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- Minhaj Merchant’s Column There Is Freedom Of Speech, But To What Extent?
6 घंटे पहले

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मिन्हाज मर्चेंट, लेखक, प्रकाशक और सम्पादक
कुणाल कामरा एक कॉमेडियन हैं। उनका काम ही लोगों का मजाक उड़ाना है। कभी-कभी उनका कटाक्ष आपत्तिजनक हो सकता है। भारत में आहत करने की स्वतंत्रता एक मौलिक अधिकार है, लेकिन क्या यह एक पूर्ण और निर्बाध अधिकार भी है?
भारत का संविधान अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता को सुरक्षित करता है। हालांकि, प्रथम प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू इस बात से नाखुश रहते थे कि इस स्वतंत्रता का दुरुपयोग बदनाम करने, सार्वजनिक अव्यवस्था को भड़काने और समाज में दुर्भावना पैदा करने के लिए किया जा रहा है। कांग्रेस सरकार ने जून 1951 में संविधान में संशोधन किया। यह 26 नवंबर 1949 को संविधान सभा द्वारा इसे अपनाए जाने और 26 जनवरी 1950 को लागू किए जाने के कुछ ही महीने बाद हुआ था। यह भारतीय संविधान में तब तक का पहला संशोधन था।
संविधान के अनुच्छेद 19(1)(ए) द्वारा अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता की गारंटी दी गई थी। लेकिन नेहरू अभिव्यक्ति की निर्बाध स्वतंत्रता के विरोधी थे, क्योंकि उनका मानना था कि इसका दुरुपयोग किया जा सकता है। तब कांग्रेस सरकार ने अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता में संशोधन को उचित ठहराने के लिए यह तर्क दिया :
“संविधान के पिछले 15 महीनों के कामकाज के दौरान न्यायिक निर्णयों और घोषणाओं द्वारा कुछ कठिनाइयां सामने आई हैं, खास तौर पर मौलिक अधिकारों के संबंध में। अनुच्छेद 19(1)(ए) द्वारा गारंटीकृत अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के अधिकार को कुछ न्यायालयों ने इतना व्यापक माना है कि किसी व्यक्ति को दोषी नहीं ठहराया जा सकता, भले ही वह हत्या और हिंसा के अन्य अपराधों की वकालत करता हो।
जबकि लिखित संविधान वाले देशों में यह नहीं माना जाता है कि राज्यसत्ता बोलने की आजादी के दुरुपयोग को दंडित नहीं कर सकती या उसे रोक नहीं सकती।’ इस प्रकार पहले संशोधन ने “उचित प्रतिबंध’ जोड़कर संविधान में बोलने और अभिव्यक्ति की “पूर्ण’ स्वतंत्रता को कमजोर कर दिया था।
इनमें “सार्वजनिक व्यवस्था के हित में’ और “किसी अपराध को भड़काने के संबंध में’ प्रतिबंध शामिल थे। लेकिन मानहानि? पहले संशोधन में इस पर रोक नहीं थी- जब तक कि इससे सार्वजनिक अव्यवस्था न फैले या किसी अपराध को भड़काने की कोशिश न हो।
कुणाल कामरा ने एकनाथ शिंदे का नाम तो नहीं लिया, लेकिन एक गाने में “गद्दार’ शब्द का उपयोग करते हुए वे स्पष्ट रूप से उन्हें ही निशाना बना रहे थे। तब क्या कामरा ने अनुच्छेद 19(1)(ए) द्वारा अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता पर लगाए उचित प्रतिबंधों का उल्लंघन किया है? और मानहानि के बारे में क्या? मानहानि पर कानून की व्याख्या की जा सकती है।
राहुल गांधी सहित कई नेताओं को मानहानि के लिए अदालत में दोषी ठहराया गया है। राहुल की तो संसद सदस्यता भी समाप्त कर दी गई थी। सावरकर के परिवार और अन्य लोगों से जुड़े मानहानि के कई अन्य मामले राहुल के खिलाफ अदालत में लंबित हैं। कामरा भी अधिकांश कॉमेडियनों की तरह कानून को अच्छे से जानते हैं।
वे सीमा पार न करने को लेकर सावधान रहते हैं। उन्होंने रणवीर इलाहाबादिया जैसी गलती नहीं की, जिन्होंने सार्वजनिक मंच पर कौटुम्बिक व्यभिचार का सुझाव देकर कानून का उल्लंघन कर दिया था।
तो क्या कुणाल कामरा का कोई राजनीतिक एजेंडा है? उदाहरण के लिए, वे कभी सोनिया गांधी या दूसरे विपक्षी नेताओं को निशाना क्यों नहीं बनाते हैं? और जब सार्वजनिक मंचों पर सार्वजनिक हस्तियों को निशाना बनाया जाता है, तब उन हस्तियों का दृष्टिकोण क्या होना चाहिए? जब तक हमला स्पष्ट रूप से अपमानजनक या सार्वजनिक अव्यवस्था को भड़काने वाला न हो, उन्हें इसे अनदेखा कर देना चाहिए।
कुणाल कामरा के लिए तो किसी भी तरह की पब्लिसिटी ऑक्सीजन की तरह होगी, जिससे उनकी आमदनी और बढ़ेगी ही। पर किसी पर तभी कार्रवाई की जानी चाहिए, जब उसके द्वारा किया गया आक्षेप कानून का उल्लंघन करता हो।
वैसे उचित प्रतिबंधों के साथ आहत करने का अधिकार एक जीवंत लोकतंत्र का हिस्सा है। अमेरिका का ही उदाहरण ले लें, जहां डोनाल्ड ट्रम्प को अकसर ही मॉर्फ्ड एआई वीडियो और मीम्स के साथ चित्रित किया जाता है। (ये लेखक के अपने विचार हैं)

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मिन्हाज मर्चेंट का कॉलम: बोलने की स्वतंत्रता तो है, लेकिन किस सीमा तक?