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अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प ने हिंद महासागर में स्थित डिएगो गार्सिया आइलैंड को लेकर ब्रिटेन पर नाराजगी जताई है। उन्होंने मंगलवार को ट्रुथ सोशल पर कहा कि ब्रिटेन यह द्वीप मॉरीशस को देने की योजना बना रहा है, जबकि यहां अमेरिका का एक बेहद अहम मिलिट्री बेस है। इस द्वीप को बिना किसी वजह के देना हैरान करने वाला और गलत फैसला है। ट्रम्प ने कहा कि- हैरानी की बात है कि हमारा शानदार नाटो सहयोगी ब्रिटेन इस समय डिएगो गार्सिया द्वीप मॉरीशस को सौंपने की योजना बना रहा है। वो भी बिना किसी कारण के। इसमें कोई शक नहीं है कि चीन और रूस ने इस घोर कमजोरी को भांप लिया है। उन्होंने आगे लिखा कि ये देश सिर्फ ताकत को समझते हैं और इसी वजह से उनकी लीडरशिप में अमेरिका को एक साल में पहले से कहीं ज्यादा सम्मान मिला है। ट्रम्प ने कहा कि इतना अहम इलाका सौंपना बहुत बड़ी बेवकूफी है। यह फैसला राष्ट्रीय सुरक्षा से जुड़े कई मुद्दों में से एक है, जिसके चलते अमेरिका के लिए ग्रीनलैंड हासिल करना जरूरी हो जाता है। नेपोलियन की हार के बाद ब्रिटेन को मिला चागोस आइलैंड ट्रम्प जिस डिएगो गार्सिया आइलैंड की बात कर रहे हैं दरअसल वो चागोस आइलैंड का हिस्सा है। चागोस आइलैंड हिंद महासागर में मौजूद आइलैंडों का एक समूह है। यह ब्रिटेन से करीब 9,334 किलोमीटर दक्षिण-पूर्व और मॉरीशस से लगभग 2,012 किलोमीटर उत्तर-पूर्व में स्थित है। साल 1814 में नेपोलियन की हार के बाद पेरिस संधि के तहत चागोस आइलैंड और मॉरीशस ब्रिटेन के कब्जे में आए थे। 1965 में इन आइलैंडों को ‘ब्रिटिश हिंद महासागर क्षेत्र’ बनाया गया और मॉरीशस से अलग कर दिया गया। मॉरीशस को 1968 में आजादी मिली थी। उस समय यह तय हुआ था कि जब ये आइलैंड ब्रिटेन की रक्षा के लिए जरूरी नहीं रहेंगे, तब इन्हें मॉरीशस को लौटा दिया जाएगा। सबसे बड़े आइलैंड डिएगो गार्सिया पर ब्रिटेन और अमेरिका का संयुक्त सैन्य अड्डा बनाया गया। वहां रहने वाले लोगों को मॉरीशस और सेशेल्स में बसाया गया और कुछ लोगों को 2002 में ब्रिटेन लाया गया। मॉरीशस 50 साल से इन आइलैंड्स का अधिकार मांग रहा मॉरीशस 1980 के दशक से इन आइलैंड्स पर अपना अधिकार मांगता रहा है और उसने यह मामला अंतरराष्ट्रीय अदालतों में उठाया। साल 2019 में अंतरराष्ट्रीय न्यायालय ने एक फैसले में कहा कि 1968 में मॉरीशस को आजादी देते वक्त उपनिवेश खत्म करने की प्रोसेस पूरी नहीं हुई थी और ब्रिटेन को जल्द से जल्द चागोस आइलैंड्स का प्रशासन खत्म करना चाहिए। ऋषि सुनक के लीडरशिप वाली कंजरवेटिव सरकार ने 2022 में ऐलान किया कि ब्रिटेन और मॉरीशस चागोस आइलैंड्स की संप्रभुता को लेकर बातचीत शुरू