पंजाब के को-ऑपरेटिव सोसाइटी कर्मचारियों को हाईकोर्ट से झटका: रिटायरमेंट लाभ के दावे खारिज, कहा- राज्य सरकार को नियम बनाने का अधिकार – Chandigarh News Chandigarh News Updates

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पंजाब की सहकारी समितियों (को-ऑपरेटिव सोसाइटी) से जुड़े हजारों कर्मचारियों को पंजाब एंड हरियाणा हाईकोर्ट से बड़ा झटका लगा है। हाईकोर्ट ने वर्ष 1997 के सेवा नियमों को अवैध करार दे दिया है। हाईकोर्ट ने साफ किया है कि इन नियमों के आधार पर कर्मचारी ग्रेच्युटी, लीव एनकैशंमेंट और अन्य रिटायरमेंट लाभों का दावा नहीं कर सकते। जस्टिस हरप्रीत सिंह बराड़ की पीठ ने कई याचिकाओं पर एक साथ सुनवाई करते हुए यह अहम फैसला सुनाया। इनमें तीन याचिकाएं सेवानिवृत्त कर्मचारियों द्वारा दायर की गई थीं, जिनमें बकाया रिटायरमेंट लाभ और ब्याज की मांग की गई थी, जबकि एक याचिका एक सहकारी समिति की ओर से दायर की गई थी, जिसमें अधिकारियों द्वारा भुगतान के लिए दबाव डालने की कार्रवाई को चुनौती दी गई थी। राज्य सरकार को नियम बनाने का अधिकार हाईकोर्ट ने अपने फैसले में कहा कि पंजाब सहकारी समितियां अधिनियम, 1961 के तहत सेवा नियम बनाने की शक्ति केवल राज्य सरकार को है। हालांकि 1963 के नियमों के जरिए यह शक्ति रजिस्ट्रार को सौंप दी गई, जिसके आधार पर 1997 के सेवा नियम बनाए गए। हाईकोर्ट ने इसे कानून के सिद्धांतों के खिलाफ बताते हुए ‘सब-डेलीगेशन’ का मामला माना और कहा कि बिना स्पष्ट अनुमति के ऐसा अधिकार आगे नहीं सौंपा जा सकता। हाईकोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि 1997 के सेवा नियम न तो वैधानिक हैं और न ही इन्हें विधानसभा के समक्ष पेश किया गया था। इसलिए इनके आधार पर कोई कानूनी अधिकार उत्पन्न नहीं होता। सरकार पर नहीं वित्तीय बोझ फैसले में हाईकोर्ट ने सहकारी समितियों की वित्तीय स्थिति पर भी टिप्पणी करते हुए कहा कि ये संस्थाएं स्वतंत्र हैं और अपने संसाधनों से ही कर्मचारियों का वेतन व अन्य खर्च उठाती हैं। राज्य सरकार इन पर कोई वित्तीय जिम्मेदारी नहीं लेती, ऐसे में सरकारी कर्मचारियों के बराबर वेतन और रिटायरमेंट लाभ देना व्यावहारिक नहीं है। हाईकोर्ट ने यह भी कहा कि, रजिस्ट्रार ने खुद को “सुपर नियोक्ता” की तरह स्थापित करने की कोशिश की, जबकि सहकारी समितियां अपनी वित्तीय स्थिति के अनुसार कर्मचारियों की सेवा शर्तें तय करने के लिए स्वतंत्र हैं। हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया कि ग्रेच्युटी एक्ट केवल उन संस्थानों पर लागू होता है, जहां 10 या उससे अधिक कर्मचारी कार्यरत हों, जबकि अधिकांश सहकारी समितियों में कर्मचारियों की संख्या इससे कम है। कर्मचारियों की याचिकाएं खारिज हाईकोर्ट ने कर्मचारियों की सभी याचिकाओं को गैर-प्रभावी बताते हुए खारिज कर दिया। वहीं सहकारी समिति की याचिका स्वीकार करते हुए अधिकारियों द्वारा जारी कारण बताओ नोटिस को रद्द कर दिया और निर्देश दिया कि समिति को जबरन भुगतान के लिए बाध्य न किया जाए। हालांकि कोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि इस फैसले के आधार पर पहले से दिए गए रिटायरमेंट लाभों की कोई वसूली नहीं की जाएगी।

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