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एन. रघुरामन का कॉलम: मोजे अब नए जूते हैं- ‘सॉक शूज़!’ Politics & News

एन. रघुरामन का कॉलम:  मोजे अब नए जूते हैं- ‘सॉक शूज़!’ Politics & News

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9 घंटे पहले

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एन. रघुरामन, मैनेजमेंट गुरु

महामारी के बाद से आरामदायक फुटवियर की मांग बढ़ी है। लेकिन शादियों के हर सीजन में चार से बारह इंच की जरीवाली साड़ी पहनना भारत में हमेशा से फैशन का हिस्सा रहा है। इसके लिए महिलाएं अक्सर स्टिलेटोज़ (संकरी और नुकीली हील) पहनती हैं ताकि साड़ी का जरी वाला हिस्सा जमीन से न लगे।

हालांकि, स्टिलेटोज़ साड़ी की खूबसूरती बढ़ाते हैं, लेकिन शादी के विभिन्न कार्यक्रमों में इन्हें पहनकर चलना चुनौतीपूर्ण होता है। इससे पैरों में दर्द और असुविधा होती है। इसी बीच, मशहूर गायिका उषा उथुप ने अपने अनोखे कांजीवरम स्नीकर्स के साथ फैशन में नया ट्रेंड सेट किया है।

अपनी अनोखी आवाज और जीवंत व्यक्तित्व के लिए जानी जाने वाली उषा ने बिना स्टाइल से समझौता किए और कंफर्ट का ख्याल रखते हुए स्टिलेटोज़ से स्नीकर्स की ओर रुख किया। उनके लिए ये स्नीकर्स दो मोचियों ने उनकी अपनी कांजीवरम साड़ियों का उपयोग करके बनाई।

लगभग 30 वर्षों तक उन्होंने अपने शो के लिए स्टिलेटोज़ पहने। लेकिन ऊंची एड़ी के जूते पहनने की असुविधा ने उनके घुटनों पर असर डाला और उम्र बढ़ने के साथ उनके पैरों ने अनोखे और नवाचारी समाधान की मांग की। तब उनकी बेटी ने उन्हें फैशन के प्रति अपने दृष्टिकोण को बदलने का सुझाव दिया। इस तरह कांजीवरम स्नीकर्स का जन्म हुआ, जो आराम और स्टाइल का अनोखा संगम है।

यह भारत में जन्मी छोटी-सी शू स्टोरी है। हालांकि कॉबलर (मोची) से अपनी मैचिंग की स्नीकर्स बनवाने के लिए हर किसी के पास बहुत सारी कांजीवरम साड़ी होने की जरूरत नहीं है। और इसलिए फैशन की दुनिया में एक नया आइडिया उभर रहा है- ‘सॉक शूज!’ यह वर्षों से ट्रेंड में हैं। यह ट्रेंड 2017 में शुरू हुआ था, लेकिन महामारी के दौरान इसे खास पहचान मिली। जब लोग घर से काम कर रहे थे, तब मेश सॉक्स स्लिपर्स का खूब इस्तेमाल हुआ।

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तब सारा फिज़ेल, जो एक टेक्सटाइल और डिजाइन की छात्रा हैं, उन्होंने इस ट्रेंड को एक नया मोड़ दिया। महामारी के दौरान घर पर रहते हुए, उन्होंने देखा कि उनके पास कई पुराने कश्मीरी सॉक्स हैं, जिनका इस्तेमाल नहीं हो रहा था, क्योंकि सॉक्स की हील पहन-पहनकर खराब हो गई थी।

तब उन्होंने इन मोजों को जूतों में बदलने का विचार किया। इसके लिए उन्होंने अपने कॉबलर से रबर सोल और गोंद की मदद से जूते बनाने की तकनीक सीखी। सारा ने पहले अपने दोस्तों को ये जूते भेजे और कुछ बेचे भी, लेकिन महंगे कश्मीरी मोजों के कारण उन्हें नुकसान हुआ। इसके बाद उन्होंने ‘ब्रेव पुडिंग’ नामक कंपनी शुरू की। इस कंपनी के जूते दिखने में मोजों जैसे हैं, लेकिन बाहरी पहनावे के लिए उपयुक्त हैं और कई रंगों में उपलब्ध हैं।

2023 में सारा ने जब से सॉक्स शूज बनाए हैं, तब से उन्होंने कोई भी फुटवियर नहीं पहनी। कॉर्नेल से टेक्सटाइल और डिजाइन ग्रेजुएशन के बाद उन्होंने अपने पिता के रियल एस्टेट व्यवसाय में काम किया, लेकिन बाद में फुटवियर व्यवसाय की ओर आकर्षित हो गईं, क्योंकि अधिकांश आराम को सहूलियत दे रहे थे। उन्होंने ऐसे जूते बनाए जो मोजों की तरह दिखते हैं, लेकिन उनके नीचे रबर सोल होते हैं, जिससे वे असली जूतों की तरह महसूस होते हैं। इनकी कीमत 320 से 380 डॉलर (लगभग 28 हजार रुपए) के बीच है।

उत्पाद के तौर पर ‘सॉक शूज़’ को अब दूसरी कंपनियां भी बनाने लगी हैं, साल 2024 में इसका बाजार मूल्य 2.8 अरब डॉलर था, जो 2023 से 5% अधिक है। आजकल लोग आराम को प्राथमिकता दे रहे हैं। अब ऐसे ही किसी अन्य उत्पाद के बारे में सोचें, जो उपभोक्ताओं को एक्सप्रेसिव बनाए और कंपनियों के लिए मुनाफा बढ़ाए।

मुझे सिर्फ इस बात का बुरा लग रहा है कि हमारे कॉबलर्स इस बदलते ट्रेंड को क्यों नहीं अपना सकते? वे उपभोक्ताओं की बदलती पसंद को समझकर कुछ नया क्यों नहीं कर सकते, भले ही वह सारा जैसा न हो, लेकिन उषा उथुप जैसा तो हो सकता है?

फंडा यह है कि फैशनेबल होना गलत नहीं है, लेकिन यह हमारी प्राथमिकता के दूसरे क्रम पर होना चाहिए क्योंकि हमारा शरीर हमारे लिए कड़ी मेहनत करता है, इसलिए उसे आराम देना हमारी जिम्मेदारी है। और युवा उपभोक्ता इसे हमसे बेहतर समझते हैं।

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