करेंगे। सरकार का कहना था कि लगातार कानूनी चुनौतियों के खतरे को देखते हुए ब्रिटेन की सुरक्षा के लिए कानूनी स्थिति का क्लियर होना जरूरी है। सरकार ने कहा कि इससे डिएगो गार्सिया पर ब्रिटेन और अमेरिका के मिलिट्री बेस का काम ठीक से चलता रहेगा। कंजरवेटिव सरकार ने जुलाई 2024 के आम चुनाव से पहले मॉरीशस के साथ 11 दौर की बातचीत की। ब्रिटेन और मॉरीशस ने 2024 में समझौते पर साइन किए ब्रिटिश पीएम कीर स्टार्मर की लेबर पार्टी के सत्ता में आने के बाद 3 अक्टूबर 2024 को दोनों देशों ने एक जॉइंट स्टेटमेंट जारी किया और बताया कि राजनीतिक समझौता हो गया है। कीर स्टार्मर और मॉरीशस के प्रधानमंत्री नवीन रामगुलाम ने 22 मई 2025 को इस संधि पर हस्ताक्षर किए। स्टार्मर ने कहा कि अगर मॉरीशस कानूनी कार्रवाई करता, तो ब्रिटेन के पास जीतने का कोई ठोस मौका नहीं होता और कुछ ही हफ्तों में अंतरिम आदेश आ सकता था। उन्होंने यह भी कहा कि बिना समझौते के ब्रिटेन के पास इस बात को रोकने का भी कानूनी आधार नहीं होता कि चीन या दूसरे देश चागोस आइलैंड पर मिलिट्री एक्टिविटी न करें। इस समझौते पर अमेरिका ने कहा कि सभी विभागों की जांच के बाद यह तय किया गया है कि यह समझौता डिएगो गार्सिया में अमेरिका और ब्रिटेन के जॉइंट मिलिट्री बेस को लंबे समय तक सुरक्षित और ठीक से चलाने में मदद करेगा। फरवरी 2025 में ब्रिटिश प्रधानमंत्री से मुलाकात के दौरान ट्रम्प ने कहा था कि वह इस समझौते के साथ आगे बढ़ने के पक्ष में हैं और उन्हें लगता है कि यह ठीक से काम करेगा। ब्रिटेन के पास 99 साल की लीज पर रहेगा डिएगो गार्सिया हालांकि केमी बैडेनोक की लीडरशिप में विपक्षी कंजरवेटिव पार्टी ने इस समझौते की आलोचना की और इसे आत्मसमर्पण बताया। उन्होंने कहा कि ब्रिटेन अपना इलाका सौंप रहा है और इसके लिए 30 अरब पाउंड (3.49 लाख करोड़ रुपए) से ज्यादा की रकम दे रहा है। विपक्षी नेता जेम्स कार्ट्रिज ने कहा कि उनकी सरकार ने ऐसा कोई समझौता नहीं किया क्योंकि वे अपनी ही जमीन को वापस किराये पर लेने के लिए अरबों पाउंड देने के खिलाफ हैं। इस समझौते के तहत मॉरीशस को द्वीपों की संप्रभुता मिलेगी, लेकिन ब्रिटेन डिएगो गार्सिया को 99 साल की लीज पर अपने पास रखेगा, जिसे आगे बढ़ाने का ऑप्शन भी होगा। इसके लिए ब्रिटेन पमेंट करेगा। शुरुआती 99 साल में हर साल औसतन 101 मिलियन पाउंड (1173 करोड़ रुपए) खर्च होने का अनुमान है। कुल खर्च करीब 3.4 अरब पाउंड (40 हजार करोड़ रुपए) बताया गया है, हालांकि कुछ लोगों का मानना है कि यह इससे ज्यादा भी हो सकता है। बदलती जियो पॉलिटिक्स में भारत के लिए जरूरी चागोस आइलैंड तेजी से बदलती भू राजनीतिक स्थितियों के बीच भारत के लिए मॉरीशस और चागोस आइलैंड का महत्व तेजी