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- Nanditesh Nilay’s Column Is There Any Morality Or Responsibility In Business Or Not?
2 घंटे पहले
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नंदितेश निलय वक्ता, एथिक्स प्रशिक्षक एवं लेखक
हमने कई वर्षों से बिजनेस एथिक्स और ग्राहक सेवा जैसे शब्दों को सुना है। कॉर्पोरेट की दुनिया में तो इनकी खूब चर्चा होती है। ग्राहक को भगवान से कम नहीं समझा जाता। लेकिन देश की सबसे बड़ी प्राइवेट एयरलाइंस ने उन तमाम मानकों की धज्जियां उड़ा दीं।
अभी तक तो फ्लाइट कैंसलेशन का अनुभव अपने साथ एकाध घटना को ही लेकर आता था, लेकिन एक साथ हजारों फ्लाइट का कैंसल हो जाना दु:खद और हतप्रभकारी अनुभव रहा। किसी भी यात्री के लिए जल्दी पहुंचने से जरूरी है, सुरक्षित पहुंचना। और अहमदाबाद एयरक्रैश ने तो हर किसी को थोड़ी देर के लिए ही सही, लेकिन सुरक्षा और असुरक्षा के बीच उलझन के साथ तो रखा ही है। ऐसे में नई गाइडलाइंस पायलट और यात्री- दोनों के लिए अच्छी खबर थीं।
अगर हम इस समूची घटना को पायलट के नजरिए से देखें तो मानेंगे कि तमाम पायलट 24 बाय 7, रात-दिन, अलग-अलग टाइम जोन में, बहुत ज्यादा दिमागी दबाव में काम करते हैं। कोई हवाई जहाज का मालिक या यात्री यह नहीं समझ सकता कि अलग-अलग टाइम जोन्स में अनवरत काम करने का किसी के मानसिक और शारीरिक संतुलन पर कितना प्रभाव पड़ता है।
साथ ही, हवाई जहाज उड़ाते समय अगर पायलट मानसिक या भावनात्मक असंतुलन में हो तो फ्लाइट का संतुलन तो बिगड़ता ही है, सुरक्षा के साथ भी समझौता होता है। केबिन-क्रू से सुरक्षा नियमों को सुनता यात्री, कॉफी की चुस्कियों के बीच यह महसूस नहीं कर पाता कि प्लेन को उनके जैसा ही कोई मनुष्य उड़ा रहा है और उसका हर तरह से स्वस्थ रहना कितना जरूरी है।
अगर लंबे समय तक नींद की कमी रही तो सिर्फ थकान ही नहीं होती, बल्कि व्यक्ति के ध्यान, भावनात्मक नियंत्रण, प्रतिक्रिया प्रबंधन पर भी असर होता है और कॉकपिट में तो कुछेक सेकंड की चूक सैकड़ों यात्रियों के जीवन पर भारी पड़ जाती है।
कोई यात्री यह नहीं चाहेगा कि उसकी फ्लाइट को उड़ाता पायलट शारीरिक और मानसिक थकान से पस्त हो। इसलिए अगर नए नियम हर हफ्ते उनके ज्यादा आराम की वकालत करते हैं, रात में लैंडिंग की संख्या को कम करने की बात करते हैं, नाइट ड्यूटी के बाद उनके रिकवरी टाइम पर ज्यादा जोर देते है तो इसका विमानन कंपनियों और यात्रियों के द्वारा स्वागत ही किया जाना चाहिए।
ऐसे बदलाव सभी को थोड़ी देर के लिए परेशान भले कर सकते हों, लेकिन लंबे समय में किसी उड़ान की सुरक्षा को बेहतर ही बनाते हैं। लेकिन जिस तरह से अफरातफरी मची और जितनी संख्या में फ्लाइट्स कैंसल हुईं, उससे यह प्रश्न सभी को पूछने का हक है कि बिजनेस में कोई एथिक्स या सामाजिक जिम्मेदारी होती है या नहीं?
इस घटना को यात्री की नजर से भी देखें। वह यात्री जिसकी कोई परीक्षा होगी और ट्रेन या कार से पहुंचना संभव न हो पाया होगा, वह जो स्टार्टअप प्रजेंटेशन के लिए चुना गया होगा, कोई बीमार होगा, कोई वृद्ध होगा, कोई युवा अपनी शादी में ही नहीं पहुंच पाया होगा तो कोई अपने समान को ढूंढ रहा होगा! ऊपर से टिकट की मारामारी। ऐसे में कौन जिम्मेदारी लेगा?
जापान में तो कुछेक सेकंड का लेट होना भी माफीनामे का कारण बन जाता है, लेकिन हमारे देश में ऐसे संकट का नॉर्मलाइजेशन क्यों हो रहा है? क्या कोई एयरलाइंस इतना निष्ठुर हो सकता है और सिर्फ अपने लाभ के लिए कुछ भी कर सकता है? ग्राहक सेवा का मंत्र रटती कंपनियां अचानक ऐसे क्यों बदल जाती हैं कि ग्राहकों को भगवान तो क्या इंसान भी नहीं समझतीं? क्या किसी कंपनी के लिए सिर्फ लाभ और बैलेंस शीट ही सबकुछ होता है? क्या मुश्किल के समय अपने सबसे बड़े स्टेकहोल्डर यानी ग्राहक को लेकर नहीं सोचना चाहिए?
(ये लेखक के अपने विचार हैं)
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नंदितेश निलय का कॉलम: बिजनेस में भी कोई नैतिकता या जिम्मेदारी होती है या नहीं?
