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- Lt. Gen. Syed Ata Hasnain’s Column A Post war Russia Will Be Very Beneficial To Us
2 घंटे पहले
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लेफ्टिनेंट जनरल सैयद अता हसनैन कश्मीर कोर के पूर्व कमांडर
यूक्रेन युद्ध के बाद वाला रूस भारत के लिए एक महत्वपूर्ण सामरिक अवसर प्रदान करने वाला होगा। यदि प्रतिबंधों में ढील मिलती है और रूस धीरे-धीरे वैश्विक बाजारों में लौटता है, तो चीन पर उसकी निर्भरता कम होगी। इससे भारत को ऊर्जा, रक्षा और क्षेत्रीय कूटनीति में रूस के साथ अधिक सहजता से पुनः जुड़ने की गुंजाइश मिलेगी और वह भी अमेरिका को असहज किए बिना। यूरोप में शांति भारत-अमेरिका संबंधों को जटिल नहीं, बल्कि सरल बना सकती है।
यूक्रेन संघर्ष अब सिर्फ क्षेत्रीय महत्वाकांक्षा से संचालित नहीं है। इसे राजनीतिक थकान, आर्थिक दबाव और लंबे समय तक नजरअंदाज की गई कमियों पर देरी से निर्मित हुई समझ आकार दे रही है। इस संघर्ष के केंद्र में वह सच्चाई रही है, जिसे नाटो लंबे समय तक स्वीकारना नहीं चाहता था। यह कि रूस पूर्व दिशा में नाटो के विस्तार को एक सीमा तक ही बर्दाश्त कर सकता था।
मास्को के लिए यूक्रेन कोई साधारण पड़ोसी नहीं था; वह उसके लिए एक ऐतिहासिक सुरक्षा-मोर्चा था, जहां से सदियों से रूसी शक्ति को चुनौती मिलती रही है। ऐसे में जब कीव पश्चिम की ओर झुकने लगा तो क्रेमलिन ने इसे अपनी घेराबंदी की तरह देखा। इनमें भी दो रणनीतिक परिसंपत्तियां विशेष रूप से ऐसी थीं, जिन पर रूस कोई समझौता नहीं कर सकता था। क्रीमिया- जो 2014 से रूस की सैन्य-व्यवस्था का हिस्सा है- और काला सागर की तटरेखा- जो भूमध्यसागर तक रूस का एकमात्र भरोसेमंद मार्ग है।
ये दोनों रूस की नौसैनिक शक्ति और ऊर्जा-रणनीति की धुरी थे। इन्हें त्यागकर कोई भी रूसी नेतृत्व राजनीतिक रूप से टिक नहीं सकता था। 2022 में शुरू हुआ यह युद्ध क्रूर और महंगा साबित हुआ है और रूस ने अपने शुरुआती आकलनों में गंभीर चूक की है। लेकिन तीसरे वर्ष तक यह संघर्ष एक कठोर सामरिक गतिरोध में बदल गया। असाधारण साहस और पश्चिम के निरंतर सहयोग के बावजूद यूक्रेन डोनबास से रूसी सेना को पीछे धकेलने में सक्षम नहीं रहा है। नाटो युद्ध में प्रत्यक्ष भागीदारी नहीं कर रहा है। वहीं रूस भी दनिपर से आगे बढ़ने में असफल रहा है।
नतीजा यह है कि कोई भी पक्ष निर्णायक विजय का दावा नहीं सकता; दोनों ही लंबे और थकाऊ ठहराव में फंसे हैं। इस गतिरोध की कीमत अब सभी पक्षों पर भारी पड़ने लगी है। यूरोप एनर्जी की ऊंची कीमतों, बढ़ते रक्षा खर्च और आर्थिक सुस्ती से बोझिल है। रूस प्रतिबंधों से आहत है, हालांकि वह इसके बावजूद तेल निर्यात के नए मार्गों और युद्धकालीन लामबंदी के सहारे दबाव झेलने में सफल रहा है। सबसे महत्वपूर्ण, अमेरिका में इस युद्ध को लेकर रणनीतिक थकान के संकेत स्पष्ट दिखने लगे हैं और जनता में इसे निरंतर समर्थन देने का उत्साह घटा है।
ट्रम्प यूक्रेन को नैतिक संघर्ष के रूप में नहीं, बल्कि रणनीतिक बोझ के रूप में देखते हैं। कीव को सैन्य सहायता रोकने की उनकी चेतावनी आकस्मिक नहीं थी। अमेरिका अब यूक्रेन का सहायक नहीं, बल्कि दबावकारी वार्ताकार बनकर उभरा है। इस मोड़ को भांपते हुए रूस का आत्मविश्वास स्पष्ट है। यूक्रेनी मोर्चे के निकट जनरलों के साथ पुतिन की लगातार बैठकों, कुछ क्षेत्रों में सेना की स्थिति मजबूत करने के कदमों और राजनीतिक समाधान पर चर्चा के प्रति उनके संयत संकेत- ये सब बताते हैं कि मास्को को लगता है उसके मूल लक्ष्य या तो सुरक्षित हो चुके हैं या अब उसकी पकड़ में हैं।
उधर यूरोप में अस्थिरता झलक रही है। जर्मनी द्वारा यह स्वीकार करना कि यूक्रेन को कठिन रियायतें देनी पड़ सकती हैं, एक वर्ष पहले अकल्पनीय था। नाटो के कुछ सैन्य अधिकारी जहां बढ़ते तनाव की बात सहजता से करते हैं, वहीं यूरोपीय राजनीतिक नेतृत्व एक परमाणु शक्ति से प्रत्यक्ष टकराव के खतरे को भली-भांति समझता है। क्या पश्चिम एक ऐसे सामरिक समझौते की ओर खिसक रहा है, जिसे वह कभी सार्वजनिक रूप से आत्मसमर्पण नहीं कहेगा?
मास्को के लिए तो युद्ध केवल तभी समाप्त हो सकता है, जब उसे इस बात का भरोसेमंद आश्वासन मिले कि नाटो का पूर्व सोवियत भू-क्षेत्र में विस्तार रुक गया है। रूस के लिए यह किसी विचारधारा का नहीं अस्तित्व का प्रश्न है। यूक्रेन के सामने भी उसके अस्तित्व के लिए खतरे का अंदेशा है।
- युद्ध विरले ही किसी सहमति से समाप्त होते हैं; वे तब समाप्त होते हैं जब थकान, भय और जमीनी हकीकतें एक बिंदु पर आकर मिलने लगते हैं। रूस और यूक्रेन के संघर्ष में वह क्षण अब निकट लगता है। यह हमारे लिए भी शुभ संकेत होगा।
(ये लेखक के अपने विचार हैं)
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लेफ्टिनेंट जनरल सैयद अता हसनैन का कॉलम: युद्ध के बाद वाला रूस हमारे लिए बहुत फायदेमंद होगा
