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- Rajdeep Sardesai’s Column Congress Needs A High Command That Can Take Tough Decisions
2 घंटे पहले
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राजदीप सरदेसाई वरिष्ठ पत्रकार
अगर ‘सेल्फ-गोल’ करने की कोई प्रतियोगिता हो तो कांग्रेस उसमें आसानी से स्वर्ण पदक जीत सकती है। कर्नाटक में डीके शिवकुमार और सिद्धारमैया में से ‘कौन बनेगा मुख्यमंत्री’ वाला राजनीतिक नाटक हफ्तों से सुर्खियों में है। महत्वाकांक्षी क्षत्रपों और कमजोर ‘हाईकमान’ के जायके को मिलाकर कन्नड़ी खिचड़ी पकाई जा रही है। सवाल है कि कांग्रेस के इस आखिरी राजनीतिक दुर्ग में गड़बड़ी के लिए कौन जिम्मेदार है?
डीकेएस और सिद्धा बिलकुल विपरीत प्रकृति के हैं। डीकेएस कद्दावर, साधन सम्पन्न, जोशीले हैं। एक डीलमेकर- जो अपनी महत्वाकांक्षाओं को छिपाते नहीं। सिद्धा पुराने चलन के नेता हैं- अत्यधिक सचेत, और उतने ही चतुर भी। डीकेएस खुलकर बोलते हैं, सिद्धारमैया शब्दों की ऐसी बाजीगरी करते हैं कि विरोधी अटकलें लगाते रह जाएं। डीकेएस पार्टी के प्रति निष्ठावान हैं और संगठनात्मक सफलताओं का रिकॉर्ड रखते हैं, तो सिद्धा ने खुद को पिछड़ों, दलितों, मुसलमानों के जनाधार वाले नेता के रूप में स्थापित किया है।
अगर हालात अनुकूल होते तो शायद कांग्रेस दोनों के लिए सौहार्दपूर्ण हल निकाल लेती। लेकिन उसके दिन फिलहाल अच्छे नहीं चल रहे। वर्षों की जड़ता ने उसकी विवाद सुलझाने की क्षमता समाप्त कर दी है। उदाहरण के लिए, ढाई-ढाई साल की रोटेशनल मुख्यमंत्री की व्यवस्था ही देख लें। यह अजीब है और भारतीय संदर्भ में कतई कारगर नहीं। इस देश में कोई भी मर्जी से ‘कुर्सी’ नहीं छोड़ता।
अगर कांग्रेस ने वाकई डीकेएस को सिद्धारमैया के बाद सीएम बनाने का वादा किया था तो इसका मतलब है पहले कई बार नुकसान उठाने के बावजूद उसने फिर वही पुराना ढर्रा अपनाया। इस रोटेशन मॉडल ने राजस्थान में कलह और बगावत कराई, छत्तीसगढ़ में यह फॉर्मूला अंत समय पर गड़बड़ा चुका तो कर्नाटक में कैसे कारगर होगा?
समस्या ये है कि कांग्रेस का कथित ‘हाईकमान’ कठिन समय में कड़े फैसले लेने में या तो अनिच्छुक है या फिर असमर्थ। 2024 के चुनावों में कांग्रेस के ‘रिवाईवल’ या कहें ‘सर्वाइवल’ के कारण राहुल गांधी का पार्टी कार्यकर्ताओं में सम्मान बढ़ा था। संविधान की प्रति हाथ में लेकर उन्होंने भाजपा की रफ्तार को चुनौती दी थी। संघ परिवार को निशाना बनाने के उनके पक्के इरादों ने कांग्रेस के भीतर उन्हें निर्विवाद नेता बना दिया। लेकिन एक मजबूत नेता की तरह अपनी बात मनवाने के बजाय राहुल ने जटिल संगठनात्मक मुद्दे सुलझाने का जिम्मा अपने वफादारों, खासकर केसी वेणुगोपाल को सौंप दिया।
नतीजतन, 2024 की बढ़त हाथ से फिसल गई। हरियाणा की हार अति-आत्मविश्वास का नतीजा थी। ऐन वक्त पर महिलाओं के लिए कैश ट्रांसफर स्कीम लाकर भाजपा ने महाराष्ट्र भी हथिया लिया। दिल्ली और बिहार में तो कांग्रेस के चुनाव अभियान शुरू से ही कमजोर थे। हर हार के साथ ‘हाईकमान’ कड़े फैसले लेने में और हिचकिचाने लगा। अब कर्नाटक की पहेली पर लौटते हैं। सच में वहां कोई आसान हल नहीं है।
सिद्धा के पास अभी भी अधिकतर विधायकों का समर्थन है और अपनी ओबीसी पहचान के कारण वे कांग्रेस के एजेंडा पर भी फिट बैठते हैं। सिद्धा से 14 साल छोटे 63 वर्षीय डीकेएस उनसे कहीं ज्यादा ऊर्जावान हैं। ऐसे में सिद्धा के स्थान पर डीकेएस आते हैं तो यह एक ऐसी पार्टी में पीढ़ीगत बदलाव जैसा होगा, जो अपने बुजुर्ग नेताओं को ‘मार्गदर्शक मंडल’ में भेजने में हिचकती है। मध्य प्रदेश और राजस्थान में कांग्रेस पीढ़ीगत बदलाव से डरी और नुकसान उठाया। अब कर्नाटक में मौका है, लेकिन सिद्धा चुपचाप पीछे हटने वालों में से नहीं।
मान लीजिए कि अभी चल रही अटकलों जैसा कोई सत्ता हस्तांतरण 2027 में हो भी जाए, तो यह समझौता कब तक टिकेगा? भाजपा गुजरात में बिना किसी असहमति के एक रात में सभी मंत्रियों के इस्तीफे ले सकती है, क्योंकि भारतीय राजनीति का असली ‘हाईकमान’ 7, लोक कल्याण मार्ग और 6-ए, कृष्ण मेनन मार्ग पर है- जहां भाजपा के सभी महत्वपूर्ण फैसले किए जाते हैं। कांग्रेस के पास गुजरात की जोड़ी नंबर-1 जैसा कुछ नहीं है। जब हाईकमान नदारद या कमजोर हो तो सियासी जंगल के नियम बदल जाते हैं। कर्नाटक में इसीलिए ‘अपनी ढपली, अपना राग’ का आलम नजर आता है।
- अगर हालात अनुकूल होते तो कर्नाटक में कांग्रेस डीके शिवकुमार और सिद्धारमैया के लिए कोई सौहार्दपूर्ण हल निकाल सकती थी। लेकिन उसके दिन फिलहाल अच्छे नहीं चल रहे। वर्षों की जड़ता ने उसकी विवाद सुलझाने की क्षमता समाप्त कर दी है।
(ये लेखक के अपने विचार हैं)
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राजदीप सरदेसाई का कॉलम: कांग्रेस को सख्त फैसले लेने वाले हाईकमान की जरूरत

