जरूरत की खबर– क्या आपके पीरियड्स टाइम पर नहीं आते: सीड साइक्लिंग से होगा फायदा, कैसे फॉलो करें, बता रही हैं सीनियर डाइटीशियन Health Updates

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18 मिनट पहलेलेखक: अदिति ओझा

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हर महिला को कभी-न-कभी पीरियड्स से जुड़ी परेशानी होती है। कभी पीरियड्स लेट हो जाते हैं। कभी पीरियड्स मिस होते हैं। कभी दर्द इतना ज्यादा होता है कि सहना मुश्किल हो जाता है। आज यह समस्या सिर्फ कुछ महिलाओं तक सीमित नहीं है। बड़ी संख्या में महिलाएं इररेगुलर पीरियड्स से जूझ रही हैं। कई महिलाओं को हॉर्मोनल इंबैलेंस की दिक्कत भी हो रही है।

भारतीय महिलाओं में PCOS आज कॉमन हॉर्मोनल समस्या बन चुकी है। नेशनल इंस्टीट्यूट ऑफ हेल्थ के मुताबिक, भारत में हर 5 में से 1 युवा महिला PCOS से प्रभावित है। वहीं WHO की रिपोर्ट बताती है कि दुनिया भर में 6 से 13 प्रतिशत रिप्रोडक्टिव एज की महिलाएं PCOS से पीड़ित हैं। इनमें से करीब 70 प्रतिशत महिलाओं को इस बीमारी का पता ही नहीं चल पाता। वैश्विक स्तर पर देखा जाए तो हर आठवीं महिला PCOS से प्रभावित मानी जाती है।

इसी बीच सोशल मीडिया पर “सीड साइक्लिंग” नाम का एक फूड-बेस्ड वेलनेस ट्रेंड तेजी से लोकप्रिय हो रहा है, जिसके बारे में दावा किया जाता है कि यह हॉर्मोन बैलेंस करने, इररेगुलर पीरियड्स सुधारने, फर्टिलिटी बढ़ाने और PCOS के लक्षणों को कम करने में मदद कर सकता है। ऐसे में हमने लखनऊ के डॉ. राम मनोहर लोहिया आयुर्विज्ञान संस्थान की सीनियर डाइटीशियन डॉ. पूनम तिवारी से इस बारे में फैक्ट्स जानने चाहे।

तो चलिए आज जरूरत की खबर में जानेंगे कि–

  • सीड साइक्लिंग क्या है?
  • यह इररेगुलर पीरियड्स में कैसे मदद करती है?
  • क्या इसके फायदे सिर्फ महिलाओं तक सीमित हैं?

एक्सपर्ट: डॉ. पूनम तिवारी, सीनियर डाइटीशियन, डॉ. राम मनोहर लोहिया आयुर्विज्ञान संस्थान, लखनऊ

सवाल- सीड साइक्लिंग ट्रेंड क्या है?

जवाब- सीड साइक्लिंग एक डाइट बेस्ड वेलनेस ट्रेंड है। इसमें मेंस्ट्रुअल साइकिल के अलग-अलग फेज में चार तरह के बीज खाए जाते हैं। इसे खासतौर पर वे महिलाएं अपनाती हैं, जो बिना दवा के हॉर्मोनल पैटर्न को सपोर्ट करना चाहती हैं। इसका कोर आइडिया यह है कि मेंस्ट्रुअल साइकिल के हर फेज में शरीर को सही पोषक तत्व मिलें। वही पोषक तत्व, जिनकी उस समय जरूरत होती है। इसे एक नैचुरोपैथिक तरीका माना जाता है।

सवाल- यह इररेगुलर पीरियड्स को रेगुलर करने में कैसे मददगार है?

जवाब- मेंस्ट्रुअल साइकिल दो हिस्सों में बंटी होती है। पहले हिस्से में शरीर को सही मात्रा में एस्ट्रोजन की जरूरत होती है और दूसरे हिस्से में प्रोजेस्टेरोन की। सीड साइक्लिंग इसी जरूरत के अनुसार बीजों का इस्तेमाल करती है।

पीरियड के पहले दिन से लेकर 14वें दिन तक, यानी जब ओव्यूलेशन की तैयारी होती है, तब रोज अलसी और कद्दू के बीज खाए जाते हैं। इनमें मौजूद पोषक तत्व शरीर में एक्स्ट्रा एस्ट्रोजन को कंट्रोल करने और कमी होने पर उसे सपोर्ट करने में मदद करते हैं, जिससे ओव्यूलेशन सही समय पर हो सकता है।

15वें दिन से अगले पीरियड आने तक तिल और सूरजमुखी के बीज खाए जाते हैं। ये प्रोजेस्टेरोन हॉर्मोन को सपोर्ट करते हैं, जो पीरियड्स को समय पर लाने और पीरियड से पहले होने वाली समस्याओं जैसे पेट दर्द, मूड स्विंग और ब्रेस्ट पेन को कम करने में मदद करते हैं। जब दोनों फेज में हॉर्मोन सही तरह से सपोर्ट होते हैं, तो शरीर को यह “सिग्नल” मिलता है कि साइकिल को समय पर चलना है। धीरे-धीरे पीरियड्स का पैटर्न सुधरने लगता है।

सवाल- क्या बाकी लोगों (महिलाओं और पुरुषों) के लिए भी सीड साइक्लिंग फायदेमंद है?

