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20 मिनट पहले
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नवनीत गुर्जर
बड़ा अच्छा लगता है जब आकाश में उड़ते हैं। इतने विशाल देश के किसी भी कोने से कहीं भी डेढ़-पौने दो घंटे में पहुंच जाते हैं। ऊपर से नीचे बादलों को देखने का आनंद अलग से! रुई के फाहे जैसे बादल। देखकर लगता है जैसे ऊपर वाले ने अपने खेत में झक सफेद कपास बीजा हो! कहीं-कहीं पहाड़ जैसा रुई का ढेर नुमा नजर आता है।
लगता है कपास किसी जिनिंग फैक्टरी में पड़ा है। ढेर का ढेर। …और अब इसे मशीनों में पींजा जाएगा। इस बीच कहीं नीला आसमां भी नजर आता है जैसे कपास के ढेरों के बीच-बीच, छोटा-मोटा समंदर पसरा पड़ा हो!
हाल में आए विमानन संकट ने ये सारा लुत्फ खारा कर दिया। लोग परेशान होते रहे। किसी की अगली विदेशी फ्लाइट छूट गई। किसी का परिजन जो कहीं अंतिम सांस ले रहा था, वह उससे मिल तक नहीं पाया। किसी के लाखों के सौदे अटक गए। किसी का कोई और जरूरी काम होने से रह गया। लेकिन विमानन कंपनी, डीजीसीए या सरकार को कोई फर्क नहीं पड़ा।
एक साल पहले नियम में किए गए संशोधन का इंडिगो जैसी बड़ी विमानन कंपनी ने कोई पालन नहीं किया और अचानक से देश में इतना बड़ा संकट खड़ा कर दिया कि अब दो हफ्ते बीत जाने के बावजूद कहीं कोई समाधान दिखाई नहीं दे रहा है। आसमान में उड़ने का किराया आसमान छू रहा है। पांच-पांच, छह-छह हजार रुपए की जगह पचास हजार तक किराया वसूला गया। किसी की कोई बंदिश नहीं। किसी पर कोई लगाम नहीं।
कहने को बड़े-बड़े आंकड़े सामने लाए जा रहे हैं कि इंडिगो कंपनी ने पिछले पांच-सात दिनों में छह सौ करोड़ का रिफंड किया। सवाल रिफंड का नहीं है। आखिर यात्री का जो नुकसान हुआ है, उसकी भरपाई कौन करेगा? ऊपर से सरकार ने अपना नियम वापस तक कर लिया। एक तरह से इंडिगो ने सरकार को अघोषित हड़ताल के जरिए ब्लैकमेल किया। न सरकार को कोई फर्क पड़ा, न इंडिगो पर फर्क पड़ता दिखाई दे रहा है।
पहले दिन जब तीन दिसंबर को यह संकट आया तो अफवाह यह भी उड़ाई गई कि रूसी राष्ट्रपति पुतिन भारत आ रहे हैं, इसलिए सुरक्षा की दृष्टि से फ्लाइटें कैंसिल की जा रही हैं। लोग हैरत में थे कि ये कैसी व्यवस्था है कि पहली बार किसी देश के राष्ट्रपति के भारत आने पर पूरे हवाई अड्डों और वहां की उड़ानों पर संकट मंडरा रहा है।
लेकिन हकीकत दूसरे दिन सामने आई। यह सब इंडिगो के अपने संकट का परिणाम था। उसका अपना क्रू और उसके अपने पायलट नए नियमों के तहत दो से ज्यादा फ्लाइट उड़ाने को तैयार नहीं थे और यह कंपनी एक के बाद एक लगातार फ्लाइटें कैंसिल करती जा रही थी।
यात्रियों की सुविधा, उनकी अर्जेंसी से किसी को कोई मतलब नहीं था। लोग हवाई अड्डों पर लड़ रहे थे। मारपीट कर रहे थे। रो रहे थे। सरकार सोई रही और कंपनी मजे से अपनी फ्लाइट्स कैंसिल करती जा रही थी। इतने दिन के संकट के बाद अब बात चल रही है कि ऐसे संकटों में विमान यात्रियों को हर्जाना देने का प्रावधान किया जाए। ये भी सिर्फ बात ही है। नियम कब बनेगा और कब लागू होगा, पता नहीं। नियम बन भी गया तो विमानन कंपनियां उसे मानेंगी भी या इसी तरह का संकट पैदा करके फिर अपनी बातें मनवा लेंगी?
ज्यादा विमान संख्या बताकर इंडिगो कंपनी ज्यादा उड़ानों की अनुमति लेती रही। डीजीसीए बड़ी शान से यह इजाजत देता भी रहा। न कोई देखने वाला, न कोई सुनने वाला। हैरत इस बात की है कि बड़े से बड़ा संकट आने पर ही हमारे जिम्मेदारों की आंख क्यों खुलती है? सब कुछ शुरू से ही नियमों के अधीन क्यों नहीं चलता?
आम आदमी को तो नियमों से ऐसे बांध दिया जाता है कि वो हिल भी नहीं पाता, लेकिन इन बड़ी कंपनियों का हाल यह है कि नियम-कानून इन सब की ताक पर रखे रहते हैं। रखें भी क्यों नहीं, पूरा देश तो इस वक्त एसआईआर में लगा हुआ है। उससे फुरसत मिले! उसके विरुद्ध या पक्ष में बयानबाजी से फुरसत मिले तो दूसरे किसी काम के बारे में सोचा जाए।
बहरहाल, यह सरकार की जिम्मेदारी है कि देश में आए इस बड़े विमानन संकट का तुरंत निदान करे और आगे के लिए ऐसे सख्त नियम बनाए जाएं कि कोई विमानन कंपनी इस तरह यात्रियों की भावनाओं का मजाक न उड़ा पाए। उनके अधिकारों, उनकी जरूरतों के साथ इस तरह का खेल न खेल पाए।
संकट आने पर ही जिम्मेदारों की आंख क्यों खुलती है?
सब कुछ शुरू से ही नियमों के अधीन क्यों नहीं चलता? आम आदमी को तो नियमों से ऐसे बांध दिया जाता है कि वो हिल भी नहीं पाता, लेकिन इन बड़ी कंपनियों का हाल यह है कि नियम-कानून इन सब की ताक पर रखे रहते हैं।
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नवनीत गुर्जर का कॉलम: आसमान में संकट, जमीन पर चीख-पुकार

