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अब समय आ गया है कि हम इस बात पर जोर दें- खासतौर पर माता-पिता- कि इंसान की रचनात्मकता मशीनों से अहम रहे। क्योंकि जिस तेजी से मशीनें हमारे जीवन में उतरेंगी, हम लोगों की माता-पिता के रूप में तो उम्र बीत जाएगी, पर हमारे बच्चे न मशीन रह पाएंगे, न इंसान। उनका शिखंडी व्यक्तित्व हमारे ही सामने दिखेगा और हम कुछ नहीं कर पाएंगे। आजकल माता-पिता अपने बच्चों को “स्टेम’ (साइंस, टेक्नोलॉजी, इंजीनियरिंग, मैथेमेटिक्स) खूब सिखाते हैं। जिस बच्चे को देखो, इन चारों की दिशा में दौड़ रहा है। लेकिन अब एक शिक्षा और दी जानी चाहिए और वो है चरित्र निर्माण की। और यहां चरित्र का अर्थ है- आपसी संबंध, सामाजिकता, परिवार और परमात्मा। इसकी भी शिक्षा माता-पिता लगातार बच्चों को देते रहें तो मशीन से फायदा तो उठाएंगे, नुकसान से बच जाएंगे। और स्कूलों से, कॉलेजों से, विश्वविद्यालय से उम्मीद न की जाए। शिक्षा वाले “स्टेम’ में चरित्र का “स्कैम’ हो गया है। इसलिए हम अत्यधिक सावधानी से अपने बच्चों को चरित्र की तरफ मोड़ें।
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पं. विजयशंकर मेहता कॉलम: सावधानी से अपने बच्चों को चरित्र की तरफ मोड़ें


