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इंडियन प्रीमियर लीग (आईपीएल) का 19वां सीजन आज से शुरू हो रहा है। ऐसे में इस लीग की अब तक की यात्रा पर एक नजर डालना उचित होगा। आईपीएल ने बीसीसीआई और सभी प्रतिस्पर्धी टीमों के फ्रेंचाइजी मालिकों के लिए अभूतपूर्व आर्थिक लाभ उत्पन्न किया है। इसने विश्व क्रिकेट के केंद्र के रूप में भारत की स्थिति को भी सुदृढ़ किया और भारतीय क्रिकेट के वित्तीय प्रभुत्व की प्रक्रिया को पूर्ण किया है। फरवरी 2008 में जब आईपीएल के पहले सीजन के लिए बीसीसीआई द्वारा प्रतिष्ठित क्रिकेटरों को व्यावसायिक नीलामी में उतारने का निर्णय लिया गया था तो इसका कई वर्गों से तीव्र विरोध हुआ था। पूरे देश में नैतिकतावादी और राजनेता देश के सबसे बड़े खेल सितारों की सार्वजनिक नीलामी के खिलाफ खड़े हो गए थे। संसद में इस मुद्दे को उठाने तक की धमकी दी गई थी। हालांकि, बीसीसीआई इससे अप्रभावित रहा। बीसीसीआई को इस लीग के कॉन्सेप्ट पर भरोसा था और वह इसे अंत तक ले जाने के लिए तैयार था। भारत के विश्व विजेता कप्तान और खिलाड़ियों (2007 के टी-20 विश्व कप विजेता) को नीलामी में खरीदने का विचार ही प्रशंसकों के उत्साह को जगाने और- उससे भी अधिक महत्वपूर्ण- निवेशकों की दिलचस्पी को खासा बढ़ा देने के लिए काफी था। इसमें कोई संदेह नहीं कि 18 अप्रैल 2008 का दिन क्रिकेट इतिहास में उस तारीख के रूप में दर्ज होगा, जब यह खेल हमेशा के लिए बदल गया था। मेजर लीग बेसबॉल और नेशनल फुटबॉल लीग के मॉडल पर आधारित आईपीएल ऐसे समय में आया था, जब भारतीय अर्थव्यवस्था वैश्विक पूंजी के लिए खुल चुकी थी और बड़े कॉर्पोरेट्स देश में निवेश के लाभदायक अवसरों की तलाश कर रहे थे। आईपीएल कई लोगों के लिए इसकी कुंजी था। एक ही झटके में इसने उन्हें एक अरब से अधिक लोगों के बाजार में प्रवेश दिला दिया और वैसी विजिबिलिटी दिलाई, जो विज्ञापनों पर खर्च किए करोड़ों डॉलर से भी संभव नहीं थी। जिस देश में करोड़ों क्रिकेट प्रशंसक हों, उसमें बेहतरीन मार्केटिंग और हाइप के साथ स्टेडियमों को भरना कोई कठिन बात नहीं थी। शाहरुख खान जैसे सेलिब्रिटी ऑनर्स और प्रमुख बॉलीवुड सितारों के सक्रिय योगदान के चलते प्रशंसकों को कुछ सौ रुपयों में केवल क्रिकेट ही नहीं, बल्कि एक संपूर्ण मनोरंजक शाम का अनुभव मिलता था। देखते ही देखते स्पॉन्सर्स भी कतार में लग गए और दस-सेकंड के स्लॉट, स्टेडियम के होर्डिंग्स और टीमों की पोशाकों पर विज्ञापन के लिए लाखों डॉलर चुकाने लगे। आईपीएल की स्थापना के बाद से बीते अठारह वर्षों के दौरान मैंने कई टीमों और मालिकों के साथ समय बिताया है और इस लीग द्वारा उत्पन्न जुनून को देखकर आश्चर्यचकित हुआ हूं। टीम के मालिक- वे पुरुष और महिलाएं जो बड़े-बड़े कॉर्पोरेशनों का संचालन करते हैं- अपनी व्यावसायिक बैठकों में उतने तनावग्रस्त नहीं होते, जितने कि आईपीएल मैचों के दौरान दिखाई देते हैं। आईपीएल में कई मुकाबले ऐसे होते हैं, जो भारत-पाकिस्तान मैच जितने बड़े माने जाते हैं। और यही कारण है कि यह टूर्नामेंट आज टी-20 विश्व कप से भी अधिक लाभदायक और मूल्यवान है।
इस मल्टी-बिलियन डॉलर की संपत्ति में अब भारत हर रात खेलता है और जीतता है- और यही इसे विश्व कप से बड़ा ब्रांड बनाता है। कॉर्पोरेट जगत के लिए यह मंदी-रहित और जोखिम-रहित निवेश है। इसमें निवेश पर रिटर्न मिलना तय है और अधिकांश प्रायोजक इसे विश्व कप पर प्राथमिकता देते हैं, जहां भारत का प्रदर्शन पूरे टूर्नामेंट को बना या बिगाड़ सकता है। बीसीसीआई को आईपीएल हर वर्ष अरबों डॉलर कमाकर देता है और इसके परिणामस्वरूप अब बीसीसीआई, आईसीसी के रेवेन्यू-पूल पर निर्भर नहीं है। इससे भारत वैश्विक क्रिकेट का वित्तीय केंद्र भी बन गया है। इतना ही नहीं, लगभग सभी आईपीएल फ्रेंचाइजी अब यूनिकॉर्न बन चुकी हैं। भारतीय क्रिकेट की बढ़ती ताकत तथा लोगों के उपभोग के पैटर्न के अधिक आक्रामक होते जाने के साथ इसमें कोई संदेह नहीं कि अगले दशक में भी आईपीएल एक ब्रांड के रूप में अपनी चमक नहीं खोने वाला है। कॉर्पोरेट जगत के लिए आईपीएल एक मंदी-रहित और जोखिम-रहित निवेश है। इसमें निवेश पर रिटर्न मिलना तय है। प्रायोजक इसे विश्व कप पर प्राथमिकता देते हैं, जहां भारत का प्रदर्शन पूरे टूर्नामेंट को बना या बिगाड़ सकता है।
(ये लेखक के अपने विचार हैं)
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बोरिया मजुमदार का कॉलम: टी-20 विश्व कप से भी बड़ा ब्रांड बन चुका है आईपीएल

