फाइजर के सीईओ बोरला बोले-: काम को नैतिकता से जोड़ दें तो क्षमता से बेहतर नतीजे, टीम समस्या बताने के बजाय देने लगती है समाधान Politics & News

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जब लोगों को कठिन काम देते हैं तो अक्सर वे पूरा दिमाग और ऊर्जा यह बताने में लगा देते हैं कि यह चुनौती पूरी क्यों नहीं हो सकती। फाइजर के सीईओ अल्बर्ट बोरला कहते हैं, कोरोना के दौरान टीम को बहुत तेजी से वैक्सीन बनाने का टास्क मिला। जब कोई टीम लीडर कहता कि प्रोसेस में 3 हफ्ते से ज्यादा लगेंगे तो मैं पूछता- ‘3 हफ्ते में कितनी जानें जाएंगी? हिसाब लगाकर मुझे बताइए।’ असर ये हुआ कि टीमें समस्या बताने के बजाय समाधान खोजने पर केंद्रित हो गईं। सालाना 20 करोड़ डोज बनाने वाली फाइजर 300 करोड़ डोज बनाने लगी। एक इंटरव्यू में बोरला ने मुश्किल वक्त में कारगर कुछ ऐसी ही रणनीतियां बताईं। जीवन-मृत्यु से जोड़ी चुनौती, टीमें खुद समाधान देने लगी मुझे टीम से कहना था कि वैक्सीन बनाने में लगने वाले वर्षों को कुछ महीनों में समेटना होगा। जानता था कि पहला रिस्पॉन्स विरोध होगा। क्योंकि, लक्ष्य असंभव हो तो लोग अक्सर पूरी बौद्धिक ताकत लगाकर ये साबित करने में जुट जाते हैं कि ‘ऐसा नहीं हो सकता।’ बहस के बजाय हमने चुनौती को नैतिकता से जोड़ा। ये रफ्तार बिजनेस नहीं, जीवन-मृत्यु से जुड़ी थी। फाइजर के दफ्तरों में हर जगह पोस्टर लगवाए- ‘समय ही जीवन है’। ताकि कोई भी ये न भूले कि देरी की कीमत इंसानी जानों के रूप में चुकाई जा रही है। कंपनी नहीं, समाज के लिए काम किया वैक्सीन के लिए वैज्ञानिकों को सबसे ज्यादा श्रेय मिला। पर, असल चमत्कार मैन्युफैक्चरिंग साइट्स पर हुआ। वैज्ञानिक, इंजीनियर और वर्कर्स सिर्फ टारगेट या उत्पादन के आंकड़े नहीं गिन रहे थे। वे जानें बचाने, अर्थव्यवस्थाएं स्थिर करने और समाज को फिर से खोलने में भूमिका निभा रहे थे। इस जिम्मेदारी ने उनका आत्मबोध बदल दिया। ये तरीका इमोशनल ब्लैकमेल था। लेकिन, ये सामान्य परिस्थितियों के लिए नहीं, बल्कि असाधारण संकट के लिए था। सबक यह नहीं है कि लीडर्स अपराधबोध या संकट के सहारे लोगों से काम कराएं।सबक ये है कि जब मिशन स्पष्ट हो, दांव वास्तविक हों और बहानों को इनाम न मिले तो टीमें अपनी सोच से कहीं ज्यादा कर दिखाती हैं। नेतृत्व की इस समझ में अंतरराष्ट्रीय अनुभवों का योगदान है। अमेरिका में जो चीज काम करती है, वह जापान में नहीं चलती। विविधता तभी ताकत बनती है, जब उसे सही तरीके से मैनेज किया जाए। मां ने सिखाया- असंभव कुछ भी नहीं इस सोच के पीछे मेरी मां का असर रहा। होलोकॉस्ट में फायरिंग दस्ते के सामने होकर भी वे बच गई थीं। इसके बावजूद उनमें नफरत नहीं, बल्कि जीवन के प्रति अटूट आशावाद था। वह हमेशा कहती थीं- जिंदगी एक चमत्कार है। यहां कुछ भी असंभव नहीं है।

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फाइजर के सीईओ बोरला बोले-: काम को नैतिकता से जोड़ दें तो क्षमता से बेहतर नतीजे, टीम समस्या बताने के बजाय देने लगती है समाधान