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- N Raghuraman Column Leaders, Parents, And Teachers All Learn From A Tailor To Succeed!
1 घंटे पहले
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एन. रघुरामन, मैनेजमेंट गुरु
वसंत पंचमी के दिन- जब मैं अपने टेलर के पास जाने ही वाला था- मेरी पत्नी नाराज हो गईं। वे बोलीं, मुझे समझ नहीं आता तुम एक ही शर्ट सिलवाने के लिए बार-बार टेलर के पास क्यों जाते हो? कम से कम एक साथ कुछ जोड़ कपड़े तो सिलवा लिया करो, ताकि ये बार-बार के चक्कर न लगाने पड़ें। मेरे पास इसका कोई ठोस जवाब नहीं था। लेकिन गाड़ी चलाते हुए मैं सोच रहा था कि आखिर टेलर के पास जाना मुझे इतना अच्छा क्यों लगता है?
जब मैं दुकान पर पहुंचा तो दुकान मालिक ने मेरा अभिवादन किया और मेरे परिवार के बारे में पूछा। उन्हें उत्तर देने के बाद मैंने एक सफेद शर्ट सिलने के लिए कपड़ा दिया। जब दुकान मालिक इंच-टेप निकाल रहे थे, तभी उनके सहायक ने बड़ी फुर्ती से कहा, सर का नाप पिछले महीने ही लिया गया था तो क्या फिर से नाप लेना है? मालिक ने सिर हिलाकर हां कहा। इसके बाद सहायक के पास बिल-बुक निकालकर और कलम लेकर निर्देश लिखने के अलावा कोई विकल्प नहीं बचा था। मुझे लगा कि अब मेरे पास घर लौटकर पत्नी को देने के लिए एक ठीक-ठाक जवाब है।
लेकिन इससे पहले कि मैं आपको बताऊं मैंने घर पहुंचकर पत्नी से क्या कहा, यह बताना जरूरी है कि टेलर के पास जाने से पहले हैदराबाद की प्रभा एकम्बरम ने ट्रेनर और मेंटर के एक वॉट्सएप समूह में- जिसका मैं भी हिस्सा हूं- यह साझा किया था कि इस शुभ दिन पर उन्होंने महाराष्ट्र के एक आर्थिक रूप से कमजोर मेडिकल छात्र को गोल्ड हार्ट फाउंडेशन से छात्रवृत्ति दिलाने में मदद की और एक इंजीनियरिंग छात्र को बहुत अच्छा प्लेसमेंट भी दिलवाया।
जाहिर है कि नॉलेज और सपनों को वास्तविक परिणामों में बदलना ही जीवन में उनका उद्देश्य है।लौटते समय मेरी प्रभा से बात होने लगी कि वह ऐसे कामों को कैसे करती हैं। उन्होंने मुझे बड़े सलीके से समझाया कि वह नौकरी तलाशने वालों और नौकरी देने वालों के बीच बहुत बारीकी से कड़ियां जोड़ती हैं। एक मेंटर के रूप में वह उन्हें करियर के लिए तैयार भी करती हैं। उस बातचीत ने मुझे एक न्यूज की याद दिलाई, जिसमें बताया गया था कि अमेरिका जैसे सबसे विकसित देशों में भी बिजनेस स्कूल अपने पास-आउट छात्रों को नौकरी दिलाने के लिए संघर्ष कर रहे हैं।
उस खबर में बताया गया था कि 2025-2026 के दौरान हार्वर्ड और कोलंबिया जैसी प्रतिष्ठित विश्वविद्यालयों से होने वाली भर्तियां कोविड से पहले के स्तर से नीचे ही बनी हुई हैं। यह इस तथ्य के बावजूद है कि इन संस्थानों ने संभावित नियोक्ताओं से मिले सुझावों के आधार पर करियर-रेडीनेस पर जोर देने वाला नया पाठ्यक्रम शुरू किया है। इस कारण मेरा मन प्रभा जैसे लोगों के प्रयासों और उन संस्थानों के बीच तुलना करने लगा, जो अपने छात्रों को अच्छे अवसर दिलाने के लिए जूझ रहे हैं। और तब जाकर मुझे उस टेलर के काम का अर्थ साफ-साफ समझ में आया।
हर लीडर, पैरेंट, शिक्षक, कोच और मेंटर अगली पीढ़ी को सफल होते देखना चाहते हैं। लेकिन सफलता इस पर निर्भर करती है कि वे इस पीढ़ी को उस टेलर के नजरिये से कैसे देखते हैं। हर बार जब आप किसी टेलर से मिलते हैं तो वह आपको एक नई नजर से देखता है और इसीलिए वह हर बार आपकी नई नाप लेता है। नाप लेते समय वह बाजार में आ रहे नए फैशन के बारे में भी विस्तार से बात करता है।
वह आपकी सहमति या हामी का इंतजार नहीं करता, बस बताता चला जाता है कि बाजार में या इस बार की सर्दियों के लिए क्या नया चल रहा है। अब अपने आसपास की दुनिया को देखिए। दुनिया हमें अकसर पुरानी नजर या पुराने चश्मे से ही देखती है। वह हमें नए नजरिये से नहीं देखती। अगर कोई क्रिकेटर एक मैच में शतक लगा दे तो दुनिया उससे हर मैच में शतक की उम्मीद करने लगती है। और अगर हम में से कोई किसी क्षेत्र में असफल रहा हो तो दुर्भाग्य से जीवन भर उसी असफलता के आधार पर हमारा मूल्यांकन होता रहता है।
फंडा यह है कि हमें हर व्यक्ति और हर स्थिति से अपनी हर भेंट में उन्हें नए चश्मे या नई नजर से देखने के लिए किसी टेलर का नजरिया अपनाना होगा। क्योंकि जब भी हम उनको नई नजर से देखते हैं, एक नई अच्छाई दिखती है। धारणा, धैर्य की दुश्मन है।
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एन. रघुरामन का कॉलम: सफल होने के लिए लीडर, पैरेंट्स और शिक्षक- सभी एक टेलर से भी सीखें!


