रश्मि बंसल का कॉलम: नारियल पानी वालों करो न गुरूर, चाय का है अपना सुरूर Politics & News

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44 मिनट पहले

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रश्मि बंसल, लेखिका और स्पीकर

मेरी बेटी को चाय बिलकुल पसंद नहीं। वो सिर्फ कॉफी पीती है। सोचा था, वो बड़ी होगी, कहेगी- मम्मी, एक कप चाय बना दूं? साथ पीएंगे। वो दिन कभी आया नहीं। मेरी नाक के नीचे मेरे खून ने मुझसे ही बगावत कर दी!

और अब हमारे घर में एक जंग छिड़ी हुई है- चाय बेहतर या कॉफी? वैसे बचपन में मैंने भी कभी चाय नहीं पी थी, होस्टल में जाकर आदत पड़ी। फिर ऑफिस में 11 बजे और 3 बजे इंतजार रहता था- कब टपरी से बालू आएगा, चाय का घूंट पिलाएगा।

मुम्बई में इसे कहते हैं ‘कटिंग’- शीशे के एक छोटे ग्लास में जरा-सी चाय आती है। लेकिन आहाहाहा, क्या किक देकर जाती है। पहला सिप मानो अमृत- मीठी, कड़क, अदरक-भरी। थके मन, झुके तन को जगा देने वाला घूंट।

बॉस की चिड़चिड़ाहट को शांत करने वाला घूंट। भूत-प्रेत को डरा देने वाला घूंट।

यह वो चाय है जिसके सहारे देश का पहिया घूमता है। बूढ़ा और नौजवान झूमता है। लेकिन मेरी बेटी नहीं। उसका मानना है कि कॉफी ही वो एकमात्र ड्रिंक है जिसे पीकर दिन शुरू होता है। चाहे उसे बनाने में आधा दिन निकल जाए।

पहले वो कॉफी बीन्स ग्राइंडर में पीसती है, फिर फिल्टर पेपर से सींचती है। इस लंबे-चौड़े प्रोसेस के बाद मिलता है काला पानी, जिसे शौकीन कहते हैं- ‘फ्रेश ब्रू’। जी हां, ऐसे ही फैंसी शब्दों से कॉफी ने हमारे जेन-जी का दिल और दिमाग जीत लिया है।

एक तो कॉफी शॉप इतनी ठंडी-ठंडी, कूल-कूल। इसकी तुलना में कहां चाय की टपरी का टूटा हुआ स्टूल। स्टारबक्स में कॉफी की इतनी वैरायटी, कि सटक गई चायप्रेमी सोसाइटी। अब तो आंटी-अंकल भी कैप्पुचीनो पीने वहां जाते हैं, लेकिन क्या सचमुच वो आनंद पाते हैं? सबसे बड़ा धोखा यह- चाय के नाम पर ‘चाय-लाते’ (chai-latte)। यह एक ऐसा गंदा ड्रिंक है, जो मैंने पहली बार अमेरिका में पिया और तुरंत फेंक दिया। बचपन में एग्जाम के पहले दूध में नेस्कैफे घोल कर जो अपमान हमने कॉफी का किया, शायद उसी के बदले में गोरों ने ‘चाय-लाते’ ईजाद किया।

खैर, जो भी विदेश गया है, वो जानता है कि बाकी दुनिया चाय के नाम पर कुछ बकवास ही बिक रहा है। अगर आपने रेस्तरां में चाय मंगाने की बेवकूफी की तो आपको मिलेगा गरम पानी और एक टी-बैग।

वो टी-बैग एक नाजुक-सी अप्सरा है, जो आपके चाय के कप में दस मिनट के डांस के बाद पानी को हल्का सा भूरा करेगी। बस। उससे भी बदतर है हर्बल टी। भाई, वो तो आप दवाई समझकर पी लो, चाय का नाम क्यों खराब करते हो? वैसे हर्बल कॉफी तो मैंने कभी सुनी नहीं, तो फिर चाय के ही साथ यह बदसलूकी क्यों? और ‘ग्रीन टी’ ने तो हद ही कर दी। आजकल सरकारी दफ्तरों में भी लोग यही पी रहे हैं, कहते हैं स्वास्थ्य के लिए अच्छी है।

असली समस्या आपको बताऊं- चाय पीने वालों में अब एकता नहीं! आप चार लोगों से पूछो- चाय लोगे- तो चार जवाब आते हैं। एक कहता है बिना शक्कर, एक कहता है कम दूध। किसी को मसाला तेज चाहिए, किसी को नो अदरक नो इलायची। भाई, चार कप के लिए चार पतीले कौन चढ़ाएगा?

खैर, चाय-कॉफी के वाद-विवाद के बीच एक नया प्राणी प्रकट हुआ है। जो कहता है- नो थैंक यू, दोनों ही जहर हैं। मैं तो सिर्फ नारियल पानी पीता हूं। मतलब वो योगा या हेल्थ फ्रीक, जिसने हम चाय-कॉफी वालों को बुरी आदत पालने वालों का खिताब दे दिया है।

नारियल पानी वालो, करो न गुरूर। चाय-कॉफी का है अपना सुरूर। हमें सुबह-शाम जो सुकून मिलता है, अंदर से हमारा जो दिल खिलता है। आपको वो सुख प्राप्त नहीं, हमें आदत का पश्चाताप नहीं। चाय की टपरी के आगे होती हैं बातें, कलकत्ते के कॉफी हाउस में ढलती हैं रातें।

नारियल पानी में वो दम नहीं, दीवानों को कोई गम नहीं। जिंदगी थोड़ी छोटी भी हो, कमर थोड़ी मोटी भी हो। आओ तुम्हारे लिए एक चाय बना दूं, मूड तुम्हारा ठीक करा दूं। चीनी कम लेते हो, कोई बात नहीं, दो कण प्यार के घोल दिए हैं, स्वाद लो वही।

चाय की टपरी के आगे होती हैं बातें, कलकत्ते के कॉफी हाउस में ढलती हैं रातें। आओ तुम्हारे लिए एक चाय बना दूं, मूड तुम्हारा ठीक करा दूं। चीनी कम लेते हो, कोई बात नहीं, दो कण प्यार के घोल दिए हैं, स्वाद लो वही। (ये लेखिका के अपने विचार हैं)

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