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मध्य-पूर्व में चल रहे युद्ध का एक चिंताजनक पहलू यह है कि उसे धार्मिक परिप्रेक्ष्यों में प्रस्तुत किया जा रहा है। इससे संघर्ष के वास्तविक भू-राजनीतिक कारण- जैसे शक्ति-संतुलन, संसाधनों और क्षेत्रीय वर्चस्व की प्रतिस्पर्धा आदि छिप जाते हैं। अमेरिका, इजराइल और ईरान- तीनों ही मुल्कों के नेताओं के सार्वजनिक वक्तव्यों में धार्मिक प्रतीक दिखाई देते हैं। हाल ही में ट्रम्प की एक तस्वीर सामने आई, जिसमें वे ओवल ऑफिस में आए पादरियों के समूह के साथ प्रार्थना करते दिखाई दिए। पादरियों ने राष्ट्रपति के लिए ईश्वरीय मार्गदर्शन और बुद्धिमत्ता की प्रार्थना की, साथ ही अमेरिकी सशस्त्र बलों की सुरक्षा की कामना की। संघर्ष के दोनों पक्षों के नेता धार्मिक विषयों का उल्लेख करते हैं और अपने समर्थकों से इतिहास और संस्कृति के प्रतीकों से प्रेरणा लेने का आग्रह करते हैं। दोनों ओर कई लोग यह मानते हैं कि ईश्वर उनके साथ है और उनके विरोधियों के खिलाफ हिंसा का समर्थन करता है। इस तरह की सोच का ऐतिहासिक संदर्भ भी है- क्रूसेड्स, जो फिलिस्तीन पर नियंत्रण के लिए ईसाइयों-मुसलमानों के बीच लड़े गए युद्धों की शृंखला थी। इजराइल की राजनीति में धार्मिक प्रतीक और संदर्भ कोई नई बात नहीं है। नेतन्याहू कई बार बाइबिल के शत्रु अमालेक का उल्लेख कर चुके हैं, जिन्हें वे गाजा के निवासियों के साथ जोड़ते हैं। यहूदी धर्मग्रंथ तोरा में उनके खिलाफ युद्ध छेड़ने का आह्वान मिलता है। औपचारिक रूप से तो इजराइल धर्मनिरपेक्ष और लोकतांत्रिक राज्य है, जिसकी स्थापना यूएन महासभा के प्रस्ताव 181 के तहत हुई थी। लेकिन हाल के वर्षों में दक्षिणपंथी दलों ने ऐसा माहौल बना दिया है मानो यह राज्य ईश्वर की इच्छा से बना हो। कुछ चरमपंथी राजनेता दावा करते हैं कि इजराइल की सीमा नील से फरात नदी तक फैली थी- जैसा कि बाइबिल में वर्णित है। अगस्त 2025 में नेतन्याहू ने भी कहा था कि वे ग्रेटर इजराइल की अवधारणा से गहरे जुड़े हैं, जिसमें फिलिस्तीनी क्षेत्र ही नहीं, बल्कि जोर्डन, मिस्र, सीरिया और लेबनॉन के कुछ हिस्से भी शामिल हो सकते हैं। उनके मंत्री बेजालेल स्मोट्रिच संकेत दे चुके हैं कि इजराइल का विस्तार जोर्डन और उससे आगे इराक तक होना पूर्व-नियत है। इस आग में घी डालने का काम अमेरिकी दक्षिणपंथी नेताओं ने भी किया है। अमेरिका में इजराइल के राजदूत रहे माइक हकाबी ने एक साक्षात्कार में कहा कि यदि इजराइल पूरे पश्चिम एशिया पर नियंत्रण कर ले, तो इसमें कोई बुराई नहीं होगी। अमेरिकी नेतृत्व की ओर से विरोधी पक्ष को बुराई के रूप में प्रस्तुत करने की प्रक्रिया भी साफ दिखाई देती है। एक पेंटागन प्रेस ब्रीफिंग में यूएस रक्षा विभाग के प्रमुख पीट हेग्सेथ ने कहा कि मजहबी भविष्यवाणियों के भ्रम में डूबे ईरानियों के पास परमाणु हथियार नहीं होने चाहिए। पिछले सप्ताह मार्को रूबियो ने भी कहा कि ईरान को धार्मिक उन्मादियों द्वारा चलाया जा रहा है। अमेरिकी निगरानी संस्था मिलिट्री रिलीजियस फ्रीडम फाउंडेशन ने कहा कि उसे ऐसी शिकायतें मिली हैं, जिनमें बताया गया है कि कुछ अधिकारियों ने अमेरिकी सैनिकों से कहा, ईरान के साथ युद्ध आर्मगेडन या एंड टाइम्स की ओर ले जा सकता है। आर्मगेडन बाइबिल के अनुसार वह स्थान है, जहां ईश्वर की शक्तियों और बुराई की शक्तियों के बीच अंतिम निर्णायक युद्ध होगा, जिसके बाद दुनिया का अंत होगा। वहीं एंड टाइम्स उस दौर को कहा जाता है, जब वैश्विक युद्धों और प्राकृतिक आपदाओं के बीच एंटी-क्राइस्ट का उदय होगा और अंततः जीसस क्राइस्ट की वापसी होगी, जो बुराई को परास्त करेंगे। ईरान में भी एंड टाइम्स से जुड़ी मान्यताएं हैं। इसके अनुसार बारहवें इमाम गैबत में हैं- अर्थात आम लोगों की नजरों से ओझल हैं। माना जाता है कि वे अंत समय में प्रकट होंगे और बुराई की शक्तियों के खिलाफ संघर्ष करेंगे। उनके प्रकट होने के साथ ही दुनिया से अत्याचार और अन्याय समाप्त होगा, शांति और न्याय की स्थापना होगी और इस्लाम का पुनरुत्थान होगा। अली खामेनेई की मृत्यु की परिस्थितियां उन्हें एक शहीद के रूप में प्रस्तुत करती हैं। ईरान ने उनकी शहादत का इस्तेमाल जनसमर्थन जुटाने के लिए किया है। मुल्क में मौजूद असंतुष्टों पर अक्सर धर्मत्याग के आरोप लगाए जाते हैं, जबकि ट्रम्प व नेतन्याहू को ईश्वर के शत्रु कहा जाता है। इस तरह की धार्मिक व्याख्याएं समझौते की गुंजाइश को खत्म कर देती हैं और विरोधी पक्ष का मानवीय रूप भी मिट जाता है। इतिहास बताता है कि जब नेता किसी संघर्ष को ईश्वरीय आदेश से संचालित अच्छाई और बुराई की लड़ाई के रूप में पेश करते हैं, तो बातचीत और शांति की संभावना के लिए राजनीतिक स्पेस बहुत सीमित रह जाता है। संघर्ष के दोनों पक्षों के नेता धार्मिक विषयों का उल्लेख करते हैं और अपने समर्थकों से इतिहास और संस्कृति के प्रतीकों से प्रेरणा लेने का आग्रह करते हैं। दोनों पक्षों का मानना है कि ईश्वर उनके साथ व विरोधियों के खिलाफ है।
(ये लेखक के अपने विचार हैं)
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मनोज जोशी का कॉलम: ईरान से चल रहे युद्ध के पीछे केवल भू-राजनीति ही नहीं है

