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क्या अमेरिका ईरान पर हमला करेगा? बहुत से लोग मानते हैं कि मौजूदा टकराव युद्ध की ओर बढ़ने के बजाय दबाव बनाने की रणनीति है, जिस पर निर्णायक कार्रवाई से अधिक संकेत देने की कोशिश भर दिखलाई देती है। यह धारणा निराधार नहीं है। अमेरिका और ईरान के टकराव पर अनिश्चितता ज्यादा हावी है। यही ईरान के अड़ियल रुख और अमेरिका की हिचकिचाहट, दोनों का कारण बताती है। प्रतिबंधों, आर्थिक कठिनाइयों और विरोध-प्रदर्शनों के बावजूद ईरान झुकने से इनकार कर रहा है। इसका कारण यह है कि ईरान के सत्ता-कुलीनों का मकसद अपनी हुकूमत को बनाए रखना है। तेहरान में सत्ता पर काबिज नेतृत्व मानता है कि बाहरी दबाव में झुकना, अंदरूनी मुश्किलें सहने से कहीं अधिक खतरनाक होगा। वहां के राजनीतिक ढांचे में किसी भी समझौते को पतन की शुरुआत माना जाता है। इसलिए बार-बार यह नैरेटिव सामने आता है कि ईरान चाहे जितना घिरा हुआ हो, उसे हर हाल में टिके रहना होगा। यह भी उल्लेखनीय है कि विदेशी दबाव अकसर सरकारों को घरेलू मोर्चे पर नजर आने वाली असहमतियों को बाहरी साजिश करार देने का मौका देता है। इस बहाने दमन को जायज ठहराया जाता है। ऐसी धारणा बनाई जाती है कि अपने लोगों पर चाहे जितना कठोर नियंत्रण बनाए रखना हो, विदेशी दबाव में ढील देने की तुलना में यह अधिक सुरक्षित विकल्प है। क्या ट्रम्प को यकीन है कि ईरान में सत्ता-परिवर्तन वहां व्यापक विरोध-प्रदर्शनों के बिना संभव है? ऐसा मानने के पक्ष में न तो इतिहास में कोई ठोस आधार है, न ही वर्तमान वास्तविकताओं में। बाहरी ताकतों के जरिए कराया कोई भी सत्ता-परिवर्तन शांतिपूर्ण नहीं रहा है। वॉशिंगटन में चल रही मौजूदा बहस इस सच्चाई का सीधा सामना करने से बचती दिखाई देती है। सबसे बड़ी कमी एक स्पष्ट रूप से परिभाषित राजनीतिक परिणाम की है। उसके बिना सैन्य धमकियां व्यावहारिक रणनीति कम और सौदेबाजी का औजार अधिक बन जाती हैं। इस तरह की अस्पष्टता आत्मविश्वास नहीं, हिचकिचाहट का संकेत देती है। ऐसी बयानबाजियों के नीचे एक कहीं गहरा नैतिक और रणनीतिक प्रश्न छिपा होता है कि क्या राजनीतिक और सैन्य उद्देश्यों को तब वैध माना जा सकता है, जब उन्हें हासिल करने की कीमत हजारों नागरिकों की जान हो? आधुनिक युद्धों का अनुभव इस प्रश्न का उत्तर बार-बार ‘नहीं’ के रूप में देता रहा है। व्यापक मानवीय त्रासदी के जरिये हासिल की गई जीतें अकसर अपनी ही वैधता को नष्ट कर देती हैं। वे समाजों को कट्टर बनाती हैं, क्षेत्रों को अस्थिर करती हैं और भविष्य के संघर्षों के बीज बोती हैं। इराक इसका सबसे सशक्त उदाहरण है। वहां तुरत-फुरत में हासिल की गई सैन्य सफलता के बाद लंबी राजनीतिक विफलता, सांप्रदायिक हिंसा और क्षेत्रीय अस्थिरता देखी गई। ऐसे मामलों में जीत का भ्रम, दरअसल रणनीतिक पराजय को केवल टालता है। एक गलतफहमी यह भी है कि ईरान को अमेरिका के लिए गंभीर खतरा बनने के लिए उसकी सैन्य ताकत की बराबरी करनी होगी। जबकि ईरान की प्रतिरोधक रणनीति को जानबूझकर इस तरह से तैयार किया गया है कि वह राजनीतिक, आर्थिक और मनोवैज्ञानिक नुकसान पहुंचा सके। होर्मुज की खाड़ी में जहाजों के आवागमन को बाधित करने की उसकी क्षमता, मिसाइलों और ड्रोन के जरिये नौसैनिक ठिकानों को निशाना बनाना या किसी बड़े पोत को क्षति पहुंचाना ऐसे कदम हो सकते हैं, जिनके परिणाम अपेक्षाकृत छोटे साधनों के बावजूद असाधारण रूप से बड़े हों। अमेरिका के किसी विमानवाहक पोत या किसी महत्वपूर्ण समुद्री मार्ग पर ईरान का एक भी वार वैश्विक बाजारों को झकझोर सकता है, अमेरिकी प्रतिष्ठा को गहरी चोट पहुंचा सकता है, जनता के दबाव के तहत राजनीतिक और सैन्य उकसावे को मजबूर कर सकता है और ऐसे घटनाक्रमों को जन्म दे सकता है, जिन पर किसी भी पक्ष का पूरा नियंत्रण न रहे। ईरान को अमेरिका को सैन्य रूप से पराजित करने की आवश्यकता नहीं है। उसे केवल इतना भर करना है कि किसी हस्तक्षेप की राजनीतिक कीमत को असहनीय बना दे। और अमेरिका इस हकीकत को समझता है। इसीलिए फिलहाल दोनों पक्ष लड़ाई को बढ़ाने के लिए तैयार नहीं लगते हैं। युद्ध ऊंची आवाज में दी गई धमकियों से नहीं शुरू होते। वे तब शुरू होते हैं, जब दोनों में से किसी एक पक्ष के सामने अपने लक्ष्य पूरी तरह से स्पष्ट हो जाते हैं। ईरान के मामले फिलहाल अमेरिका के लक्ष्य अभी पूरी तरह से अस्पष्ट हैं।
(ये लेखक के अपने विचार हैं)
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लेफ्टिनेंट जनरल सैयद अता हसनैन का कॉलम: अमेरिका के पास ईरान पर हमले की ठोस वजहें नहीं हैं