जवाब- सीड साइक्लिंग सिर्फ पीरियड्स वाली महिलाओं तक सीमित नहीं है। सही तरीके से अपनाई जाए तो यह पुरुषों और उन महिलाओं के लिए भी फायदेमंद हो सकती है, जिनका पीरियड साइकिल इश्यू नहीं है। दरअसल, हॉर्मोन बैलेंस पुरुषों के लिए भी उतना ही जरूरी है। अलसी और कद्दू के बीज टेस्टोस्टेरोन सपोर्ट, प्रोस्टेट हेल्थ और मसल रिकवरी में मदद कर सकते हैं।

वहीं तिल और सूरजमुखी के बीज एनर्जी, स्पर्म हेल्थ और स्ट्रेस कंट्रोल के लिए अच्छे माने जाते हैं। पुरुषों के लिए इसे सख्ती से “साइक्लिंग” की तरह अपनाना जरूरी नहीं है। वे इन बीजों को मिक्स या रोटेशन में रोजाना ले सकते हैं। लेकिन किसी भी नई डाइट को बिना डॉक्टर की सलाह के शुरू नहीं करना चाहिए।

सवाल- सीड साइक्लिंग में किन-किन बीजों को शामिल किया जाता है?

जवाब- आमतौर पर पीरियड साइकिल के पहले 13-14 दिनों तक यानी फॉलिक्यूलर फेज में अलसी और कद्दू के बीज, जबकि साइकिल के दूसरे हिस्से यानी ल्यूटियल फेज में तिल और सूरजमुखी के बीज खाए जाते हैं।

सवाल-बीजों में कौन सा जरूरी न्यूट्रिशन होता है?

जवाब- हर बीज में हॉर्मोन हेल्थ से जुड़ा अलग-अलग पोषण होता है। अलसी के बीज में लिग्नान और फाइबर होते हैं, जो एस्ट्रोजन मेटाबॉलिज्म को सपोर्ट करते हैं। कद्दू के बीज जिंक का अच्छा स्रोत हैं, जो प्रोजेस्टेरोन प्रोडक्शन में जरूरी माना जाता है। सूरजमुखी के बीज में विटामिन-E होता है, जो हॉर्मोन रेगुलेशन में भूमिका निभाता है। तिल के बीज में लिग्नान और हेल्दी फैट्स होते हैं, जो हॉर्मोनल बैलेंस को सपोर्ट कर सकते हैं। इन सभी पोषक तत्वों को मिलाकर देखा जाए तो ये रिप्रोडक्टिव और मेटाबॉलिक हेल्थ के लिए फायदेमंद माने जाते हैं।

सवाल- सीड साइक्लिंग का सही तरीका क्या है?

जवाब- साइकिल के पहले 13–14 दिनों में रोज एक-एक टेबलस्पून पिसे हुए अलसी और कद्दू के बीज खाने की सलाह दी जाती है। इसे फॉलिक्यूलर फेज कहा जाता है। इसके बाद साइकिल के दूसरे हिस्से यानी ल्यूटियल फेज में, अगले पीरियड के पहले दिन तक रोज एक-एक टेबलस्पून पिसे हुए सूरजमुखी और तिल के बीज खाए जाते हैं। फिर अगली साइकिल के साथ यही प्रक्रिया दोहराई जाती है।

सवाल- क्या सीड साइक्लिंग वैज्ञानिक रूप से प्रमाणित है?

जवाब- जर्नल ऑफ फार्मेसी एंड बायोएलाइड साइंसेज में प्रकाशित एक स्टडी के अनुसार, मेडिकल ट्रीटमेंट और हेल्दी लाइफस्टाइल के साथ सीड साइक्लिंग को अपनाने से PCOS से जुड़ा हॉर्मोनल बैलेंस और फर्टिलिटी आउटकम बेहतर हो सकता है। हालांकि शोधकर्ता यह साफ कहते हैं कि इसे इलाज के विकल्प नहीं, बल्कि सपोर्टिंग अप्रोच के तौर पर देखना चाहिए।

सवाल- बीजों को डेली मील में कैसे शामिल कर सकते हैं?

जवाब- इन्हें दलिया, दही या योगर्ट में मिलाया जा सकता है। स्मूदी, शेक या लस्सी में ब्लेंड किया जा सकता है। सलाद, सब्जी या पके हुए खाने पर छिड़का जा सकता है। सूप, स्टू या करी में मिलाकर खाया जा सकता है। घर पर बने ग्रेनोला बार या एनर्जी बाइट्स में भी इन्हें शामिल किया जा सकता है।

सवाल- किन लोगों को सीड साइक्लिंग से परहेज करना चाहिए?

जवाब- इन लोगों को सीड साइक्लिंग शुरू करने से पहले सतर्क रहना चाहिए–

सबसे जरूरी बात अगर किसी को हॉर्मोनल बीमारी, थायरॉइड, PCOS है या कोई दवा चल रही है, तो सीड साइक्लिंग को इलाज का विकल्प नहीं समझना चाहिए। इसे सिर्फ सपोर्टिंग न्यूट्रिशन की तरह ही अपनाएं।

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