मोहम्मद जमशेद का कॉलम: इससे पहले दुनिया ने होर्मुज पर ध्यान क्यों नहीं दिया था? Politics & News

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मौजूदा युद्ध के सबसे महत्वपूर्ण घटनाक्रमों में से एक ईरान द्वारा होर्मुज से गुजरने वाले जहाजों पर टोल लागू करने का निर्णय है। यह एक सुविचारित रणनीतिक कदम है, जिसका उद्देश्य होर्मुज पर दीर्घकालिक नियंत्रण स्थापित करना और तेल व गैस निर्यात से परे राजस्व का एक स्थायी स्रोत तैयार करना है। यह घटनाक्रम भू-अर्थशास्त्र के बढ़ते महत्व को सामने लाता है- आर्थिक लाभ के लिए भूगोल, संसाधनों और बुनियादी ढांचों का रणनीतिक उपयोग। ईरान का यह कदम एक महत्वपूर्ण संपत्ति का उपयोग करने का प्रयास दर्शाता है, फिर इसका वैश्विक व्यापार पर चाहे जो प्रभाव पड़े। अलबत्ता इतिहास में पहले भी ऐसे कदम उठाए जा चुके हैं। ईरान द्वारा कथित रूप से प्रस्तावित प्रति जहाज लगभग 20 लाख डॉलर का ट्रांजिट-शुल्क यह संकेत देता है कि वह होर्मुज को एक राजस्व उत्पन्न करने वाले रणनीतिक अवरोध-बिंदु (चोकपॉइंट) में बदलना चाहता है। इस निर्णय के व्यापक प्रभावों को देखते हुए इसका सावधानीपूर्वक विश्लेषण आवश्यक है। अपने दूसरे महीने में प्रवेश कर चुका यह युद्ध पश्चिम एशिया के बड़े हिस्से को चपेट में ले चुका है। इससे वैश्विक व्यापार- विशेषकर ऊर्जा क्षेत्र गंभीर रूप से प्रभावित हुआ है। वे देश जो खाड़ी क्षेत्र से कच्चे तेल और एलएनजी पर अत्यधिक निर्भर हैं, वे मुसीबतों का सामना कर रहे हैं। फारस की खाड़ी वैश्विक ऊर्जा निर्यात का महत्वपूर्ण केंद्र बनी हुई है, जहां से कुवैत, सऊदी अरब, यूएई, इराक और ईरान जैसे प्रमुख उत्पादक समुद्री परिवहन के लिए होर्मुज पर निर्भर हैं। ओमान और ईरान के बीच स्थित यह संकरा मार्ग दुनिया के लगभग 25 प्रतिशत तेल और एलएनजी आपूर्ति के आवागमन को संभव बनाता है। ईरान-इराक युद्ध के दौरान भी तेल-गैस का प्रवाह उतना बाधित नहीं हुआ था, जितना आज देखा जा रहा है। पारंपरिक सीमा-आधारित युद्धों के विपरीत यह संघर्ष मिसाइल, वायु शक्ति, ड्रोन और सैटेलाइट-आधारित क्षमताओं के चलते कई आयामों में फैला हुआ है। चोकपॉइंट्स वे संकीर्ण समुद्री मार्ग हैं, जो वैश्विक व्यापार के 80 प्रतिशत से अधिक हिस्से को संभव बनाते हैं। प्रमुख चोकपॉइंट्स में पनामा और स्वेज नहर, टर्किश स्ट्रेट्स, बाब अल-मंदब, होर्मुज और मलक्का के जलडमरूमध्य शामिल हैं। जहां पनामा और स्वेज नहरें मानव-निर्मित हैं और क्रमशः पनामा और मिस्र के नियंत्रण में आती हैं- जिससे वे देश उन पर ट्रांजिट-शुल्क लगा सकते हैं- वहीं अन्य चोकपॉइंट्स प्राकृतिक जलडमरूमध्य हैं, जो जटिल अंतरराष्ट्रीय समुद्री कानूनों द्वारा संचालित होते हैं। आज सभी प्रमुख चोकपॉइंट्स या उन तक पहुंच मार्ग दबाव में हैं। ये दबाव क्षेत्रीय संघर्षों, भू-राजनीतिक प्रतिद्वंद्विता व जलवायु-संबंधी चुनौतियों से उत्पन्न ​हुए हैं। हाल तक होर्मुज को व्यापक रूप से एक संवेदनशील बिंदु नहीं माना जाता था, लेकिन ताजा घटनाक्रमों ने इस धारणा को बदल दिया है। होर्मुज अपने सबसे चौड़े बिंदु पर लगभग 95 किमी चौड़ा है, लेकिन प्रमुख ट्रांजिट क्षेत्रों में यह काफी संकरा हो जाता है। लगभग 3-3 किमी चौड़ी शिपिंग लेन बफर जोन द्वारा अलग की गई हैं। ये मार्ग ईरान और ओमान दोनों के क्षेत्रीय जल से होकर गुजरते हैं और यूनाइटेड नेशंस कन्वेंशन ऑन द लॉ ऑफ द सी (यूएनसीएलओएस) द्वारा शासित होते हैं। इसके तहत जहाजों को ट्रांजिट पास का अधिकार प्राप्त है, जिसे मनमाने ढंग से निलंबित नहीं किया जा सकता। रिपोर्टों के अनुसार, कुछ जहाज चीनी युआन में ट्रांजिट शुल्क का भुगतान कर चुके हैं। लेकिन इस नए खर्च का वहन कौन करेगा- शिपिंग कंपनियां, निर्यातक या आयातक देश? और ऐसे शुल्क को किस कानूनी ढांचे के तहत उचित ठहराया जाएगा? कुछ जहाज कथित रूप से स्ट्रेट ऑफ होर्मुज से गुजरने के लिए चीनी युआन में ईरान को ट्रांजिट शुल्क का भुगतान करने लगे हैं। हालांकि कई महत्वपूर्ण प्रश्न अब भी अनुत्तरित हैं, जैसे इस नए खर्च का वहन कौन करेगा- शिपिंग कंपनियां, निर्यातक या आयातक देश?
(ये लेखक के अपने विचार हैं)

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मोहम्मद जमशेद का कॉलम: इससे पहले दुनिया ने होर्मुज पर ध्यान क्यों नहीं दिया था?