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पश्चिम एशिया में जारी युद्ध के भू-राजनीतिक परिणाम बढ़ते ही चले जा रहे हैं। ईरान और इजराइल के बीच लगातार मिसाइलें दागी जा रही हैं। खाड़ी क्षेत्र में तेल संयंत्रों को निशाना बनाया गया है। महत्वपूर्ण समुद्री मार्गों पर टैंकर फंसे हुए हैं। दुनिया भर के देश ऊर्जा आपूर्ति में संभावित व्यवधानों के लिए तैयार हो रहे हैं। अमेरिका के सहयोगी देश मजबूरन ऐसी लड़ाई में खिंचते जा रहे हैं, जिससे वे बचना चाहते थे। इस तमाम अराजकता के बीच एक सवाल उभरकर सामने आ रहा है : क्या इस युद्ध में व्लादीमीर पुतिन ही इकलौते विजेता होंगे? पुतिन ने अमेरिका-इजराइल की आक्रामकता की आलोचना की है। ईरान के नए सर्वोच्च नेता को वे पहले ही बधाई दे चुके हैं। उन्होंने ट्रम्प से बात करते हुए मध्यस्थता की पेशकश भी की है। इससे यूरोपीय देश काफी असहज हैं। उनका कहना है कि इस युद्ध के एकमात्र लाभार्थी पुतिन साबित होने जा रहे हैं- और देखें तो उनकी दलील में दम है। इसका सबसे पहला कारण यह है कि इस युद्ध ने यूक्रेन से दुनिया का ध्यान हटा दिया है। अब पुतिन पर लड़ाई रोकने का कोई विशेष दबाव नहीं है। यहां तक कि निर्धारित शांति वार्ताएं भी टल गई हैं। इसके अलावा पुतिन के तरकश में एक नया तीर भी है- अगर अमेरिका ईरान पर हमला कर सकता है, तो वो रूस से किस मुंह से कह सकता है कि वह यूक्रेन पर हमला न करे? दूसरा कारण यह है कि यह युद्ध रूस की ऊर्जा आमदनी को बढ़ा रहा है। खाड़ी क्षेत्र का तेल और गैस बाजार से बाहर हो रहा है, इसलिए रूसी एनर्जी की मांग बहुत बढ़ गई है। अमेरिका रूसी गैस और तेल पर लगी पाबंदियों में ढील दे रहा है। पुतिन इस संकट का पूरा लाभ उठा रहे हैं। पुतिन का कहना है कि वे यूरोप को भी एनर्जी बेचने के लिए तैयार हैं, लेकिन तभी जब यूरोपीय देश दीर्घकालिक सहयोग की गारंटी दें। कुछ यूरोपीय देशों ने इस विचार का समर्थन भी किया है। उदाहरण के लिए हंगरी, रूसी ऊर्जा पर लगे प्रतिबंध हटाने की मांग कर रहा है। उनके अनुसार यही इस संकट का समाधान है। लेकिन दीर्घकालिक तस्वीर कहीं अधिक जटिल है। रूस अमेरिका के प्रभुत्व वाला पश्चिम एशिया नहीं देखना चाहता। वह इस क्षेत्र में अपनी पकड़ बनाए रखना चाहता है। ऐसी ही एक पकड़ 2024 के अंत में खत्म हो गई थी, जब बशर अल-असद को सीरिया के राष्ट्रपति पद से हटा दिया गया था। पुतिन ने 2015 में सीरियाई गृहयुद्ध में हस्तक्षेप किया था। लगभग एक दशक तक उन्होंने असद को सत्ता में बनाए रखा। बदले में रूस को पश्चिम एशिया में एक रणनीतिक आधार मिला था। लेकिन अब वह समाप्त हो चुका है। यहीं पर ईरान की भूमिका सामने आती है। हाल के वर्षों में रूस ने तेहरान की सत्ता के साथ अपने संबंध और गहरे किए हैं। यूक्रेन युद्ध शुरू होने के बाद ईरान ने रूस की सेना को शाहिद सुसाइड ड्रोन्स उपलब्ध कराए थे। रूस ने इन ड्रोन का घरेलू उत्पादन करने के लिए भी एक समझौता किया, क्योंकि ये ड्रोन रूस की सैन्य कार्रवाइयों की रीढ़ बन चुके हैं। पिछले वर्ष ही रूस ने यूक्रेन पर ऐसे 50 हजार से अधिक ड्रोन दागे थे। लेकिन यह संभव नहीं लगता कि पुतिन इसका बदला उसी तरह चुकाएंगे। क्रेमलिन का कहना है कि ईरान ने सैन्य सहायता का अनुरोध नहीं किया है। और यदि करता भी, तो यह संभावना कम है कि रूस मदद करेगा, क्योंकि उसे अपना युद्ध भी लड़ना है। हालांकि पुतिन अन्य तरीकों से मदद कर सकते हैं, जैसे खुफिया जानकारी के जरिए। अमेरिकी अधिकारियों का कहना है कि रूस ईरान को महत्वपूर्ण लक्ष्यों, रडार और हमले के संभावित ठिकानों के बारे में जानकारी पहुंचा रहा है। इससे भी अधिक महत्वपूर्ण यह है कि पुतिन अमेरिका और ईरान के बीच एक पुल की भूमिका निभा सकते हैं। उनके ट्रम्प और ईरानी हुकूमत दोनों से निकट संबंध हैं। इसलिए यदि किसी भी पक्ष को तनाव से बाहर निकलने का रास्ता चाहिए, तो पुतिन उसे संभव बना सकते हैं। और सच कहें तो फिलहाल कोई और यह भूमिका निभा भी नहीं सकता। ट्रम्प को चीनियों पर भरोसा नहीं है और ईरान को यूरोपियों पर। खाड़ी देश खुद इस लड़ाई में फंसे हैं और भारत ने मध्यस्थता में कोई विशेष रुचि नहीं दिखाई है। इस तरह तमाम विकल्प लगभग केवल रूस पर आकर टिकते हैं। और बेशक, यह कोई परोपकारी कदम नहीं होगा। अगर पुतिन, ट्रम्प के लिए तनाव कम करने का रास्ता तैयार करते हैं तो बदले में उन्हें कुछ मिल भी सकता है- शायद यूक्रेन के मुद्दे पर कोई रियायत। ईरान युद्ध ने यूक्रेन से दुनिया का ध्यान हटा दिया है। अब पुतिन पर लड़ाई रोकने का कोई विशेष दबाव नहीं है। यहां तक कि निर्धारित शांति वार्ताएं भी टल गई हैं। इसके अलावा यह युद्ध रूस की ऊर्जा आमदनी को भी बढ़ा रहा है।
(ये लेखिका के अपने विचार हैं।)
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पलकी शर्मा का कॉलम: लड़ाई पश्चिम एशिया में चल रही है और जीत रहे हैं पुतिन


