एन. रघुरामन का कॉलम: सहानुभूति विकसित करना स्कूल में बेहतर रैंक लाने से ज्यादा जरूरी है Politics & News

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  • N. Raghuraman’s Column Developing Empathy Is More Important Than Getting Better Grades In School.

16 मिनट पहले

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एन. रघुरामन, मैनेजमेंट गुरु

हाल ही में जब मेरी एक रिश्तेदार अस्पताल में भर्ती थीं तो बेंगलुरु से आईं उनकी एक दोस्त ने रात को अस्पताल में रुकने की पेशकश की। वो मेरी परिजन की क्लासमेट थीं। असल में वह अपने पति की रिश्तेदारी में एक शादी की तैयारी के लिए आई थीं। रिश्तेदार के घर के बजाय उन्होंने अस्पताल में सोने का फैसला किया, ताकि मुझे थोड़ा आराम मिल सके। जब मैंने इस दयालु व्यवहार के बारे में अपने साइकोलॉजी प्रोफेसर से बात की तो उन्होंने मुझसे पूछा- ‘क्या तुम्हारा स्कूल का वॉट्सएप ग्रुप है?’

मैंने कहा, ‘हां।’ ‘क्या उसमें लड़के-लड़कियां दोनों हैं?’ मैंने फिर ‘हां’ कहा। उन्होंने पूछा ‘क्या तुम उस ग्रुप की किसी लड़की को कॉल करके पूछोगे कि क्या उनका अलग लड़कियों का ग्रुप है?’ मैंने कहा कि ‘कॉल की जरूरत नहीं, मुझे पता है उनका ग्रुप भी है- जहां वे मिलकर आपसी समस्याएं सुलझाती हैं।

उन्होंने मुस्कुरा कर कहा ‘शायद इसी वजह से तुम्हारी उम्र की लड़कियां लड़कों से ज्यादा सहानुभूतिशील होती हैं।’ मैं सहमत हो गया। यदि लड़कियों में किसी क्लासमेट के घर का कोई बुजुर्ग बीमार या चोटिल हो जाए तो वे शॉर्ट नोटिस पर भी तत्काल आपस में मिल लेती हैं। समान परिस्थिति में लड़कों के साथ ऐसा नहीं होता। सहानुभूति ऐसी योग्यता है, जिसमें दूसरों की भावनाएं महसूस करके, समझ के, संवेदनशीलता के साथ प्रतिक्रिया दी जाती है।

बच्चे कैसे दोस्त बनाते हैं, मतभेदों से निपटते हैं और खुद को दूसरों के संदर्भ में कैसे देखते हैं– इस सबके केंद्र में सहानुभूति ही होती है। ये न सिर्फ क्लासरूम क्लाइमेट बनाती है, बल्कि उनका पारिवारिक-कामकाजी जीवन भी गढ़ती है। बढ़ती मानसिक स्वास्थ्य समस्याओं के चलते कई देशों की शिक्षा नीतियों में एकेडमिक्स के साथ सहानुभूति जैसी सोशल-इमोशनल लर्निंग के महत्व पर भी विचार किया जा रहा है।

भावनात्मक समझ, दूसरों को और उनके दृष्टिकोण को समझना, एकजुट होकर समस्या सुलझाना– यह अब गणित पढ़ने जैसा जरूरी हो रहा है। दुर्भाग्य से, घरों में सहानुभूति को सिखाई जा सकने वाली स्किल के बजाय एक उम्मीद की तरह देखा जाता है। हम बच्चों से कहते हैं, दूसरों के और बेघर पशुओं के प्रति दयालु बनो, पर वही बच्चे कभी हमसे असहमत होते हैं तो हम उनकी बात नहीं सुनते।

मेरे साइकोलॉजी प्रोफेसर ने कहा कि ‘अगर आप बच्चे में सहानुभूति बढ़ाना चाहते हैं तो पहले उसे महसूस कराइए कि उसकी बात सुनी जाती है।’ यहां विशेषज्ञों के कुछ सुझाव पेश हैं।

1. सहानुभूति एक्टिव लिसनिंग से शुरू होती है। जब बच्चों से कहते हैं, ‘तुम्हारी बात में पॉइंट है, मुझे सोचने दो’ तो उन्हें लगता है कि बिना जजमेंट के उनकी बात सुनी गई। फिर कहते हैं, ‘ये वाकई निराशाजनक लगता है, सच में तुम अलग-थलग महसूस कर रहे होगे।’ तो बच्चों को लगता है, आप सुन रहे हैं। पैरेंट्स को ध्यान रखना चाहिए कि सुनने का मतलब हर बार सहमत होना नहीं, बल्कि स्वीकार करना है। इसी से सहानुभूति बढ़ती है।

2. भावनाओं को नाम दें। सोचो कि जब 14 महीने के बच्चे को पिता खिलौना दिलाने से इनकार करते हैं तो उसकी भावनाएं फूट पड़ती हैं। बच्चे भाषा सीखने से बहुत पहले भावनाएं महसूस करने लगते हैं और ये व्यवहार के रूप में सामने आती हैं। अब उसी बच्चे से पूछें कि ‘क्या तुम्हें बुरा लगा?’ बच्चा ‘बुरा’ का मतलब जाने बिना भी सिर हिला देगा। कुछ दिनों के बाद असहमति पर वह बच्चा बैड वर्ड भी बोलना सीख जाएगा। यह इसलिए अहम है, क्योंकि सहानुभूति भावना की पहचान से आती है। जो बच्चे खुद की भावनाओं को नाम दे पाते हैं, वही दूसरों की भावना पहचानने में भी बेहतर होते हैं। सहानुभूति भाषणों से नहीं बढ़ती। यह सुने जाने, समझे जाने और गाइड किए जाने के बारम्बार अनुभवों से बढ़ती है। बड़ों को असल जीवन या परदे पर देखकर बच्चे सहानुभूति सीखते हैं।

फंडा यह है कि सहानुभूति वो योग्यता है, जिसे अतिरिक्त गुण की तरह नहीं, बल्कि बुनियादी जीवन कौशल की तरह देखना होगा। बच्चों को इसे जानबूझकर सिखाना होगा, सतत उदाहरणों से समझाना होगा और रोजमर्रा की आदत में डालना होगा- महज घर ही नहीं, स्कूलों में भी।

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