पं. विजयशंकर मेहता का कॉलम: बुढ़ापे में कम से कम इतना जरूर करें कि मन हल्का रखें Politics & News

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आजकल की पीढ़ी के मुंह से कभी-कभी यह बात सुनाई देती है कि मैं चीजों को दिल पर नहीं लेता या लेती हूं। यानी ये लोग जिम्मेदारियों को भी बहुत लाइटली ले लेते हैं। कहते हैं कि दिल पर लेना भी फायदेमंद होता है। कभी-कभी दर्द भी जुनून पैदा करता है। अब हम इसी बात को पुरानी पीढ़ी से जोड़ें। आज के वृद्ध लोगों ने जो उम्र गुजारी है, उसमें उन्हें कई दर्द मिले होंगे। और मनुष्य के स्वभावानुसार वो दर्द को समेट कर रखता है। जबकि बुढ़ापे में तो यह अटाला सबसे पहले बेच देना चाहिए। बूढ़े व्यक्तियों को अपना पारिवारिक जीवन ऐसे बिताना चाहिए, जैसे ट्रेन में बैठकर जब हम खिड़की से बाहर दृश्य देखते हैं तो दृश्य लगातार गुजरते जाते हैं और हम सिर्फ बैठे-बैठे मजा लेते हैं। परिवार की गतिविधियों को ऐसे ही देखें। परिवार की कही-सुनी को जानने की ज्यादा कोशिश ना करें। अंत समय में शरीर बीमारियों का घर बन ही जाता है। कम से कम मन हल्का रखें। दिल पर कोई बात लेनी भी हो तो सिर्फ एक ही बात दिल को याद दिलाएं कि चला-चली का समय आ गया, यहां से अच्छे-से चलते हैं।

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पं. विजयशंकर मेहता का कॉलम: बुढ़ापे में कम से कम इतना जरूर करें कि मन हल्का रखें