दुनिया को डराने वाले ट्रम्प यूरोप के आगे क्यों झुके: 27 देशों ने ‘ट्रेड बाजूका’ की धमकी दी; घबराए ट्रम्प ने 10% टैरिफ हटाया Today World News

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वॉशिंगटन डीसी14 मिनट पहले

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अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प ने स्विट्जरलैंड के दावोस में हुए वर्ल्ड इकोनॉमिक फोरम में जिस तरीके से यूरोपीय देशों की खिल्ली उड़ाई, उसी से साफ हो गया है कि वे इन्हें कितनी अहमियत देते हैं।

इसी बैठक से यूरोप को एक अहम सबक भी मिला। दावोस ने यूरोप को सिखाया कि जब सभी देश मिलकर सीमाओं और संप्रभुता की रक्षा करते हैं, तो बड़े देशों के दबाव का मुकाबला किया जा सकता है।

ट्रम्प ने जब इन देशों पर 1 फरवरी से 10% टैरिफ लगाने की धमकी दी तो, यूरोप ने अमेरिका पर ‘ट्रेड बाजूका’ लगाने की धमकी दी।

इसका मतलब साफ था कि यूरोप भी पूरी ताकत से जवाबी आर्थिक कदम उठाने के लिए तैयार है। आखिरकार दुनिया को टैरिफ से डराने वाले ट्रम्प को यूरोपीय यूनियन (EU) के 27 देशों के आगे झुकने पड़ा।

ट्रम्प ने ग्रीनलैंड पर भी नरमी बरती और कहा कि इस पर कब्जा करने के लिए ताकत का इस्तेमाल नहीं करेंगे। उन्होंने यूरोपीय देशों पर जो 10% टैरिफ लगाने का ऐलान किया था, उससे भी पीछे हट गए।

फ्रांस के राष्ट्रपति इमैनुएल मैक्रों ने 20 जनवरी को दावोस इकोनॉमिक फोरम में अमेरिका पर ट्रेड बाजुका का इस्तेमाल करने की धमकी दी थी।

फ्रांस के राष्ट्रपति इमैनुएल मैक्रों ने 20 जनवरी को दावोस इकोनॉमिक फोरम में अमेरिका पर ट्रेड बाजुका का इस्तेमाल करने की धमकी दी थी।

आखिर यह ट्रेड बाजूका क्या है जिसकी वजह से दुनिया के सबसे ताकतवर नेता को अपने कदम वापस खींचने पड़े…

‘ट्रेड बाजूका’ दरअसल यूरोपीय यूनियन (EU) का एक खास कानून है, जिसका असली नाम है एंटी-कोएर्शन इंस्ट्रूमेंट।

इस कानून का मकसद यह है कि अगर कोई देश EU या उसकी कंपनियों पर गलत तरीके से दबाव बनाए (जैसे टैरिफ लगाकर धमकाना), तो EU उसके जवाब में सख्त आर्थिक कदम उठा सके।

इसके तहत EU-

उस देश के सामान का इम्पोर्ट-एक्सपोर्ट रोक सकता है

उसकी कंपनियों को EU के सरकारी टेंडर से बाहर कर सकता है

उस देश के निवेश पर पाबंदी लगा सकता है

यानी कि अगर यूरोपीय यूनियन चाहे तो अपने 45 करोड़ लोगों वाले बड़े बाजार का दरवाजा ही बंद कर सकता है। इससे सामने वाले देश की कंपनियों को अरबों डॉलर का नुकसान हो सकता है।

अगर यह कदम उठाया गया तो इससे अमेरिकी कंपनियों और अमेरिका की अर्थव्यवस्था को अरबों डॉलर का नुकसान हो सकता है।

चीन के खिलाफ बने कानून से अमेरिका को डराया

साल 2021 की बात है। यूरोपीय देश लिथुआनिया ने ताइवान को अपनी राजधानी विल्नियस में रिप्रेजेंटेटिव ऑफिस खोलने की इजाजत दे दी। इससे चीन नाराज हो गया। उसे लगा कि लिथुआनिया, ताइवान के इंटरनेशनल दर्जे को बढ़ावा दे रहा है।