से बढ़ रहा है। भारत ने 23 मई 2025 को ब्रिटेन और मॉरीशस के बीच हुए उस समझौते का स्वागत किया था, जिसके तहत चागोस द्वीप समूह की संप्रभुता मॉरीशस को दी जा रही है। पिछले 10 सालों में भारत सरकार ने विदेश मंत्रालय और रक्षा मंत्रालय में हिंद महासागर क्षेत्र के लिए अलग डिवीजन बनाया है, जिसे इंडियन ओशन रीजन डिवीजन कहा जाता है। इस डिवीजन में अब मॉरीशस, सेशेल्स, मेडागास्कर, कोमोरोस, फ्रांस का रीयूनियन द्वीप, श्रीलंका और मालदीव शामिल हैं। इससे साफ होता है कि भारत इस क्षेत्र को बहुत अहम मानता है। चीन इस इलाके में तेजी से अपनी मौजूदगी बढ़ा रहा पिछले 10 से 15 सालों में चीन ने हिंद महासागर क्षेत्र में अपनी आर्थिक और सैन्य मौजूदगी तेजी से बढ़ाई है। चीन ने वॉरशिप भेजे हैं, समुद्री सुरक्षा ऑपरेशन में हिस्सा लिया है और कई अहम नौसैनिक ठिकानों तक पहुंच बनाई है। उसने इस पूरे क्षेत्र में दर्जनों बंदरगाहों में इन्वेस्टमेंट किया है, जिनमें से कई ऐसे हैं जहां सैन्य जहाज भी रुक सकते हैं। ब्लूमबर्ग की 2025 की रिपोर्ट के मुताबिक, चीन की यह बढ़ती ताकत भारत के लिए चिंता का कारण है। भारत ने मॉरीशस के अगालेगा आइलैंड पर एक हवाई पट्टी बनाई है, ताकि वहां से टोही विमान उड़ाकर चीनी एक्टिविटी पर नजर रखी जा सके। हिंद महासागर अफ्रीका के हॉर्न से लेकर दक्षिण-पूर्व एशिया तक फैला हुआ है। इस क्षेत्र में करीब 3 अरब लोग रहते हैं और दुनिया का लगभग 40% समुद्री तेल इसी रास्ते से गुजरता है। दुनिया के सबसे अहम समुद्री व्यापार मार्गों में से कई इसी महासागर में हैं, जो यूरोप, एशिया, अफ्रीका और मध्य पूर्व को जोड़ते हैं। भारत, चीन और अमेरिका तीनों मॉरीशस में असर बढ़ा रहे मॉरीशस एक आर्थिक रूप से मजबूत और लोकतांत्रिक देश है, जिसका समुद्री क्षेत्र बहुत बड़ा है। भारत, चीन और अमेरिका तीनों ही यहां अपना प्रभाव बढ़ाने की कोशिश कर रहे हैं। भारत ने मॉरीशस में मेट्रो लाइन, सुप्रीम कोर्ट और अस्पताल जैसे बड़े प्रोजेक्ट बनाए हैं। वहीं चीन ने हवाई अड्डा टर्मिनल, बांध, स्पोर्ट्स कॉम्पलेक्स और क्रूज टर्मिनल जैसे कई निर्माण किए हैं। मॉरीशस चीन के साथ फ्री ट्रेड एग्रीमेंट (FTA) करने वाला पहला अफ्रीकी देश भी बना। मॉरीशस के विदेश मंत्री ने 2025 में कहा था कि मौजूदा हालात उनके देश के लिए फायदेमंद हैं, क्योंकि अब कोई भी बड़ी शक्ति छोटे देशों को नजरअंदाज नहीं कर सकती। उन्होंने कहा कि मॉरीशस किसी एक देश तक सीमित नहीं है और सभी के साथ रिश्ते रखने के लिए खुला है।
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ट्रम्प हिंद महासागर के द्वीप को लेकर ब्रिटेन से नाराज: कहा- डिएगो गार्सिया आइलैंड मॉरिशस को देना बेवकूफी, यहां हमारा अहम मिलिट्री बेस


