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- Pandit Vijayshankar Mehta Column: Understanding Sorrow Is Ending Sorrow
2 घंटे पहले
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पं. विजयशंकर मेहता
दुनिया में हमारा इरादा कई चीजें कमाने का होता है। धन, पद, प्रतिष्ठा, सुख, परिवार- ये सब कमाई के हिस्से हैं। लेकिन दो और चीजें भी हमारी कमाई बन जाती हैं- सुख और दु:ख। सुख कमाना तो समझ में आता है पर लोग दु:ख भी कमाते हैं। न चाहते हुए भी कमाते हैं। फिर जब दु:ख जीवन में आ जाता है, तो उसको मिटाने के लिए बावले हो जाते हैं। देखिए, दु:ख बांट सकते हैं, दु:ख को मोड़ सकते हैं, पर दु:ख मिटता नहीं है।
एक तो पक्का आएगा और आएगा तो मिटेगा नहीं। दु:ख की समझ का नाम ही दु:ख का मिटना है। दु:ख को समझें। दो ऐसे पात्र हैं, जिन्होंने सुख-दु:ख को स्वेच्छा से अपने जीवन में उतारा। केकैयी ने सुख पाने के लिए इतना बड़ा षड्यंत्र किया कि वही उसके लिए दु:ख बन गया। बीच में थी- मंथरा।
एक हैं कुंती। कुंती ने कृष्ण जी से दु:ख ही मांगा था, लेकिन योग्य पुत्रों का इतना बड़ा सुख कृष्ण ने उनको दिया। तो हम जब भी सुख-दु:ख की तलाश में निकलें तो यह जरूर ध्यान रखें कि हमारे जीवन में मंथरा की भूमिका है या कृष्ण की।
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पं. विजयशंकर मेहता का कॉलम: दु:ख की समझ का नाम ही दु:ख का मिटना है



