एन. रघुरामन का कॉलम: हम बाहर की दुनिया को भी क्लासरूम में ला सकते हैं Politics & News

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पिछले बीस वर्षों से वह चौचिल्ला में एक ही जगह पर रह रहा था। उसने एक घंटे के लिए भी उस छोटी-सी जगह से बाहर कदम नहीं रखा। वह बाहर जा भी नहीं सकता, क्योंकि कोई उसे निकलने नहीं देगा। लेकिन पिछले दो हफ्तों से वह थाईलैंड से ऑस्ट्रेलिया तक यात्रा कर रहा है। इंटरव्यूज दे रहा है और कई बार रिजेक्ट होने के बाद उसे शानदार जॉब ऑफर भी मिले हैं। जब वह पहली बार रिजेक्ट हुआ तो उसने गलतियां देखीं, उन्हें सुधारा और अगले इंटरव्यू में फिर नई गलतियां कीं, लेकिन अंततः जॉब ऑफर मिल ही गया। पर वह ऑफर लेटर स्वीकार नहीं कर सकता। जानते हैं क्यों? क्योंकि वह अब भी उस जगह से बाहर नहीं निकला है, जहां बीते दो दशकों से रह रहा है। ‘क्या बकवास है’- क्या आपने ऐसा कहा? आप सोच रहे हैं कि बिना बाहर जाए और इंटरव्यू दिए उसे जॉब ऑफर कैसे मिला? क्या आपको लग रहा है कि मैं आपके साथ प्रैंक कर रहा हूं कि वह बैंकॉक और ऑस्ट्रेलिया गया था? नहीं, कतई नहीं। आपने ऊपर जो भी पढ़ा, सब सच है। कैलिफोर्निया की सेंट्रल वैली के चौचिल्ला कस्बे में स्थित वैली स्टेट प्रिजन में आपका स्वागत है। जिसके बारे में ऊपर बताया, सिर्फ वही व्यक्ति नहीं- बल्कि यहां कई कैदियों को ऐसे हेडसेट पहनाए गए, जो अपारदर्शी गॉगल्स (वीआर हेडसेट) जैसे हैं। जैसे ही हाई डेफिनिशन वीडियो शुरू हुए, उनकी गर्दन धीरे-से मुड़ी और चेहरे पर मुस्कान आ गई। उनकी यात्रा शुरू हो चुकी थी। कोई दुनिया के दूसरे हिस्सों को देखता है। कोई वो जगह देखता है, जहां से वह आया और बीते बीस साल में वह कैसे बदल चुकी है। जबकि किसी ने व्यावहारिक अनुभव लिए, जैसे जॉब इंटरव्यू। कैदी वर्चुअल डेस्क पर वर्चुअल इंटरव्यूअर्स के सामने बैठे। इंटरव्यूअर्स का रवैया कभी सहज तो कभी सख्त होता है और वे कैदियों को रिहा होने के बाद रोजगार ढूंढने के हुनर सिखाते हैं। उनके लिए बाहर की दुनिया पूरी तरह बदल चुकी है- आवेदन से लेकर इंटरव्यू तक। उनके लिए यह बेहद कठिन था कि किसी के सामने बैठकर उसे मनाएं कि क्यों वह इस नौकरी के लिए बेहतर है। गॉगल्स हटाने के बाद वॉलंटियर्स कैदियों को उन भावनाओं और ट्रॉमा से उबरने में सहायता करते हैं, जो इस अनुभव के दौरान बाहर आ गए। वे जल्द रिहा होने वाले नहीं हैं। कुछ कैदी 2030 में, तो कुछ शायद 2040 के बाद रिहा होंगे। लेकिन तब उन्हें यह मलाल नहीं होगा कि ‘तकनीक में वे पिछड़ गए।’ कई दशकों से कैद कुछ लोगों को तो यह तक पता नहीं कि एटीएम कैसे काम करता है। दुनिया में कितनी नई चीजें जुड़ चुकीं और मशीनों के इस्तेमाल से दुनिया को कितनी सहूलियत मिली हैं। यह ऐसा प्रोग्राम है, जो बाहर की दुनिया को भीतर लाता है। ऐसी तकनीक कैदियों के पुनर्वास और खासकर उस समाज से वापस जुड़ने में अहम भूमिका निभाती है, जो अब बहुत बदल चुका है। जिन लोगों ने लंबे समय से असल दुनिया नहीं देखी, वो न सिटी बस पकड़ना जानते हैं, न मेट्रो- क्योंकि ये उनकी गैरमौजूदगी में शुरू हुईं। इस तकनीक से उन्हें साइकोलॉजिकल एडवांटेज मिलता है और तनाव कम होता है। अगर वीआर हेडसेट्स कैदियों को जेल से बाहर की जिंदगी दिखा सकते हैं, उनका ट्रॉमा घटा सकते हैं, भावनाएं संतुलित कर सकते हैं और असली दुनिया में सुरक्षित री-एंट्री के लिए तैयार कर सकते हैं, तो हमारे बुंदेलखंड के छात्र को बोस्टन ले जाकर हार्वर्ड के छात्रों के साथ क्यों नहीं पढ़ा सकते- भले ही यह वर्चुअली हो। इससे अनजान दुनिया में उनकी एंट्री आसान होगी। बच्चे वर्चुअल इंटरव्यू दे सकते हैं और विश्वविद्यालय के काउंसलर की मदद से गलतियां सुधार सकते हैं- ताकि कठिन इंटरव्यू में सफलता के लिए खुद को तैयार कर सकें। वे पसंद का शहर चुन सकते हैं। वहां की लोकल बस से लेकर किराना दुकानों और किराए के मकानों तक सब जान सकते हैं। ताकि जब वे वहां जाएं तो उनके लिए सब कुछ आसान हो। फंडा यह है कि वीआर हेडसेट जैसी तकनीक का सही इस्तेमाल जाहिर तौर पर हमारे बच्चों के ग्लोबल पर्सेप्शन को बदल सकता है।

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एन. रघुरामन का कॉलम: हम बाहर की दुनिया को भी क्लासरूम में ला सकते हैं