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राजस्थान के उदयपुर से 50 किमी दूर झाडोल और वहां से 7 किमी दूर चांगला गांव के निवासी पुष्कर का परिवार आर्थिक रूप से कमजोर है। कई ग्रामीण बच्चों की तरह उसकी भी पढ़ाई में रुचि नहीं थी। परिवार भी उसे रोजमर्रा के कामों में नहीं लगाता था और वह दिशाहीन जीवन जी रहा था। 14 साल की उम्र में वह घर छोड़कर सड़क किनारे एक ढाबे में काम करने लगा। उस शुरुआती अनुभव ने शायद उसके मन में खुद का कैफे या ईटिंग आउटलेट खोलने का सपना जगाया। दुर्भाग्य से उसने वहां मानसिक और शारीरिक उत्पीड़न सहे। वहां चार साल संघर्ष के बाद बालिग होने से पहले ही उसे अपना भविष्य अंधेरे में दिखने लगा। किसी तरह वह एक निजी कंपनी में मजदूर बन गया, लेकिन उसे महसूस हुआ कि ऐसे तो उसका सपना पूरा नहीं होगा। तभी उसकी मुलाकात मनीष जैन से हुई, जो झाडोल में ‘स्वराज फार्मवर्सिटी’ चलाते हैं। यह यूनिवर्सिटी उसके जैसे बच्चों को खेती की ओर लौटाने का काम करती है। पुष्कर ने फेलोशिप प्रोग्राम जॉइन किया और सस्टेनेबल फार्मिंग और हॉस्पिटेलिटी सीखी। दो महीने पहले मेंटर्स और साथियों के सहयोग से उसने फार्मवर्सिटी कैंपस में पहला ऑर्गेनिक फार्म-टु-प्लेट कैफे खोला, जिसे ‘ऑर्गेनिक कैफे’ कहते हैं। स्वाद और वाजिब दाम वाला यह कैफे स्थानीय लोगों और विजिटर्स को खूब लुभा रहा है। हाल ही में यहां एक रिटायरमेंट पार्टी के लिए 60 लोगों का ग्रुप लंच हुआ तो मुझे इस वेंचर का पता चला। वहां एक ट्री हाउस है और राजस्थान के ऐसे ग्रामीण व्यंजन भी मिलते हैं, जिन्हें बनाने में शहरी लोगों को कठिनाई होती है। इसीलिए वे यहां तक आते हैं। झाडोल से 4 किमी दूर खाखड़ गांव के निवासी हीरालाल वडेरा की कहानी भी ऐसी ही है। पांच साल से ज्यादा समय वह उदयपुर की एक मिठाई दुकान में मजदूर था। उसका जीवन भी पुष्कर जैसा ही था। स्वराज फार्मवर्सिटी में हीरा लाल ने फार्म मैनेजमेंट और ईको-टूरिज्म में रुचि दिखाई। यही क्षेत्र उसके पैशन और बेहतर भविष्य के सपने से मेल खाते थे। उसने अपने पिता को मना कर कुछ जमीन अपने नाम कराई और उस पर सफलतापूर्वक ऑर्गेनिक खेती शुरू कर दी। जब उसकी उपज सीधे खरीदी जाने लगी तो इससे न सिर्फ उसका आत्मविश्वास बढ़ा, बल्कि इसने ऑर्गेनिक खेती के प्रति रिश्तेदारों और पड़ोसियों को भी प्रेरित किया। हीरा लाल ने अपने मिट्टी के घर के एक कमरे को रूरल होम-स्टे में बदला और उसे एयर-बीएनबी को किराए पर दे दिया। हाल ही में मनीष जैन के एक जर्मन मित्र आए और उन्होंने इसे ‘विलेज हिल्टन’ नाम दिया। अपनी उपज और कहीं न बेचनी पड़े, इसलिए हीरालाल अब फूड प्रोसेसिंग एक्सप्लोर कर रहा है। उसने अचार बेचने के साथ इसके प्रयोग शुरू भी कर दिए हैं। ये उदाहरण 31 जनवरी, 2026 को बेंगलुरु इंटरनेशनल सेंटर में ‘एजुकेशन फॉर क्रिएटिविटी कॉन्फ्रेंस’ में शेयर किए गए। कार्यक्रम का फोकस परंपरागत पढ़ाई से आगे बढ़कर रचनात्मकता को एक अहम लाइफ स्किल के तौर पर विकसित करने पर था। ‘इंडियन क्रिएटिविटी कंसोर्टियम’ और ‘स्पार्कलिंग माइंड्स’ द्वारा आयोजित इस इवेंट में शिक्षकों और क्रिएटर्स के बीच वार्तालापों में बच्चों में रेजिलिएंस और अडाप्टेबिलिटी की जरूरत पर जोर दिया गया। विश्वविद्यालय स्तर पर ऐसा नवाचार उस दुनिया को शानदार समाधान देता है, जिसमें मौजूदा किसान बूढ़े हो रहे हैं और पारिवारिक कृषि व्यवसाय संकट में है। भारत ही नहीं, अमेरिका जैसे देशों में भी 2024 की तुलना में 2025 में 46% ज्यादा फार्म्स ने दिवालियापन के लिए आवेदन किया है। इसका मुख्य कारण है कि भावी पीढ़ी शहरों की ओर दौड़ रही है। दुनिया भर में छोटे खेतों का गायब होना आम हो रहा है। फंडा यह है कि ऐसे बदलते हालात में बेहतर होगा कि हम पैरेंट्स और टीचर्स जल्द समझ जाएं कि हमें भावी पीढ़ी को सिर्फ परीक्षाओं के लिए नहीं, बल्कि कल्पनाशीलता, साहस और करुणा के साथ जीवन का सामना करने के लिए भी तैयार करना होगा। यही भविष्य में एक खुशहाल दुनिया बनाएगा।
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एन. रघुरामन का कॉलम: शिक्षा बच्चों को हमेशा परीक्षा के लिए ही तैयार नहीं करती!

