एन. रघुरामन का कॉलम: वर्कप्लेस बदलने वाले हैं, आप भी खुद को बदल लीजिए Politics & News

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‘दिमाग का दही हो गया’- ये बात एक मिडिल लेवल मैनेजर खुद से बड़बड़ा रहा था, क्योंकि वहां उससे बोलने के लिए कोई था ही नहीं। उस बड़े से शॉप फ्लोर पर वह अकेला इंसान था। लेकिन अचानक पीछे से आवाज आई- ‘ये दही क्या होता है?’ उसे पता था कि कौन है। उसने पलटकर भी नहीं देखा और शांत स्वर में बोला- ‘तू कहां खाता है, तुझे नहीं मालूम।’ लेकिन आवाज अड़ी रही- ‘इसीलिए तो पूछ रहा हूं।’ वह आपा खो बैठा और बोला- ‘चुप बैठ, कुछ भी बोलता रहता है, तू और दिमाग का दही मत बना।’ अब आवाज थोड़ी सख्त हुई और कहने लगी- ‘अबे…।’ मैनेजर ने टोका- ‘नो बैड वर्ड्स।’ आवाज थोड़ी धीमी हुई और बोली- ‘मैंने सारी गालियां तुमसे ही तो सीखी हैं। अगर इन्क्वायरी हुई तो मैं तुम्हें एक्सपोज कर दूंगा।’ मैनेजर यह कहते हुए वहां से निकल लिया कि ‘हे भगवान, किन सब के साथ काम करना पड़ रहा है।’ 2035 या 2040 के शॉप फ्लोर में आपका स्वागत है। वहां या तो एक मिडिल लेवल मैनेजर या कोई भी नहीं होगा। चारों तरफ रोबोट ही प्रोडक्शन बेल्ट का काम कर रहे होंगे। तब आप यह नहीं कर पाएंगे कि किसी रोबोट से कहें- ‘ये ले, मेरी मां के हाथ का बना हुआ…’ और वो आपके नॉन-प्रोडक्टिव टाइम पर आंखें मूंद लेगा। वह बिल्कुल सटीक रिपोर्ट करेगा कि आपने टॉयलेट जाने, सिगरेट पीने, ‘दही’ जैसी बेकार की बातें करने में कितना समय गंवाया और शिफ्ट के अंत में आपका योगदान क्या रहा। या तो आपको वॉर्निंग नोट मिलेगा या रोबोट्स के साथ कम्युनिकेशन कोर्स के लिए क्लासरूम भेजा जाएगा। हां, कंपनियां अब किसी विशेष कार्यक्षेत्र में प्रशिक्षण का क्लासरूम बन जाएंगी। एआई वर्कप्लेस के लिए खतरा बनता जा रहा है। भरोसा नहीं तो यहां हाल ही का एक उदाहरण पेश है। अमेरिका के एक परिवार ने अस्पताल के एक भारी-भरकम बिल को चुनौती देने के लिए एआई चैटबॉट इस्तेमाल किया और करीब 1.6 करोड़ रुपए के बिल को घटाकर लगभग 27 लाख रुपए करा लिया। सोच रहे हैं कैसे? हार्ट अटैक से एक परिजन की मौत के बाद महज चार घंटे के इलाज के लिए 1.95 लाख डॉलर का बिल परिवार को थमा दिया गया था। लेकिन यह इंश्योरेंस में कवर नहीं था। एक परिजन ने एंथ्रोपिक के एआई चैटबॉट क्लॉड की मदद से आइटमाइज्ड बिल का विश्लेषण किया और एआई ने ‘डुप्लिकेट बिलिंग’ जैसी बड़ी गड़बड़ियां पकड़ लीं। अस्पताल ने एक ‘मास्टर प्रोसिजर’ का चार्ज लिया और फिर उसी के हर सब-प्रोसिजर का भी अलग-अलग बिल बनाया, जिसे ‘अनबंडलिंग’ कहते हैं। एआई यहीं नहीं रुका। उसने इन गड़बड़ियों का हवाला देते हुए एक बेहद मजबूत कानूनी विवाद पत्र भी बनवाया। इससे अस्पताल को अपना बिल 80% से ज्यादा घटाना पड़ा। एआई लूट-खसोट वाली कीमतों को भी पहचानने लगा है। अब 2020 से लेकर अपने वर्क एरिया के बारे में सोचिए। बीते पांच सालों में कामकाज की दुनिया में जबरदस्त बदलाव आए हैं। महामारी में रिमोट और हाइब्रिड वर्क का दौर शुरू हुआ। मानसिक स्वास्थ्य, निजी और कामकाजी जीवन के बीच घटते अंतर की जो बातें कभी ऑफिस में टैबू मानी जाती थीं, अब एम्प्लॉयर्स की प्राथमिकता बन चुकी हैं। लोग 60 की रिटायरमेंट उम्र के बाद भी काम कर रहे हैं। इसका मतलब है कि आज वर्कप्लेस में पांच पीढ़ियां साथ काम कर रही हैं, जिनकी काम और मैनेजमेंट की शैली अलग-अलग है। आने वाले दो दशक और भी अहम बदलाव लाएंगे। ये बदलाव सबसे ज्यादा एआई से प्रेरित होंगे। आने वाले वर्षों में मिडिल लेवल मैनेजर्स इतिहास बन जाएंगे। जब ज्यादातर काम एआई संभालेगा तो बहुत कम ही लोग होंगे, जो महत्वपूर्ण और क्रिएटिव फैसले लेने के लिए सुपर पावर बन पाएंगे। लेकिन उस स्तर तक पहुंचने के लिए जरूरी है कि आप पर्याप्त क्वालिफाइड हों। फंडा यह है कि भविष्य के लीडर्स इंसानों और इंटेलिजेंट सिस्टम्स के तालमेल को संभालेंगे। इमोशनल इंटेलिजेंस ही उन्हें दूसराें से अलग दिखाएगी। जो लोग तकनीकी समझ के साथ सहानुभूति को मिला लेंगे, वही भविष्य के कार्यस्थलों की दिशा तय करेंगे।

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एन. रघुरामन का कॉलम: वर्कप्लेस बदलने वाले हैं, आप भी खुद को बदल लीजिए