ब्रह्मा चेलानी का कॉलम: चीन अमेरिका से सीख रहा है कि ताइवान को कैसे हड़पें Politics & News

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3 घंटे पहले

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ब्रह्मा चेलानी पॉलिसी फॉर सेंटर रिसर्च के प्रोफेसर एमेरिटस

पिछले वर्ष सत्ता में आने के बाद से ट्रम्प ने कैरेबियाई क्षेत्र से लेकर पूर्वी-प्रशांत और अफ्रीका से लेकर मध्य पूर्व तक सैन्य-हमलों के आदेश दिए हैं। उन्होंने वेनेजुएला पर हमला करके उसके नेता मादुरो का अपहरण कर लिया।

और अब उन्होंने इजराइल के साथ मिलकर ईरान से युद्ध छेड़ रखा है। इस बीच, अमेरिका क्यूबा पर भी चारों ओर से फंदा कस रहा है। उसे उम्मीद है कि इससे उत्पन्न होने वाली मानवीय-त्रासदी से घबराकर क्यूबा उसके लिए दरवाजे खोल देगा।

जैसे-जैसे ट्रम्प अंतरराष्ट्रीय कानूनों की बेधड़क अवमानना कर रहे हैं, चीन भी इससे सबक ले रहा है। ट्रम्प का क्यूबा-मॉडल तो शी जिनपिंग के सामने ताइवान को हड़पने का एक उपयोगी खाका प्रस्तुत करता है। यह इस बात का खुलकर मुजाहिरा है कि महाशक्तियां किस प्रकार से किसी देश को घुटनों पर लाने के लिए उसका गला घोंट सकती है।

आधुनिक समाज कुछ महत्वपूर्ण प्रणालियों- जैसे भोजन, जल, परिवहन और संचार पर निर्भर करते हैं। लेकिन एक प्रणाली इन सब पर हावी है : ऊर्जा। बिजली से ही पानी के पम्प, रेफ्रिजरेशन, स्वास्थ्य सेवाएं, डिजिटल नेटवर्क, औद्योगिक-कृषि उत्पादन संचालित होते हैं।

जैसे ही बिजली ग्रिड फेल होती है, अन्य सभी महत्वपूर्ण प्रणालियां चरमराने लगती हैं और सामाजिक स्थिरता के समक्ष खतरे उत्पन्न हो जाते हैं। यही कारण है कि जो देश बिजली उत्पादन के लिए आयातित ईंधन पर अत्यधिक निर्भर हैं, वे मूलतः असुरक्षित होते हैं।

क्यूबा लंबे समय से मुख्यतः वेनेजुएला और मैक्सिको से खरीदे गए तेल पर निर्भर रहा है। ट्रम्प ने उसकी इसी असुरक्षा का फायदा उठाते हुए ईंधन आपूर्ति पर पूर्ण नाकाबंदी लागू कर दी है। लाखों लोग बिजली से वंचित हो गए हैं।

जल-पम्पिंग स्टेशन बंद हो गए हैं। ट्रैक्टर और डिलीवरी ट्रक निष्क्रिय पड़े हैं, जिससे खाद्य कीमतों में उछाल आ गया है और खाद्य संकट बढ़ता जा रहा है। अस्पताल अनियमित ब्लैकआउट के बीच काम करने के लिए संघर्ष कर रहे हैं।

शी जिनपिंग इससे सबक सीखकर ताइवान की भी इस प्रकार की दमनकारी घेराबंदी कर सकते हैं। वे ताइपेई पर मिसाइलें दागने या ताइवान के समुद्र तटों पर धावा बोलने के बजाय उसके चारों ओर एक समुद्री क्वारंटीन या कस्टम-निरीक्षण व्यवस्था घोषित कर सकते हैं, जिसमें चीनी तटरक्षक पोत ताइवानी बंदरगाहों की ओर जा रहे ऊर्जा टैंकरों को सुरक्षा जांच या तस्करी-विरोधी अभियानों के नाम पर रोक सकते हैं।

इस तरह के मामूली व्यवधान भी तेजी से आपूर्ति-अवरोध पैदा कर सकते हैं। चूंकि ताइवान अपने लगभग पूरे ईंधन (मुख्यतः एलएनजी) का आयात करता है और मुश्किल से दो सप्ताह के भंडार को ही बनाए रखता है, ऐसे में तट से दूर प्रतीक्षा कर रही एलएनजी टैंकरों की कतार कुछ ही हफ्तों में वहां शृंखलाबद्ध किल्लत को जन्म दे सकती है।

क्यूबा की तरह ताइवान को भी ब्लैकआउट का सामना करना पड़ सकता है, जिससे उसके जल-आपूर्ति और स्वास्थ्य-सेवा तंत्र बाधित होंगे। औद्योगिक उत्पादन- जिसमें वैश्विक डिजिटल अर्थव्यवस्था को संचालित करने वाले सेमीकंडक्टर संयंत्र भी शामिल हैं- ठप हो जाएगा।

चीन का मकसद ताइवान का तत्काल आत्मसमर्पण भले न हो, लेकिन इस तरह से वो धीरे-धीरे उसकी जड़ें कमजोर कर सकता है। वैसी स्थिति में चीन ताइवान में स्थिरता लाने या वहां के लोगों की रक्षा करने का हवाला देकर उसे हड़प सकता है।

वैसे भी ट्रम्प-युग में फ्रेंडली-टेकओवर को किसी कॉर्पोरेट-रीस्ट्रक्चरिंग जैसा बना दिया गया है। फॉर्मूला सरल है : किसी देश में समस्याएं पैदा करो और फिर उनका समाधान देने का हवाला देकर उसके अंदरूनी मामलों में दखल देने लगो।

अगर चीन ताइवान पर सीधे हमला बोलता है तो अन्य देशों को प्रतिक्रिया देने के लिए मजबूर होना पड़ेगा। लेकिन अगर जहाजों के रूटीन निरीक्षणों का हवाला देकर ताइवान की आपूर्ति को बाधित कर दिया जाए तो वह किसी बड़ी सैन्य प्रतिक्रिया को उचित नहीं ठहराएगा। वैसे भी शी जिनपिंग ऐसी रणनीतियों के माहिर हैं, जिसके चलते उन्होंने दक्षिण चीन समुद्र और अन्य भौगोलिक क्षेत्रों में एक भी गोली चलाए बिना बड़े सामरिक लाभ हासिल किए हैं।

महाशक्तियां एक-दूसरे का बारीकी से मुआयना करती हैं। ऐसे में जो एक के लिए कारगर हो, वह दूसरे के लिए एक मिसाल बन जाता है। आज अमेरिका जो कर रहा है, वह चीन के लिए एक पूर्वाभ्यास और परीक्षण की तरह है। (@प्रोजेक्ट सिंडिकेट)

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