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मनुष्य का जीवन निराला है। यह मां की गोद और चिता की वेदी के बीच का है। जब आप पहली बार आंख खोलते हैं तो अपने को मां की गोद में पाते हैं। कई लोग प्रसन्न हो रहे होते हैं। आगमन का आनंद मनाया जाता है। उस आगमन से आप अनजान हैं, लेकिन आपका जन्म हो चुका है। और जब संसार से जाते हैं तो चिता की वेदी में कई लोग विदा करने आते हैं और हम उस समय भी अनजान रहते हैं। न सिर्फ अनजान, बल्कि मजबूर भी। पहली बार भी स्वयं नहीं नहा पाए और आखिरी बार भी दूसरे ही नहला के भेजते हैं। इसके बाद भी इंसान गर्व करता है कि मैं सब कुछ कर लूंगा। इसलिए, इस बीच जो भी किया जाए, उसमें विचार और वीरता दोनों बनाए रखो। देखा जाता है कि जो विचारक होते हैं, वो वीर नहीं होते और जो वीर होते हैं, वो विचारों से दूर रहते हैं। वाल्मीकि ऐसे ऋषि थे, जिनको मुनियों में सिंह कहा गया। उन्हें एक ही समय कोयल और सिंह की उपमा दी गई। तो वाल्मीकि इस बात का प्रतीक हैं कि जितना जीवन जीएं, उसमें शौर्य, पराक्रम, चिंतन, विनम्रता, संस्कार और मनुष्य होने का बोध बना रहे।
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पं. विजयशंकर मेहता का कॉलम: अपने जीवन में विचार और वीरता, दोनों ही बनाए रखें

