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आज की भागदौड़ भरी जिंदगी में जहां हर सेवा की कीमत तय होती है। वहीं, एक ऐसा बैंक भी है जहां न रुपये जमा होते हैं, न डॉलर, यहां जमा होता है केवल समय।
इस अनोखी पहल का नाम है टाइम बैंक ऑफ इंडिया, जिसका उद्देश्य समाज में एक-दूसरे की मदद की संस्कृति को बढ़ावा देना है। देशभर में इस बैंक के 9,278 खाताधारक हैं और यह 420 शहरों में सक्रिय है।
ट्राइसिटी क्षेत्र में लगभग 450 सदस्य इस बैंक से जुड़े हैं, जिनमें से करीब ढाई सौ सदस्य चंडीगढ़ में हैं। ट्राइसिटी में अब तक लगभग 200 घंटे का समय बैंक में जमा किया जा चुका है। शहर के सबसे समय-समृद्ध सदस्य एचबीएस पुनिया हैं। उनके खाते में 60 घंटे जमा हैं। वे बैंक के सेवानिवृत्त अधिकारी हैं।
टाइम बैंक ऑफ इंडिया की गवर्निंग बॉडी के सदस्य आईडी सिंह बताते हैं कि 18 वर्ष से अधिक आयु का कोई भी महिला या पुरुष इसका सदस्य बन सकता है। इसमें कोई सदस्यता शुल्क नहीं लिया जाता और पूरा सिस्टम ऑनलाइन संचालित होता है। सबसे खास बात यह है कि इसमें पैसों का कोई लेन-देन नहीं होता।
कैसे काम करता है टाइम बैंक
इस बैंक की कार्यप्रणाली बेहद सरल है। यदि कोई सदस्य किसी जरूरतमंद व्यक्ति की मदद करता है-जैसे अस्पताल ले जाना, साथ समय बिताना, दवा लाना या किसी बुजुर्ग को मंदिर या अन्य स्थान पर ले जाना तो उस सेवा के बदले उसे घंटों के रूप में टाइम क्रेडिट मिलता है। भविष्य में जब उसे स्वयं सहायता की जरूरत होती है तो वह अपने जमा समय का उपयोग कर सकता है। सदस्य बनने के बाद प्रत्येक व्यक्ति का सत्यापन किया जाता है ताकि सुरक्षा और विश्वास बना रहे।
अकेले रह रहे लोगों के लिए सहारा
आईडी सिंह के अनुसार इस पहल का मुख्य उद्देश्य उन लोगों तक पहुंचना है जो अकेले रहते हैं, जिनके बच्चे विदेश या दूसरे शहरों में हैं या जिन्हें सामाजिक और भावनात्मक सहारे की जरूरत है। टाइम बैंक ऐसे लोगों को परिवार जैसा वातावरण देने का प्रयास करता है जिससे वे अकेलापन महसूस न करें।
स्विट्जरलैंड से प्रेरणा, जयपुर से शुरुआत, चंडीगढ़ तक विस्तार
चंडीगढ़ शाखा के सोशल मीडिया इंचार्ज और व्यवसायी अरुणेश अग्रवाल बताते हैं कि उन्हें टाइम बैंक की अवधारणा का पता स्विट्जरलैंड में चला। भारत लौटने पर जब उन्होंने इस मॉडल पर काम शुरू किया तो जानकारी मिली कि जयपुर में इसकी शुरुआत हो चुकी है। जयपुर से संपर्क कर चंडीगढ़ में भी यह पहल शुरू की गई।
एक घटना जिसने सोच बदल दी
अरुणेश अग्रवाल एक अनुभव साझा करते हुए बताते हैं कि एक परिचित को अचानक डॉक्टर को दिखाने की जरूरत पड़ी। वे उस समय अंबाला जा रहे थे और रास्ते में करीब 20 लोगों को फोन किया लेकिन कोई मदद के लिए नहीं आया। आखिर में उन्हें अपना काम छोड़कर वापस चंडीगढ़ आना पड़ा और मरीज को पीजीआई ले जाना पड़ा, जहां स्टेंट डालकर इलाज किया गया। मरीज के स्वस्थ होने के बाद परिवार ने आभार स्वरूप पांच लाख रुपये का चेक देना चाहा, लेकिन उन्होंने लेने से इनकार कर दिया। उन्होंने कहा, ‘यह पैसे का नहीं, इंसानियत का सवाल था। उसी समय टाइम बैंक की अवधारणा याद आई और इसे आगे बढ़ाने का निर्णय लिया।’
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चंडीगढ़ का टाइम बैंक: जहां रुपये नहीं, समय होता है जमा; जरूरतमंदों की मदद के बदले मिलता है टाइम क्रेडिट


