है। भारत टैक्सी जैसे स्वदेशी एप्स को सफल बनाने के लिए उन्हें तकनीकी तौर पर सुगम और उन्नत बनाने के साथ अखिल भारतीय स्तर पर लागू करना होगा। सार्वजनिक यातायात, युवाओं को सम्मानजनक रोजगार और मुनाफे में भागीदारी बढ़ाने के लिए भारत टैक्सी के सहकारी प्रयोग को पूरे देश में सफल बनाना होगा। इससे आर्थिक समानता बढ़ने के साथ स्वदेशी अर्थव्यवस्था का मजबूती से विकास हो सकेगा। सहकारी मॉडल पर गुजरात और दिल्ली में “भारत टैक्सी’ एप को स्वदेशी अर्थव्यवस्था की दिशा में एक महत्त्वपूर्ण कदम माना जा रहा है। लेकिन इस तरह के पिछले प्रयोगों की तरह यह एप भी कहीं विफल नहीं हो जाए?
(ये लेखक के अपने विचार हैं)

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विराग गुप्ता का कॉलम: क्या ‘भारत टैक्सी’ ओला उबर की जगह लेने जा रही है?