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एक सकारात्मक तथ्य सुनें : दुनिया अब पहले की तुलना में शराब का कम सेवन कर रही है। शराब उन चीजों में मानी जाती है, जिस पर अगर कड़ी पाबंदियां, नियंत्रण और टैक्स न लगाए जाएं, तो मनुष्य उस पर टूट पड़ेंगे। और इसके बावजूद वैश्विक रुझान स्पष्ट हैं कि बिक्री घट रही है। लोग अब पीना नहीं चाहते। अमेरिका में गैलप सर्वेक्षण से पता चला कि 2025 में 54% अमेरिकी ही किसी रूप में शराब का सेवन कर रहे थे- यह 90 वर्षों का न्यूनतम स्तर है। कुछ श्रेणियां विशेष रूप से प्रभावित हुई हैं। जैसे वाइन की खपत में उल्लेखनीय गिरावट है- लगभग 20% या उससे अधिक। यहां तक कि बीयर-प्रेमी यूरोप में भी मार्केट-रिसर्च से पता चला कि 71% उपभोक्ता अब या तो कम पी रहे हैं या पूरी तरह शराब छोड़ रहे हैं। इस ग्लोबल ट्रेंड में भारत जरूर अपवाद लग सकता है, जहां शराब-बिक्री की मात्रा लगभग 7% वार्षिक दर से बढ़ रही है। लेकिन अमेरिका और यूरोप में आज भी जहां प्रति व्यक्ति वार्षिक शराब खपत लगभग 8-9 लीटर के आसपास है, वहीं भारत में यह लगभग 3 लीटर प्रतिवर्ष ही है। संभव है कि भविष्य में भारत में भी शराब की बिक्री किसी स्तर पर पहुंचकर स्थिर हो जाए और फिर गिरावट देखने को मिले। भारत के कुछ शहरी वर्गों में परिवर्तन के शुरुआती संकेत भी दिख रहे हैं। महानगरों में ऐसे समूह उभर रहे हैं, जहां जेन-जी उपभोक्ताओं के बीच बीयर और पारंपरिक शराब की खपत स्थिर हो रही है या घट रही है। लेकिन बुनियादी सवाल यह है कि दुनिया अब पहले की तुलना में कम क्यों पी रही है? एक कारण तो यह है कि आज लोग पहले की तुलना में स्वास्थ्य को लेकर अधिक सचेत हैं। कम सिगरेट, अधिक योग, अधिक ग्रीन जूस और कम शराब- यह हेल्थ का मूलमंत्र बनता जा रहा है। प्रमुख स्वास्थ्य मंचों पर प्रकाशित लेख भी इस ट्रेंड को रेखांकित करते हैं कि लोग अब ‘हैंगओवर’ की तुलना में ‘वेलनेस’ को प्राथमिकता दे रहे हैं। दूसरे, अब सामाजिक निगरानी भी खासी बढ़ गई है। आज हर जेब में एक वीडियो कैमरा है, जो किसी भी क्षण आपका वीडियो बनाकर शेयर कर सकता है। कोई व्यक्ति अगली सुबह सोशल मीडिया पर यह बता सकता है कि आप पिछली रात पब में क्या कर रहे थे। लड़ाई-फसाद, बेसुरे गाने से लेकर उलटियां करने और बेहोश होने तक- शराब से जुड़े ये तमाम दृश्य यदि सार्वजनिक हो जाएं, तो गहरी सामाजिक शर्म का कारण बन सकते हैं। नौकरी जा सकती है, सामाजिक बहिष्कार झेलना पड़ सकता है। हालिया अध्ययनों ने यह भी स्पष्ट कर दिया है कि शराब हर हाल में नुकसानदेह है- यहां तक कि सीमित मात्रा में लिए जाने पर भी। प्रमुख स्वास्थ्य एजेंसियों ने चेतावनी दी है कि पीने का कोई भी स्तर वास्तव में सुरक्षित नहीं माना जा सकता। इस प्रकार स्वास्थ्य, मनोविज्ञान, सुविधा के मिले-जुले असर से ड्रिंकिंग-कल्चर में बदलाव आ रहे हैं। इस बदलाव का समाज पर यह सकारात्मक असर पड़ेगा कि बीमारियों और दुर्घटनाओं में कमी आएगी और गैर-मादक पेयों तथा ‘सोबर-इवेंट्स’ जैसे स्वस्थ विकल्पों का उभार होगा। ये बात और है कि अब ऐसी जगहें कम होती जा रही हैं, जहां लोग अपने घर और दफ्तर के बाहर ‘ऑफलाइन’ मिलते थे और ड्रिंकिंग इसका एक बहाना हुआ करता था। यानी इसका असर ‘सोशलाइजेशन’ पर पड़ेगा। सरकारों की कमाई भी घटेगी। ऐसे बार और रेस्तरां पर भी इसकी मार पड़ेगी, जिनके लिए शराब की बिक्री राजस्व का महत्वपूर्ण स्रोत है। वैसे आज का सबसे बड़ा एडिक्शन शराब का नहीं, स्क्रीन और सोशल मीडिया से मिलने वाले डोपामिन-हिट्स का है। मनोवैज्ञानिक फोन के अत्यधिक उपयोग की तुलना शराब जैसे व्यसन से करते हैं। बहरहाल, अगर आप शराब नहीं पीते हैं तो आपको किसी के दबाव में आने की जरूरत नहीं है। जीवन शराब के बिना भी सामाजिक और जीवंत हो सकता है। अगर पीते हैं तो इसे कम करने पर विचार करें। आपका लिवर इसके लिए आपको थैंक्यू कहेगा, आपकी जेब पहले की तुलना में आपका ज्यादा साथ देगी और लॉन्ग-टर्म में आप पहले से बेहतर महसूस करेंगे। साथ ही यह भी याद रखें कि शराब की जगह किसी और लत को अपने जीवन में न आने दें। फोन, अनवरत स्क्रॉलिंग, ‘लाइक्स’ का जुनून यदि नियंत्रित न हो, तो ये भी उतने ही हानिकारक हो सकते हैं। सामाजिक जीवन, सार्थक संबंध, साझा मुस्कराहटें- यही वो चीजें हैं जिनके लिए जीना सार्थक है। तो आइए, शराब के बजाय जीवन का अधिक स्वाद लें। चीयर्स! आज लोग पहले की तुलना में स्वास्थ्य को लेकर अधिक सचेत हैं। कम सिगरेट, अधिक योग, अधिक ग्रीन जूस और कम शराब- यह हेल्थ का मूलमंत्र बनता जा रहा है। लोग अब ‘हैंगओवर’ की तुलना में ‘वेलनेस’ को प्राथमिकता दे रहे हैं।
(ये लेखक के अपने विचार हैं)
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