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फरीदाबाद: फरीदाबाद की होली इस बार सिर्फ रंगों की नहीं सोच की भी हो रही है. जब लोग एक-दूसरे को गुलाल लगाएंगे उसमें पर्यावरण बचाने का मैसेज भी होगा. आमतौर पर मंदिरों में चढ़े फूल, कुछ घंटों में ही कूड़े में या नालियों-नदियों में फेंक दिए जाते हैं. इस बार उन्हीं फूलों से शहर में प्राकृतिक गुलाल तैयार किया गया है. ये आइडिया सिर्फ नया नहीं है बल्कि अब मिसाल भी बन रहा है.
कैसे काम करता है फाउंडेशन
विक्टोरा मैनेजिंग डायरेक्टर और विक्टोरा लाइफ फाउंडेशन के अध्यक्ष एस.एस. बांगा ने ये पहल शुरू की. Local18 से बात करते हुए उन्होंने बताया महाशिवरात्रि से ही उन्होंने शहर के मंदिरों से फूल इकट्ठा करना शुरू कर दिया था. उनका कहना है मंदिरों, गुरुद्वारों, शादियों, बैंक्विट हॉल से हर दिन ढेर सारे फूल निकलते हैं जिन्हें बाद में कूड़े या नालियों में डाल दिया जाता है. इससे सीवरेज जाम होता है नदियां भी गंदी होती हैं.
बातचीत के दौरान ये भी सामने आया कि 100 किलो फूलों से उतनी ही कार्बन निकलती है जितनी 800 किलोमीटर गाड़ी चलाने से निकलती है. उस कार्बन को सोखने के लिए साल भर में कम से कम 8 पेड़ चाहिए.
कहां से आया आइडिया
एस.एस. बांगा पहले से ही बड़े स्तर पर पेड़ लगवाते आ रहे हैं. फरीदाबाद के सेक्टर 58, सेक्टर 25, गुजरात, पुणे, महाराष्ट्र, ग्रेटर नोएडा जैसे इलाकों में हर साल हजारों पेड़ लगते हैं, लेकिन उनका मानना है सिर्फ पेड़ लगाना काफी नहीं है. जो चीजें कार्बन बढ़ा रही हैं उन पर भी काम जरूरी है. इसी सोच से फूलों को रीसायकल करने का आइडिया आया.
क्या है पूरा प्रोसेस
फूल इकट्ठा करने के लिए मंदिरों में ड्रम रखवाए गए. एक गाड़ी रोज मंदिरों से फूल लेने जाती है ड्राइवर के साथ दो लोग और होते हैं. करीब 10 लोग इस काम में लगे हैं, ज्यादातर महिलाएं हैं. आगे और लोगों को जोड़ने का प्लान है, ताकि रोजगार भी बढ़े.
फूल सीधे प्रोसेस नहीं होते. पहले अच्छे से छांटे जाते हैं गुलाब, गेंदा और बाकी फूल अलग रखे जाते हैं. धागे, पूजा सामग्री, दीये सब अलग. उसके बाद फूल धोकर सुखाए जाते हैं. कुछ फूलों का जूस भी निकाला जाता है जो बाद में रंग बनाने में काम आता है. जब सूखे फूल पीसते हैं तो उनकी अपनी खुशबू रहती है यही खुशबू गुलाल को खास बना देती है.
फूलों के वेस्ट से बनती है अगरबत्ती
जो गूदा बचता है उससे अगरबत्ती बनती है. एस.एस. बांगा बताते हैं बाजार की अगरबत्तियों में कई बार ऐसे केमिकल मिलते हैं जो ज्यादा धुआं और कार्बन बढ़ाते हैं. फूलों से बनी अगरबत्ती में धुआं कम है खुशबू ज्यादा नेचुरल है.
समाज का साथ देना जरूरी
इस प्रोजेक्ट में Manav Rachna University और फरीदाबाद नगर निगम भी साथ हैं. एस.एस. बांगा मानते हैं कोई भी अच्छी पहल तभी टिकती है जब समाज साथ दे. प्लान ये भी है कि जहां सबसे ज्यादा फूल इकट्ठा होते हैं वहां छोटे-छोटे प्रोसेसिंग यूनिट शुरू करें, ताकि फूल वहीं रीसायकल हो सकें और शहर में कूड़ा कम हो.
नगर निगम फरीदाबाद के कमिश्नर धीरेंद्र खड़गटा ने भी इस पहल की तारीफ की. उनका कहना है अगर ये फूल गुलाल में नहीं बदलते तो कूड़ा बनकर पर्यावरण खराब करते. अब वही फूल होली के रंग बनकर लोगों तक पहुंचेंगे और साथ में पर्यावरण बचाने का संदेश भी देंगे.
फूलों से बना ये गुलाल त्योहार को बनाता है खूबसूरत
होली वैसे भी बसंत में आती है जब चारों ओर फूल ही फूल होते हैं. ऐसे में फूलों से बना ये गुलाल त्योहार को और खूबसूरत बना देता है. सबसे खास बात ये इन रंगों में कोई केमिकल नहीं मिलाया गया है, इसलिए त्वचा के लिए भी ये सेफ हैं.
सोच बदलो तो कूड़ा भी काम का बन जाता है
इस बार फरीदाबाद में जब लोग एक-दूसरे को रंग लगाएंगे, तो उनके हाथ में सिर्फ गुलाल नहीं बल्कि एक जिम्मेदारी भी होगी प्रकृति को बचाने की. ये पहल दिखाती है सोच बदलो तो कूड़ा भी काम का बन जाता है. होली के रंग इस बार सिर्फ चेहरे नहीं सोच भी रंगेंगे.
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