पवन के. वर्मा का कॉलम: विदेश नीति किसी भी राष्ट्र के चरित्र की अभिव्यक्ति है Politics & News

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4 घंटे पहले

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पवन के. वर्मा पूर्व राज्यसभा सांसद व राजनयिक

विदेश नीति कैसी हो, इसको लेकर ‘नैतिकतावादियों’ और ‘यथार्थवादियों’ के बीच एक नई बहस उभर रही है। यथार्थवादियों की दलील है कि दुनिया नैतिकता के उपदेशों से नहीं चलती। यह कड़ी प्रतिस्पर्धा का अखाड़ा है, जहां नतीजे सिद्धांतों नहीं, ताकत से तय होते हैं।

ऐसे में तात्कालिक आर्थिक लाभ और सामरिक बढ़त का महत्व किन्हीं भी अमूर्त आदर्शों से अधिक है। इस दृष्टिकोण के मुताबिक कमजोर देशों को चुप रहना चाहिए, धीमे स्वर में बोलना चाहिए, सोच-समझकर गठबंधन बनाने चाहिए और जैसे-तैसे अपना अस्तित्व बचाए रखना चाहिए। यह विश्व-दृष्टि आदर्शवाद को न केवल नासमझी बल्कि एक बोझ भी समझती है।

यह नजरिया सुनने में भले ही व्यावहारिक लगे, लेकिन इसका दायरा सीमित है। यह राष्ट्रों को केवल लेन-देन करने वाली इकाइयों में बदल देता है, जिनमें पहचान, स्मृति या नैतिक कल्पनाशीलता का अभाव होता है।

ये मान बैठता है कि वैश्विक सम्मान की मुद्रा केवल शक्ति है, जबकि इतिहास इस बात के प्रमाण देता है कि स्थायी प्रभाव अकसर विश्वसनीयता, निरंतरता और दृढ़ विश्वास के संयोजन से बनते हैं। उदाहरण के लिए, 20वीं सदी के औपनिवेशिकता-विरोधी संघर्ष केवल सैन्य ताकत से नहीं जीते गए थे।

वे उन नैतिक तर्कों से संचालित हो रहे थे, जिन्होंने साम्राज्यवादी प्रभुत्व के पाखंड को उजागर किया। सम्प्रभुता, क्षेत्रीय अखंडता और समानता जैसे सिद्धांतों की अभिव्यक्ति समय के साथ स्वयं शक्ति के उपकरण बन गई है।

यहां यह नहीं सुझाया जा रहा है कि विदेश नीति का संचालन उपदेशात्मक तौर-तरीकों से किया जाना चाहिए। जाहिर है कि राष्ट्रों को दुनिया की वास्तविकताओं के अनुरूप प्रतिक्रिया करनी होती है। लेकिन इसका मतलब समर्पण करना नहीं है। सामरिक लचीलेपन और नैतिकता को त्यागने में अंतर है।

कोई देश अगर जरा-सी असुविधा के संकेत पर ही अपने घोषित सिद्धांतों को छोड़ देता है, तो वह न केवल दुनिया में अपनी विश्वसनीयता को क्षीण करता है, बल्कि देश में भी अपने आत्मसम्मान को जोखिम में डालता है।

यह दावा कि कमजोर देश आवाज बुलंद नहीं कर सकते, वस्तुतः पराजयवाद का ही दूसरा नाम है। अंतरराष्ट्रीय संबंधों में ताकत केवल सैन्य या आर्थिक मानकों से ही नहीं मापी जाती। यह किसी राष्ट्र की स्थितियों की स्पष्टता और उन्हें निरंतरता के साथ व्यक्त करने की क्षमता में भी निहित होती है।

जब भारत जैसा देश दृढ़ विश्वास के साथ कोई बात बोलता है, तो वह उस परिवेश को आकार देने में योगदान देता है, जिसमें वैश्विक राजनीति विकसित होती है। इसके विपरीत, मौन को अकसर सहमति के रूप में पढ़ा जाता है।

आदर्शवाद की आलोचना राष्ट्रीय हित की एक संकीर्ण समझ पर टिकी होती है। जबकि सच्चाई यह है कि जिन देशों को अवसरवादी माना जाता है, वे अकसर या तो हल्के में लिए जाते हैं या भू-राजनीतिक समीकरणों में सार्थक भूमिका से बाहर कर दिए जाते हैं।

इसके विपरीत, जो देश तमाम असुविधाओं के बावजूद सिद्धांत-निष्ठ दृष्टिकोण प्रदर्शित करते हैं, वे अकसर ऐसी नैतिक आभा अर्जित कर लेते हैं, जो उनकी भौतिक क्षमताओं से परे उनके प्रभाव को बढ़ाती है।

भारत के अमेरिका और इजराइल से मैत्रीपूर्ण संबंध हैं, लेकिन ईरान से भी हमारे कूटनीतिक और प्राचीन सांस्कृतिक संबंध रहे हैं। ईरान की नीतियों के प्रति किसी की भी राय चाहे जो हो, उसकी सम्प्रभुता का खुला उल्लंघन और उसके सर्वोच्च नेता की हत्या- इन घटनाओं पर भारत जैसे देश- जिसकी सम्प्रभुता, गैर-हस्तक्षेप और विवादों के शांतिपूर्ण समाधान के सिद्धांतों के प्रति दीर्घकालिक प्रतिबद्धता रही है- को तत्काल गहरी चिंता व्यक्त करनी चाहिए थी।

इसी प्रकार, अमेरिका के साथ व्यापार समझौता स्वागतयोग्य है, लेकिन इसे सम्प्रभुता की कीमत पर नहीं किया जा सकता, जहां यह निर्देश दिया जाए कि हम रूस से तेल नहीं खरीद सकते। विदेश नीति किसी राष्ट्र के चरित्र की अभिव्यक्ति है।

एक अनिश्चित होती जा रही दुनिया में- जहां मानदंडों की परीक्षा हो रही है और उन्हें नए सिरे से परिभाषित किया जा रहा है- भारत के पास संतुलन बहाल करने में अपनी भूमिका निभाने का अवसर है, और ब्रिक्स के वर्तमान अध्यक्ष के रूप में वह इस युद्ध को समाप्त करने में भी भूमिका निभा सकता है।

एक अनिश्चित होती जा रही दुनिया में भारत के पास संतुलन बहाल करने में अपनी भूमिका निभाने का अवसर है, और ब्रिक्स के वर्तमान अध्यक्ष के रूप में वह मौजूदा ईरान युद्ध को समाप्त करने में भी भूमिका निभा सकता है।

(ये लेखक के अपने विचार हैं)

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