राजदीप सरदेसाई का कॉलम: असहमति को ही अव्यवस्था समझ लेना लोकतंत्र नहीं है Politics & News

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दिल्ली में एआई समिट के दौरान यूथ कांग्रेस के ‘शर्टलेस’ विरोध ने वैसी ही प्रतिक्रियाएं उत्पन्न कीं, जिसकी उम्मीद की जा सकती थी। कुछ ही मिनटों में सोशल मीडिया और प्राइम-टाइम चैनलों ने उस दृश्य पर अपना फैसला सुना दिया कि यह विरोध भटका हुआ, असहज करने वाला और यहां तक कि राष्ट्रीय शर्म का विषय है। निजी रूप से, मैं भी एक बड़े वैश्विक सम्मेलन के संदर्भ में इसे उचित नहीं समझता। लेकिन लोकतांत्रिक बहसें इसी प्रकार की असहमति पर आधारित होती हैं। हर विरोध विवेकपूर्ण नहीं होता। हर नारा प्रभावी नहीं होता। अकसर तो विरोध का उद्देश्य केवल ध्यान आकर्षित करना होता है। जैसा कि कांग्रेस के एक नेता ने कहा भी कि- अगर हमने इस शैली में विरोध न किया होता, तो किसी चैनल ने हमें कवर नहीं किया होता! यूथ कांग्रेस का वह विरोध-प्रदर्शन अनुचित, यहां तक कि लापरवाह भी प्रतीत हो सकता है। किंतु हमें याद रखना चाहिए कि किसी विरोध को नापसंद करना, शांतिपूर्ण विरोध के अधिकार को अवैध ठहराने के समान नहीं है। यही कारण था कि जब दिल्ली पुलिस ने प्रदर्शनकारियों को गैर-जमानती धाराओं के तहत गिरफ्तार किया और उन पर राष्ट्र के विरुद्ध साजिश का आरोप लगाया, तो यह तमाम विरोधों को चेताने जैसा था। दिल्ली पुलिस उसी प्लेबुक का अनुसरण कर रही है, जिसके चलते धारा 144 का उपयोग सार्वजनिक सभाओं को रोकने के लिए किया जा रहा है। सार्वजनिक जीवन में लोकतांत्रिक स्पेस पहले ही सिकुड़ रहा है। विपक्ष के नेता को संसद में बोलने नहीं दिया जाता। स्वयं संसद भी सरकार के विधेयकों को ठेलकर पारित करने के उपकरण में बदलती जा रही है। सत्ता में बैठी पार्टी से असुविधाजनक प्रश्न पूछे नहीं जाते। विश्वविद्यालय परिसरों पर कड़ी निगरानी है। वैकल्पिक दृष्टिकोण की कोई भी अभिव्यक्ति ‘राष्ट्र-विरोधी’ करार दे दी जाती है। सिविल सोसायटी भी सत्ता को चुनौती देने से हिचकने लगी है। लेकिन लोकतंत्र वह व्यवस्था नहीं है, जिसमें केवल विवेकपूर्ण लोगों को ही बोलने की अनुमति हो। ये वो व्यवस्था है, जो शोर मचाने, असुविधाजनक होने, अतिरेकपूर्ण होने- यहां तक कि गलत होने तक की स्वतंत्रता की रक्षा करती है। लोकतांत्रिक परिपक्वता की वास्तविक कसौटी यह नहीं है कि हम उन विरोध-प्रदर्शनों के साथ कैसा व्यवहार करते हैं जिनसे हम सहमत होते हैं, बल्कि यह है कि हम उन विरोध-प्रदर्शनों पर कैसी प्रतिक्रिया देते हैं, जिन्हें हम स्वयं कष्टप्रद या निरर्थक मानते हैं। लेकिन शासन-प्रवृत्ति प्रायः इसके विपरीत होती है। कोई विरोध यातायात को बाधित करता हो, किसी कार्यक्रम में खलल डालता हो या तंत्र को असहज करता हो तो उस पर प्रशासनिक प्रतिक्रिया त्वरित होती है। इस कार्रवाई का उद्देश्य सार्वजनिक व्यवस्था से अधिक आम धारणा के प्रबंधन का हो जाता है। समस्या तब उत्पन्न होती है, जब यह प्रवृत्ति सीमाएं लांघने लगती है। गैर-जमानती धाराएं गंभीर अपराधों के लिए होती हैं, शांतिपूर्ण प्रदशनों के लिए नहीं। उनका अंधाधुंध उपयोग समाज तक यह संदेश पहुंचाता है कि उसे विरोध की कीमत चुकानी पड़ सकती है। भारत का अपना इतिहास पर्याप्त चेतावनियां देता है। 1970 के दशक में जेपी के आंदोलन को भी अराजक और गैर-जिम्मेदार करार दिया गया था। किंतु उस पर राज्यसत्ता की कठोर प्रतिक्रिया (आपातकाल) ने ही अंततः उसे परिभाषित किया। असहमति को अव्यवस्था समझकर लोकतंत्र खुद को मजबूत नहीं बना सकता। लेकिन हम इस कथानक को निकट-अतीत में बार-बार देख चुके हैं : भ्रष्टाचार-विरोधी आंदोलन, नागरिकता कानून के विरोध में प्रदर्शन, किसानों के आंदोलन- इनमें से हरेक को तीखी आलोचना का सामना करना पड़ा है। किंतु लोकतंत्र की वैधता के लिए यह आवश्यक है कि असहमति का अधिकार कायम रहे। वैसे भी लोकतंत्र हमेशा से ही प्रतीकात्मकता के रंगमंच रहे हैं। काली पट्टियां, अनशन, साइलेंट मार्च, नुक्कड़ नाटक- विरोध की अभिव्यक्तियां प्रायः सुव्यवस्थित या सौंदर्यपरक नहीं होतीं। याद कीजिए 2004 में मणिपुर की 12 महिलाओं ने असम राइफल्स मुख्यालय के सामने कैसे नग्न होकर प्रदर्शन किया था। उस एक कृत्य ने उस समय मणिपुर में व्याप्त संकट की गंभीरता को लेकर पूरे देश को झकझोर दिया था। ‘शर्टलेस’ प्रदर्शन बचकाना जरूर कहा जा सकता है, लेकिन इसे राष्ट्रीय शर्म का दर्जा अतिशयोक्ति है। भारतीय गणराज्य इतना कमजोर नहीं है कि एक प्रदर्शन मात्र से उसकी प्रतिष्ठा ध्वस्त हो जाए। विडम्बना तो यह है कि सरकारें प्रायः किसी विरोध पर अतिरेकपूर्ण प्रतिक्रिया देकर उसे और प्रचारित ही कर देती हैं। एक आत्मविश्वासी लोकतंत्र जहां इस बात को स्वीकार करता है कि सार्वजनिक व्यवस्था महत्वपूर्ण है, वहीं वह संयम का महत्व भी जानता है। विरोध पर नजर रखना एक बात है और असहमति को अपराध करार देना दूसरी।
(ये लेखक के अपने विचार हैं)

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राजदीप सरदेसाई का कॉलम: असहमति को ही अव्यवस्था समझ लेना लोकतंत्र नहीं है