मसूद पेजेश्कियान का कॉलम: इस लड़ाई से अमेरिकियों के कौन-से हित पूरे हो रहे हैं? Politics & News

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6 घंटे पहले

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ईरान के राष्ट्रपति

ईरान मानव इतिहास की सबसे प्राचीन सभ्यताओं में से एक है। हमने कभी भी आक्रामकता, विस्तारवाद, उपनिवेशवाद या वर्चस्व का मार्ग नहीं चुना। यहां तक कि वैश्विक शक्तियों के कब्जे, आक्रमण और निरंतर दबाव झेलने के बाद भी- और अपने कई पड़ोसियों पर सैन्य बढ़त होने के बावजूद- ईरान ने कभी युद्ध की शुरुआत नहीं की।

यही कारण है कि ईरान को एक खतरे के रूप में प्रस्तुत करना न तो ऐतिहासिक वास्तविकता के अनुरूप है और न ही वर्तमान के तथ्यों के। ऐसी धारणा शक्तिशाली ताकतों की राजनीतिक और आर्थिक मनमानी का परिणाम है। उन्हें अपने दबावों को उचित ठहराने, सैन्य प्रभुत्व बनाए रखने, अपने हथियार उद्योग को कायम रखने और रणनीतिक बाजारों पर नियंत्रण के लिए एक दुश्मन गढ़ने की आवश्यकता होती है।

अमेरिका ने ईरान के चारों ओर अपने सैनिकों, सैन्य ठिकानों और क्षमताओं का सबसे बड़ा जमावड़ा किया है। ऐसी परिस्थितियों का सामना कर रहा कोई भी देश अपनी रक्षा क्षमताओं को सुदृढ़ करने से परहेज नहीं करेगा। ईरान ने जो किया है- और करता रहा है- वह आत्मरक्षा पर आधारित एक संतुलित प्रतिक्रिया है, न कि किसी भी रूप में युद्ध या आक्रामकता की शुरुआत।

ईरान और अमेरिका के संबंध प्रारंभ से शत्रुतापूर्ण नहीं थे। लेकिन निर्णायक मोड़ अमेरिका का वह हस्तक्षेप था, जिसका उद्देश्य ईरान के अपने संसाधनों के राष्ट्रीयकरण को रोकना था। इसने ईरान की लोकतांत्रिक प्रक्रिया को बाधित किया और अमेरिकी नीतियों के प्रति ईरानियों में गहरा अविश्वास पैदा किया।

यह अविश्वास आगे और गहराया- शाह के शासन के प्रति अमेरिका के समर्थन, 1980 के दशक के थोपे गए युद्ध में सद्दाम हुसैन के प्रति उसके समर्थन, आधुनिक इतिहास के सबसे लंबे और व्यापक प्रतिबंधों को थोपने और अंततः- जब बातचीत चल ही रही थी, तब उसके बीच- दो बार ईरान पर बिना किसी उकसावे के सैन्य आक्रामकता से।फिर भी, ईरान कमजोर नहीं पड़ा।

इसके विपरीत, वह कई क्षेत्रों में और सशक्त हुआ है : साक्षरता दर लगभग 30% (इस्लामी क्रांति से पहले) से बढ़कर आज 90% से अधिक हो गई है; उच्च शिक्षा का व्यापक विस्तार हुआ है; आधुनिक टेक्नोलॉजी में महत्वपूर्ण प्रगति दर्ज की गई है; स्वास्थ्य सेवाओं में सुधार हुआ है; और बुनियादी ढांचे का विकास पहले की तुलना में कहीं अधिक तेजी और पैमाने पर हुआ है।

प्रतिबंधों, युद्धों और आक्रामकता के ईरानी जनता के जीवन पर पड़ने वाले विनाशकारी और अमानवीय प्रभावों को कम करके नहीं आंका जाना चाहिए। सैन्य आक्रामकता की निरंतरता और हालिया बमबारी लोगों के जीवन, दृष्टिकोण और सोच पर गहरा असर डालती है। जब युद्ध जीवन, घरों, शहरों और भविष्य को अपूरणीय क्षति पहुंचाता है, तो लोग इसके लिए जिम्मेदार लोगों के प्रति उदासीन नहीं रह सकते।

इस युद्ध से अमेरिकी जनता के किन हितों की पूर्ति हो रही है? क्या ऐसे व्यवहार को उचित ठहराने के लिए ईरान से कोई वास्तविक खतरा मौजूद था? क्या निर्दोष बच्चों की हत्या, कैंसर-उपचार से संबंधित फार्मास्यूटिकल सुविधाओं का विनाश या किसी देश को पाषाण युग में वापस भेजने की शेखी बघारना- इन सबका कोई उद्देश्य है?

ईरान ने वार्ताओं का मार्ग अपनाया, समझौते तक पहुंचा और सभी प्रतिबद्धताओं का पालन किया। उस समझौते से हटने, टकराव की ओर बढ़ने और वार्ताओं के बीच आक्रामक कार्रवाइयां करने का निर्णय अमेरिकी सरकार द्वारा लिया गया।

ईरान के जरूरी बुनियादी ढांचों पर हमला सीधे ईरानी जनता को निशाना बनाना है। यह न केवल एक युद्ध अपराध की श्रेणी में आता है, बल्कि इसके परिणाम ईरान की सीमाओं से कहीं आगे तक फैलते हैं। क्या यह एक तथ्य नहीं है कि अमेरिका इस आक्रामकता में इजराइल के प्रतिनिधि के रूप में, उसके प्रभाव में शामिल हुआ है? और क्या यह भी सच नहीं है कि इजराइल, ईरान के खतरे का निर्माण करके फिलिस्तीनियों के विरुद्ध अपने कृत्यों से दुनिया का ध्यान हटाना चाहता है?

आज दुनिया एक चौराहे पर है। टकराव के मार्ग पर बढ़ते रहना पहले से कहीं अधिक महंगा और बेकार है। टकराव और सहभागिता के बीच क्या चुनें, इसका निर्णय आने वाली पीढ़ियों के भविष्य को आकार देगा।

  • क्या यह तथ्य नहीं है कि अमेरिका इस युद्ध में इजराइल के प्रतिनिधि के रूप में शामिल हुआ है? क्या यह भी सच नहीं है कि इजराइल ऐसा करके फिलिस्तीनियों के विरुद्ध अपने कृत्यों से दुनिया का ध्यान हटाना चाहता है?

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