चीन ताइवान को अपनी ही एक प्रांत मानता है और ऐसे किसी कदम को वन चाइना पॉलिसी का उल्लंघन मानता है। इसके बाद चीन ने लिथुआनिया और उससे जुड़े EU सामानों के व्यापार को रोक दिया।

यूरोपीय यूनियन को इस घटना से सीख मिली। उसे लगा कि कि कोई भी बड़ा देश भविष्य में इसी तरह उसके सदस्य देशों या कंपनियों पर दबाव बना सकता है। दिसंबर 2021 से ‘एंटी-कोएर्शन इंस्ट्रूमेंट’ कानून को बनाने की शुरुआत हुई।

ताकि अगर कोई देश व्यापार या निवेश के जरिए यूरोप पर दबाव डाले, तो EU उसके खिलाफ सख्त आर्थिक कदम उठा सके। दिसंबर 2023 में यह कानून बनकर तैयार हो गया।

मिलकर लड़ें तो बड़े देशों से लड़ा जा सकता है

न्यूयॉर्क टाइम्स के मुताबिक, देशों की सीमाएं और उनकी आजादी यूरोप की सोच की बुनियाद है। यह समझ दूसरे विश्व युद्ध के बाद बनी, जब बड़ी ताकतों के जमीन हड़पने की जिद की वजह से लाखों लोग मारे गए। उस अनुभव से यूरोप ने सीखा कि छोटे देशों को बड़ी ताकतों से बचाने का सबसे अच्छा तरीका सब मिलकर एक-दूसरे की सीमाओं की रक्षा करना है।

आज यूरोप को फिर से बड़ी ताकतों की बढ़ती जिद का सामना करना पड़ रहा है। रूस यूक्रेन पर कब्जा करने की कोशिश कर रहा है, जबकि पहले वह खुद यूक्रेन की आजादी को मान चुका है। दूसरी तरफ अमेरिका, डेनमार्क से ग्रीनलैंड अपने कब्जे में देने की बात कर रहा है, जबकि डेनमार्क यूरोप और नाटो का भरोसेमंद साथी देश है।

यूरोप के लिए अपनी सीमाओं और अपनी आजादी की रक्षा सबसे अहम बात है। इस पर कोई समझौता नहीं हो सकता। यूरोपीय संघ और नाटो, दोनों ने यह बात साफ कर दी है।

भले ही आज की दुनिया में अंतरराष्ट्रीय कानून, संयुक्त राष्ट्र के नियम या पुराने समझौते कमजोर पड़ते दिखें, लेकिन यूरोप के लिए इन्हीं नियमों पर टिके रहना जरूरी है। यही उसकी सोच है और यही उसका रास्ता भी।

दुनिया के गर्म होने से आर्कटिक की बर्फ तेजी से पिघल रही है। इस वजह से भविष्य के कई रास्ते खुल रहे हैं। एक्सपर्ट्स का मानना है कि अमेरिका इस वजह से ग्रीनलैंड पर कब्जा चाहता है।

दुनिया के गर्म होने से आर्कटिक की बर्फ तेजी से पिघल रही है। इस वजह से भविष्य के कई रास्ते खुल रहे हैं। एक्सपर्ट्स का मानना है कि अमेरिका इस वजह से ग्रीनलैंड पर कब्जा चाहता है।

यूरोप को अब अमेरिका पर पहने जैसा भरोसा नहीं

CNN के मुताबिक, EU नेताओं को भले ही एक हफ्ते की कूटनीतिक उठा-पटक के बाद थोड़ी राहत मिली हो, लेकिन किसी को नहीं लगता कि हालात फिर पुराने जैसे हो जाएंगे। व्हाइट हाउस ने अब तक डेनमार्क के साथ ग्रीनलैंड को लेकर किसी समझौते का ब्योरा नहीं दिया है।

अमेरिका की सैन्य और आर्थिक ताकत अब भी यूरोप के लिए अहम है। यूरोप खुद अभी रूस से अकेले लंबे युद्ध के लिए तैयार नहीं है। ट्रम्प अपने विरोधियों को निशाना बनाने के लिए जाने जाते हैं, इसलिए कई देश उनसे सीधा टकराव नहीं चाहते।

