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जो लोग अपनी राजनीतिक विचारधारा को लेकर सबसे ज्यादा मुखर और आक्रामक होते हैं, असल में उन्हें जमीनी तथ्यों की जानकारी सबसे कम होती है, एक ताजा मनोवैज्ञानिक शोध में यह खुलासा हुआ है। जर्नल ऑफ एक्सपेरिमेंटल साइकोलॉजी एप्लाइड में प्रकाशित स्टडी बताती है राजनीति में कम जानकारी रखने वाले लोग अक्सर खुद को बड़ा जानकार समझते हैं। मनोविज्ञान में इसे ‘डनिंग-क्रूगर इफेक्ट’ कहते हैं। यह ऐसा मानसिक भ्रम है जिसमें व्यक्ति अपनी अयोग्यता पहचान नहीं पाता और खुद को दूसरों से बेहतर समझने लगता है। स्टडी में शामिल लोगों को राजनीति के 60 मुश्किल सवालों का सामना करना पड़ा। नतीजे बताते हैं औसतन हर व्यक्ति खुद को राजनीति का बड़ा ‘विशेषज्ञ’ समझ रहा था, पर दो समहों का प्रदर्शन सबसे खराब रहा एक वे जिन्हें राजनीति की वाकई बहुत कम समझ थी, और दूसरे वे जो दक्षिणपंथी विचारधारा की ओर झुकाव रखते थे। यह रिसर्च पुष्टि करती है कि शोर मचाने वाले हर ‘पॉलिटिकल एक्सपर्ट’ के पास सटीक जानकारी हो, यह जरूरी नहीं; बल्कि कम जानकारी भी इंसान को ज्यादा आत्मविश्वासी और मुखर बना देती है। असली फर्क तो तथ्यों से ही पड़ता हैः एक्सपर्ट प्रो. एरिका कहती हैं कि रिसर्च टीम का उद्देश्य किसी खास समूह को नीचा दिखाना नहीं है। उनका कहना है कि चाहे आप किसी भी पार्टी को पसंद करें, असली फर्क इस बात से पड़ता है कि आप तथ्यों को कितना जानते हैं। वोट देने से पहले भी यही बात ध्यान रखनी जरूरी है। इदाहो स्टेट यूनिवर्सिटी की प्रोफेसर एरिका फुल्टन कहती हैं, ‘स्टडी में ‘राजनीतिक ज्ञान’ का मतलब केवल पक्के तथ्यों से था। जैसे संसद का स्पीकर कौन है या कानून पास कराने के लिए कितने वोट जरूरी हैं। इसमें कोई भी भावनात्मक या भड़काऊ जानकारी शामिल नहीं थी। यह स्पष्टीकरण इसलिए जरूरी है क्योंकि पूरा नतीजा सिर्फ तथ्य पर आधारित है, न कि किसी की निजी राय या विचारधारा पर। मुमकिन है कि शोर-शराबे या उकसाने वाले माहौल में लोगों के जवाब और उनके आत्मविश्वास के नतीजे अलग हों।
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राजनीति पर मुखर लोग जमीनी तथ्यों से दूर होते हैं: स्टडी के अनुसार- जानकारी जितनी कम, ‘शोर’ उतना ही ज्यादा; कम जानकारी भी आत्मविश्वासी बना देती है



