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नवनीत गुर्जर का कॉलम: किस्से लिखे हैं रोटियों पर, पढ़ेगा कौन? Politics & News

नवनीत गुर्जर का कॉलम:  किस्से लिखे हैं रोटियों पर, पढ़ेगा कौन? Politics & News

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4 घंटे पहले

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नवनीत गुर्जर

गुलजार साहब की एक ताजा किताब है- “ए पोयम ए डे’। इसकी एक कविता को गद्य में समझें तो कुछ ऐसी बनती है- कोल्हू चलता रहता है। बैल उसी के पीछे-पीछे। उम्र भर। साल-महीने गिने बिना। गोल-गोल बस घूमता फिरता है। गले में घंटी बजती रहती है। खींचता रहता है पुल्ली को। बीज सभी पिसते रहते हैं। तेल निकलता रहता है। चाबुक पड़ता है जब। खाल उधड़ जाती है। हजारों मील चलता है। फिर भी वहीं का वहीं। उसी जगह।

तेल बाजार में बिकता है। बैल का कोई हिस्सा नहीं। यही है जिसका दु:ख है। तेल किसी का। खाल किसी की। उसके लिए बस सूखी घास। यूं ही चल रहा है दुनिया का कोल्हू, बैल बनाकर आदमी को। जोत रखा है खांचों में।

आदमी बस चलता जा रहा है। कोसों चलता है। फिर भी वहीं का वहीं। उसके असल मुद्दों, मसलों, शिकायतों, आफतों, दिक्कतों से किसी को कोई मतलब नहीं। राजनीतिक दलों, नेताओं और सरकारों को तो बिलकुल नहीं। वे नित नए मुद्दे उछालते रहते हैं, जिनसे आम आदमी का, हमारा कोई वास्ता नहीं होता।

फिर भी हम उन उछाले हुए, कतरे-ब्योंते मुद्दों के कोल्हू में जुतने के लिए हमेशा आगे आ जाते हैं और महीनों जुते भी रहते हैं। चाबुक खाते रहते हैं। खाल उधड़ती रहती है और असल मुद्दे कोल्हू की चख-चूं में कहीं खो जाते हैं।

पानी की किल्लत है तो खुद ही निबटो। बिजली गुल हो गई तो पड़े रहो अंधेरे में। महंगाई की तो अब बात भी करने का धरम नहीं रहा। नई तकनीक का स्वागत है लेकिन इस मुई तकनीक ने हमारी छोटी-छोटी खुशियां छीन लीं। हाथ में पकड़ा मोबाइल ही अब हमारा संसार हो चुका है। मैसेज पढ़ने और उनमें से कुछ को पढ़कर खुश होने, कुछ को डिलीट करने के सिवाय कोई शौक ही नहीं बचा।

क्या दिन थे वो! क्या और कैसी-कैसी खुशियां थीं! वो तनख्वाह के दिन नोटों की गड्डी को, चाहे छोटी हो या बड़ी, खीसे में रखकर इधर-उधर डोलते फिरना। बार-बार खीसे पर हाथ रखना, तसल्ली करना… कि गड्डी अपनी जगह पर है या नहीं! गिर तो नहीं गई कहीं!

फिर घर जाकर बड़ी शान से जेब से गड्डी निकालना और गर्व के साथ घर वालों को सौंपना। राजा-महाराजा जैसी अनुभूति हुआ करती थी! सब्जी के ठेले पर हर चीज का भाव पूछना, पैसे कम कराना, रिक-झिक करना। सब कुछ कहीं खो-सा गया।

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अब ऐसा कुछ नहीं होता। तनख्वाह भी मोबाइल में आती है। आती भी क्या है, एक मैसेज भर रहता है। न नोट हाथ में आता। न हाथ से जाता। घर वालों को पता ही नहीं चलता कि तनख्वाह कब आई? सब्जी-भाजी के भाव तो होते ही नहीं। इतने किलो ये दे दो, इतने किलो ये। टोटल पूछा और कर दिया ऑनलाइन पेमेंट। न भाव पता, न ताव। सब्जी वाले से मीठी बहस करना तो दूर की बात। यही वजह है कि महंगाई का मुद्दा गौण हो गया है।

क्या कितने में मिल रहा है, किसका भाव क्या है, हमें पता ही नहीं। इसलिए महंगाई कोई मुद्दा ही नहीं रहा अब। जेब से कुछ जाए, निकले, तो पता चले!

यही वजह है कि हर चुनाव में बेचारा विपक्ष महंगाई का मुद्दा उठाता रहता है, जिसका कोई असर ही नहीं होता। बेचारा इसलिए कि ज्वलंत मुद्दे जो समय-समय पर उठते हैं, उन्हें भुनाना उसे आता ही नहीं। अगर ऐसे में भाजपा विपक्ष में होती तो सत्ता पक्ष या सरकार की नींद उड़ा देती।

क्या विपक्ष था भाजपा के जमाने में। अटलजी तीन घंटे लखनऊ में धरने पर बैठ जाते थे तो देशभर में कोहराम मच जाता था। आडवाणी, जोशी के आंदोलन ने देश को भावनात्मक रूप से हिलाकर रख दिया था। अब तो नेताओं को आम आदमी की किसी समस्या से कोई लेना-देना ही नहीं रहा। शहर हो या गांव, हर स्तर पर वो आम आदमी की समस्याओं की खातिर छोटे-बड़े आंदोलन, धरना-प्रदर्शन देखने को नहीं मिलते।

एक किसान आंदोलन है, जो पंजाब की सीमाओं पर लम्बे समय से चल रहा है। बाकी देश के किसानों को उससे भी कोई मतलब नहीं है। जहां तक हमारे नेताओं का सवाल है, वे तो अब राजधानियों में बैठे नए-नए मामले उठाते रहते हैं।

कभी औरंगजेब, कभी कोई कामरा, तो कभी कुछ और। यही वजह है कि गांव-खेड़ों में जाना उनके शेड्यूल में होता ही नहीं।

महंगाई का मुद्दा अब गौण है सब्जी-भाजी के भाव तो होते ही नहीं। इतने किलो ये दे दो, इतने किलो ये। टोटल पूछा और कर दिया ऑनलाइन पेमेंट। न भाव पता, न ताव। सब्जी वाले से मीठी बहस तो दूर की बात। महंगाई का मुद्दा गौण हो गया है। कुछ नेता तो ऐसे भी हैं, जिन्हें हम अब भी अपनी पलकों पर बिठाए रखना चाहते थे, लेकिन उनके आचार-विचार और व्यवहार के कारण हमारी नजरों से गिरकर उन्होंने खुदकुशी कर ली। इस हाल पर एक कविता- हालात खस्ताहाल हैं, शेष सब कुशल। किस्से लिखे हैं रोटियों पर, पढ़ेगा कौन? सब कुर्सियों के पास हैं, शेष सब कुशल।

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