हालांकि EU के भीतर अब यह सोच मजबूत हो रही है कि उसे अमेरिका की मर्जी पर निर्भर रहने के बजाय खुद को ज्यादा आजाद और मजबूत बनाना होगा, खासकर रक्षा के मामले में। कुछ देशों ने माना कि ट्रम्प को खुश करने की नीति अब काम नहीं करेगी।

यूरोप के नेताओं को लगने लगा कि अब दुनिया एक ज्यादा कठोर और नियमों से बाहर की जगह बनती जा रही है, जहां ताकतवर की ही चलती है और अमेरिका-यूरोप के बीच का पुराना भरोसा टूट चुका है।

ट्रम्प ने 2019 में ही साफ कर दिया था कि वे डेनमार्क के इलाके ग्रीनलैंड में रुचि रखते हैं। लेकिन पिछले एक हफ्ते में उन्होंने जिस तरह NATO के एक सहयोगी देश को धमकाया, उससे यूरोप हैरान रह गया।

पोलैंड के प्रधानमंत्री डोनाल्ड टुस्क ने चेतावनी दी कि यूरोप कमजोर नहीं हो सकता, न दुश्मनों के सामने और न ही सहयोगियों के सामने। उन्होंने ‘अपिजमेंट’ जैसे शब्द का इस्तेमाल किया, जो यूरोप के इतिहास में बहुत दर्दनाक माना जाता है।

बड़ी ताकतों के डर से यूरोप ने संप्रभुता का महत्व समझा

यूरोपीय काउंसिल ऑन फॉरेन रिलेशंस के निदेशक मार्क लियोनार्ड ने कहा कि चीन, रूस और अमेरिका जैसी बड़ी ताकतों के दबाव में यूरोप फिर से संप्रभुता के महत्व को समझ रहा है। उन्होंने कहा कि दुनिया की व्यवस्था बदल रही है और यूरोप अब अपने नियमों और सिद्धांतों को बचाने की कोशिश कर रहा है।

कनाडा के प्रधानमंत्री मार्क कार्नी ने दावोस में कहा था कि पुरानी अंतरराष्ट्रीय व्यवस्था खत्म हो चुकी है। अब बड़े देश व्यापार, टैरिफ और सप्लाई चेन को हथियार की तरह इस्तेमाल कर रहे हैं और ऐसे में छोटे और मंझोले देशों को अपनी सुरक्षा खुद करनी होगी।

यूरोप ने ट्रम्प की इस मांग को ठुकरा दिया कि यूक्रेन अपनी जमीन रूस को सौंप दे। यूरोपीय देशों ने साफ कहा कि भले ही रूस कुछ इलाकों पर कब्जा बनाए रखे, लेकिन उसे कभी मान्यता नहीं दी जाएगी।

यूरोपीय देशों ने यूक्रेन को अमेरिका से ज्यादा आर्थिक और सैन्य मदद दी है। ट्रम्प की तरफ से फंड रोकने के बाद यूरोप ने ही यूक्रेन की मदद की जिम्मेदारी संभाली और हाल ही में 90 अरब यूरो की नई सहायता मंजूर की।

बेल्जियम बोला- गुलाम बनकर रहना मंजूर नहीं

बेल्जियम के प्रधानमंत्री बार्ट डे वेवर ने कहा कि बहुत सारी रेड लाइन्स पार की जा रही हैं और गुलाम बनकर रहना मंजूर नहीं है। यूरोपीय अधिकारियों का कहना है कि ट्रम्प को खुश करने की पॉलिसी नाकाम रही है और अब अपने मूल सिद्धांतों के लिए मजबूती से खड़ा होना जरूरी है।

यूरोपीय आयोग की अध्यक्ष उर्सुला वॉन डेर लेयेन ने कहा कि अमेरिका से निपटने में सख्ती, बातचीत, तैयारी और एकजुटता काम आई है और आगे भी यही तरीका अपनाया जाएगा।

एक्सपर्ट्स ने चेतावनी दी है कि रूस, चीन और अमेरिका अंतरराष्ट्रीय व्यवस्था बदलने की कोशिश कर रहे हैं और यूरोप को बांटना चाहते हैं। ऐसे में EU और नाटो के सामने अपनी एकता और अस्तित्व बचाने की बड़ी चुनौती है।

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